‘काली दाल’ की जांच कराने से क्यों हिचक रही सरकार

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निशिकांत ठाकुर
 निशिकांत ठाकुर

देश के राष्ट्रीय चुनाव आयोग ने मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) का निर्णय लिया, जिसकी शुरुआत बिहार से की गई। कारण था कि कुछ महीने बाद वहां विधानसभा का चुनाव होने वाला है। चूंकि इसमें कोई ऐसी विशेष बात नहीं थी, इसलिए किसी को इसमें कुछ आपत्तिजनक भी नहीं लगा था। लेकिन, असलियत यह है कि इसके पीछे की राजनीति को खास कारणों से और जानबूझकर छुपाया गया। हालांकि, बिहार की जनता कुछ राजनीतिक कारणों से गरीब जरूर है, लेकिन पढ़ा—लिखा निशिकांत ठाक आयोग की इस चालाकी को समय पर समझकर विरोध करना शुरू कर दिया। विरोध का कारण बताया गया कि मतदाता सूची से पैंसठ लाख मतदाताओं का नाम यह कहकर हटाया जा रहा है कि इनमें अधिकांश लोगों की मृत्यु हो गई है और लाखों लोगों ने शरणार्थी रूप में देश में घुसकर मतदाता सूची में अपना नाम दर्ज करवा लिया है, जो फर्जी हैं। चुनाव आयोग द्वारा जब इस बयान को सार्वजनिक किया गया, तो तहलका मच गया। इसी स्थिति में एक दूसरी बात यह हो गई कि लोकसभा के नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने दिल्ली में चुनाव आयोग के खिलाफ ‘एटम बम’ नामक एक प्रेस कॉन्फ्रेंस किया, जिसमें प्रमाण सहित बेंगलुरु के एक विधानसभा चुनाव क्षेत्र महादेवपुरा के लिए कहा गया कि यहां की मतदाता सूची में एक लाख ऐसे मतदाताओं के नाम डाले गए, जो फर्जी हैं। इस मुद्दे ने आग में घी डालने का काम किया, जिसने बिहार सहित पूरे देश के मतदाताओं को जागरूक कर दिया।

कांग्रेस नेता राहुल गांधी और राजद (राष्ट्रीय जनता दल) के नेता तेजस्वी यादव ने बिहार के मतदाताओं के घर—घर जाकर यह पैगाम पहुंचाने का प्रयास किया कि चुनाव आयोग सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी के साथ सांठगांठ कर दुराग्रहपूर्ण मतदाता सूची जारी कर रहा है, ताकि आनेवाले मतदान में भाजपा की जीत सुनिश्चित हो सके। इन्हीं उद्देश्यों को लेकर राहुल गांधी और तेजस्वी यादव अपनी ‘वोट जोड़ो पदयात्रा’ निकाली, जो बिहार के विभिन्न जिलों में करीब 1300 किलोमीटर दूरी तय करके 31 अगस्त को पटना के गांधी मैदान में समाप्त हुई। कहते हैं कि आजादी के बाद भारत की जनता ने ऐसा अपूर्व जनसैलाब कभी नहीं देखा था। महात्मा गांधी ने दांडी यात्रा की शुरुआत नमक कानून तोड़ने के उद्देश्य से केवल 28 कांग्रेस कार्यकर्ताओं के साथ शुरू किया था, जिसे दांडी यात्रा के नाम से जाना जाता है। गांधी जी की इस यात्रा में धीरे-धीरे लोग जुड़ते गए और फिर यात्रा की समाप्ति तक हजारों क्रांतिकारी नेताओं ने अंग्रेजों के नमक कानून तोड़ने का सफल आंदोलन किया।

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कई जगह कई विरोधी कानून के जरिये इस यात्रा को विफल करने का प्रयास किया गया, जिसके बाद चुनाव आयोग की निष्पक्षता पर संदेश जताते हुए खुलकर नारेबाजी की गई ‘वोट चोर गद्दी छोड़।’ वैसे देश के मतदाताओं का कहना है कि यदि नेता प्रतिपक्ष का यह आरोप है कि वोट चोरी सत्तारूढ़ दल के साथ मिलकर चुनाव आयोग के माध्यम से कराई गई है, तो निश्चित रूप से यह आरोप गंभीर है और सरकार द्वारा किसी विशेष जांच एजेंसी से इसकी जांच कराई जानी चाहिए, ताकि जिससे सच और झूठ का पर्दाफाश हो सके और देश की जनता को विश्वास हो जाए कि कौन सच बोल रहा है— विपक्षी दल, सत्तारूढ़ दल या फिर चुनाव आयोग। आज जो संदेश देश के कोने कोने में फैल गया है उसका खंडन तो होना ही चाहिए, अन्यथा कब तक जनता सत्य की खोज में रोजी रोटी छोड़कर इस भ्रम में जीती रहेगी कि हम इस देश के नागरिक नहीं हैं तथा हम जिंदा होने के बावजूद चुनाव आयोग के हाथों मार दिए गए हैं। इस यात्रा में कई ऐसे लोग भी सामने लाए गए, जो मतदाता सूची में मृत घोषित किए जा चुके हैं। अगर ऐसा कुछ हुआ है, तो निश्चित रूप से किसी विशेष एजेंसी द्वारा इसकी जांच कराई ही जानी चाहिए, ताकि देश को दूध का दूध और पानी का पानी दिख सके। दूसरी बात यह कि इन सारी बातों को सामने रखकर फिलहाल सरकार को तो यह स्पष्ट करना ही चाहिए कि वह इसकी जांच कराएगी। भारतीय लोकतांत्रिक संविधान तो यही कहता है कि जनता में यदि किसी प्रकार का संदेह हो जाए और सरकार भी संदेह के घेरे में आ जाए, तो उसका निराकरण सरकार और कानून को ही करना चाहिए। पर, आज स्थिति ऐसी हो गई है कि यदि इस बात के लिए सरकार से कहा जाए तो सरकार सुनने को तो तैयार होती नहीं, उल्टे वह चुनाव आयोग का वकील हो जाती है।

अब प्रश्न यह उठा है कि इस तरह के आरोप पर सत्तारूढ़ और  स्वयं संविधान रक्षा के प्रदत्त स्वयंसेवी संस्था को क्या करना चाहिए? यहां यही यक्ष प्रश्न खड़ा हो गया है कि चुनाव आयोग स्वयं अपनी सफाई देकर विपक्षी दलों के आरोपों को सुनने से साफ माना कर देता है और वहीं आरोप लगता है कि जिनके द्वारा आरोप लगाया गया है, वहीं हलफनामा दे, अन्यथा उसपर कार्यवाही की जाएगी। चुनाव आयोग में तो शीर्ष कानूनी ज्ञाता और संविधान के विशेषज्ञ होते हैं, लेकिन उन्हें भी यही लगता है कि मुख्य चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों को जो धमकाया है, सर्वथा उचित है, तो फिर लोकतंत्र रह कहां गया? बताते चलें कि मुख्य चुनाव आयोग ने विपक्षी दलों के नेता और सांसद राहुल गांधी को धमकाते हुए ऐसा ही कहा है। फिर यही प्रश्न उठता है कि आखिर विपक्ष और सामान्य जनता किसके पास गुहार लगाने के लिए जाए? इन्हीं धमकियों का जवाब देते ही अब विपक्षी दलों के नेता ने कहा है अभी तो उन्होंने एटम बम फोड़ा है, उससे भी बड़ा हाइड्रोजन बम वह बहुत जल्द छोड़ने वाले हैं, जिसके फूटते ही प्रधानमंत्री कहीं मुंह दिखाने लायक नहीं रह सकेंगे। जनता ने कयास लगाना शुरू कर दिया है कि अब हरियाणा, महाराष्ट्र के साथ-साथ बनारस संसदीय सीट के चुनाव का विश्लेषण सर्वाधिक विनाशक और खतरनाक बम साबित होगा। ज्ञात हो कि उत्तर प्रदेश के बनारस लोकसभा चुनाव क्षेत्र से ही पिछले तीन चुनाव से निर्वाचित होकर नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री बनते आ रहे हैं।

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इन आरोपों ने देश के सत्तारूढ़ दल में खलबली और उन्हें हिलाकर रख दिया है। फिलहाल तो यह विपक्षी दलों का दावा है। इसका निर्णय तो अब हाइड्रोजन बम फूटने का बाद ही होगा, लेकिन जो स्थिति सत्तारूढ़ की बन गई है, वह देश के लिए बेहद चौंकाने वाली और अविश्वसनीय जैसी है। देश यह सोचने पर विवश हो गया है कि यदि सत्तारूढ़ दल पर सप्रमाण ऐसे आरोप लगाए गए, तो देश में क्या स्थिति बनेगी! स्वाभाविक रूप से ऐसे में अब फिर एकबार देश के माहौल को गर्माने और बिगाड़ने का कुप्रयास शुरू हो गया है और वह यह कि विशेष सघन पुनरीक्षण( एसआईआर) इसी माह से देशभर में एक साथ घोषित किया जाएगा। जनता से इस मुद्दे को समझने का जब प्रयास किया, तो उनका यही कहना था कि बिहार का मामला साफ हो जाने के बाद फिर पूरे देश में एसआईआर को शुरू किया जाएगा, तो दाल में जरूर कुछ न कुछ तो काला नजर आता है। इसलिए जनता को राहुल गांधी के दूसरे विस्फोट का इंतजार करना चाहिए, अन्यथा यही आरोप चुनाव आयोग पर लगता रहेगा कि वह सत्ताधारी दल को सत्ता में हिस्सेदारी गलत मतदाता सूची बनाकर कराई जाए, जिसका लाभ हर सत्तारूढ़ को सरकार बनाने में मददगार हो सके। अब देश की जनता यह समझ चुकी है कि किस प्रकार और किन किन माध्यमों से सत्ता की कुर्सी हासिल की जा रही है। इसलिए चुनाव आयोग और सत्तारूढ़ दल को सोच समझकर ही कुछ निर्णय लेना चाहिए।

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