श्रीमद्भागवत ने बहुत स्पष्ट कर दी है साध्वी शब्द की परिभाषा

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  • वस्त्र विन्यास और वेशभूषा से कोई स्त्री साध्वी नहीं हो सकती
  • साध्वी वह स्त्री है जो पतिव्रत धर्म का निरंतर पालन करे

आचार्य संजय तिवारी

साध्वी शब्द आजकल बहुत प्रचलन में है। वस्त्र विन्यास और वेशभूषा आदि के प्रदर्शन के आधार पर सामान्य जन किसी स्त्री को साध्वी मान लेते हैं और स्थापना भी दे देते हैं। सनातन वैदिक, आध्यात्मिक दृष्टि से यह अनुचित है, गलत है। साध्वी शब्द सनातन वांग्मय का शब्द है। इसकी सुदृढ़ और विस्तृत परिभाषा हमारे ग्रंथों में दी गई है। केवल वस्त्र विन्यास या किसी खास वेश भूषा के आधार पर किसी स्त्री को साध्वी न तो कहा जाना चाहिए और न ही ऐसी कोई मान्यता दी जानी चाहिए। यदि किसी स्त्री ने संन्यास ग्रहण किया है तो भी वह सन्यासी है, साध्वी नहीं। साध्वी शब्द सनातन वैदिक वांग्मय ने केवल उन स्त्रियों के लिए परिभाषा स्वरूप दिया है जिनमें अपने पतिव्रत धर्म का पालन करने की शक्ति है। साध्वी शब्द श्रीमद्भागवत महापुराण के तीसरे स्कंध में पूरी परिभाषा के साथ उपस्थित है।

पितृभ्यां प्रस्थिते साध्वी पतिमिङ्गितकोविदा ।

नित्यं पर्यचरत्प्रीत्या

भवानीव भवं प्रभुम् ॥ एक ॥

यह श्लोक मैत्रेय जी के माध्यम से उनकी वाणी और उपदेश स्वरूप आया है। यहां संदर्भ भगवान मनु और शतरूपा जी की पुत्री देवहूति और कर्दम ऋषि से जुड़ा है। यहां देवहूति को साध्वी इसलिए कहा गया है क्योंकि वह एक पवित्र और समर्पित पत्नी थीं। उन्होंने अपने पति कर्दम ऋषि की सेवा निस्वार्थ भाव से की और अपने बेटे कपिल देव से सांख्य ज्ञान प्राप्त किया, जिसके बाद वह और भी महान और आदरणीय हो गईं। उनकी निस्वार्थ सेवा और पतिव्रता धर्म ने उन्हें साध्वी की श्रेणी में स्थापित किया। साध्वी का अर्थ है “एक पवित्र, पतिव्रता स्त्री”। देवहूति ने अपने पति के प्रति अपनी निष्ठा और पवित्रता को बनाए रखा। उन्होंने अपने पति, कर्दम ऋषि, की सेवा निस्वार्थ भाव से की। उन्होंने भगवान के प्रति गहरी भक्ति प्रदर्शित की और अपने पुत्र कपिल देव से प्राप्त आध्यात्मिक ज्ञान को सीखा और दूसरों तक पहुंचाया। माता देवहूति का चरित्र समाज में पत्नी और माँ के आदर्श के रूप में देखा जाता है।

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मैत्रेय  श्रीमद्भागवत में स्पष्ट कहते हैं कि अपने माता-पिता के चले जाने के बाद, पतिव्रता स्त्री देवहूति, जो अपने पति की इच्छाओं को समझ सकती थी, ने बड़े प्रेम से उनकी निरंतर सेवा की, जैसे भगवान शिव की पत्नी भवानी अपने पति की सेवा करती है। यहां मां भवानी का विशिष्ट उदाहरण अत्यंत महत्वपूर्ण है। भवानी का अर्थ है भव अर्थात भगवान शिव की पत्नी। भवानी अर्थात पार्वती, जो हिमालयराज की पुत्री थीं, ने भगवान शिव को, जो एक भिखारी के समान प्रतीत होते थे, अपने पति के रूप में चुना। राजकुमारी होते हुए भी, उन्होंने भगवान शिव की संगति करने के लिए सभी प्रकार के कष्ट सहे, जिनके पास घर भी नहीं था, परन्तु वे वृक्षों के नीचे बैठकर ध्यान में अपना समय व्यतीत करते थे। यद्यपि भवानी एक महान राजा की पुत्री थीं, फिर भी वे भगवान शिव की सेवा एक दरिद्र स्त्री की भाँति करती थीं। इसी प्रकार, देवहूति, सम्राट स्वायंभुव मनु की पुत्री थीं, फिर भी उन्होंने कर्दम मुनि को पति रूप में स्वीकार करना पसंद किया। उन्होंने बड़े प्रेम और स्नेह से उनकी सेवा की, और उन्हें प्रसन्न करना जानती थीं। इसलिए उन्हें यहाँ साध्वी कहा गया है, जिसका अर्थ है “एक पवित्र, पतिव्रत धर्म का पालन करने वाली स्त्री”। उनका दुर्लभ उदाहरण वैदिक सभ्यता का आदर्श है। प्रत्येक स्त्री से देवहूति या भवानी के समान उत्तम और पवित्र होने की अपेक्षा की जाती है।

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आज भी हिंदू समाज में, अविवाहित लड़कियों को भगवान शिव की पूजा करने की शिक्षा दी जाती है, इस विचार से कि उन्हें उनके जैसा पति मिले। भगवान शिव आदर्श पति हैं, धन या इंद्रिय तृप्ति के अर्थ में नहीं, बल्कि इसलिए कि वे सभी भक्तों में सर्वश्रेष्ठ हैं। वैष्णवनाम यथा शम्भु: शम्भु, या भगवान शिव, आदर्श वैष्णव हैं। वे निरंतर भगवान राम का ध्यान करते हैं और हरे राम, हरे राम, राम राम, हरे हरे का जाप करते हैं। भगवान शिव का एक वैष्णव सम्प्रदाय है, जिसे विष्णुस्वामी सम्प्रदाय कहा जाता है। अविवाहित कन्याएँ भगवान शिव की पूजा करती हैं ताकि वे उनके समान उत्तम वैष्णव पति की आशा कर सकें। कन्याओं को भौतिक इन्द्रियतृप्ति के लिए बहुत धनी या बहुत ऐश्वर्यशाली पति चुनने की शिक्षा नहीं दी जाती; अपितु, यदि कोई कन्या इतनी भाग्यशाली होती है कि उसे भगवान शिव जैसा उत्तम पति भक्तिमय सेवा में प्राप्त होता है, तो उसका जीवन पूर्ण हो जाता है। पत्नी पति पर निर्भर होती है, और यदि पति वैष्णव है, तो स्वाभाविक रूप से वह पति की भक्ति में सहभागी होती है क्योंकि वह उसकी सेवा करती है। पति-पत्नी के बीच सेवा और प्रेम का यह आदान-प्रदान गृहस्थ जीवन का आदर्श है।

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देवहूति स्वयंभुव मनु की कन्या और कर्दम ऋषि की पत्नी एवं भगवान कपिल की माता थी। देवहूति की माता का नाम शतरूपा था। स्वयंभुव मनु एवं शतरूपा के कुल पाँच सन्तानें थीं जिनमें से दो पुत्र प्रियव्रत एवं उत्तानपाद तथा तीन कन्यायें आकूति, देवहूति और प्रसूति थे। आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। इन्हीं तीन कन्याओं से संसार के मानवों में वृद्धि हुई। संसार समस्त जन की उत्पत्ति मनु की कन्याओं से होने के कारण वे मानव कहलाये।।कर्दम ऋषि से विवाह के पश्चात देवहूति की नौ कन्यायें तथा एक पुत्र उत्पन्न हुये। कन्याओं के नाम कला, अनुसुइया, श्रद्धा, हविर्भू, गति, क्रिया, ख्याति, अरुन्धती और शान्ति थे तथा पुत्र का नाम कपिल था। कपिल के रूप में देवहूति के गर्भ से स्वयं भगवान विष्णु अवतरित हुये थे। यह सभी के लिए विचार का विषय होना चाहिए कि किसी विशेष वस्त्र और वेशभूषा वाली हर स्त्री को साध्वी नहीं कहा जाना चाहिए। संभव है कि इस शब्द का ज्ञान समाज में वस्तुतः कम हो और रूढ़ि रूप में साध्वी शब्द अलग अर्थ में प्रचलित हो चला हो। इसके लिए सनातन संस्कृति के आध्यात्मिक सदपुरुषो, महात्माओं, कथा व्यास और संबंधित पीठों को विचार कर इस पर समाज को जागरूक करना चाहिए।

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