दो टूक : भ्रष्टाचार में डूबा मुल्क, नेपोटिज्म में उलझी सियासत और पीढ़ियों का गुस्सा 

Untitled 5 copy 12 scaled

राजेश श्रीवास्तव

भारत का पड़ोसी मुल्क नेपाल इस समय बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा है। कहा जा रहा है कि सोशल मीडिया पर बैन के सरकार के फैसले ने सत्ता पलट दी। पूरा देश धुंआ-धुंआ हो गया है। लेकिन ये सिर्फ सोशल मीडिया पर बैन के बाद फूटा गुस्सा भर नहीं है बल्कि इसके घाव दशकों पुराने हैं। नेपाल के पूर्व प्रधानमंत्री और मशहूर लेखक बीपी कोइराला ने अपनी किताब ‘नरेंद्र दाई’ में लिखा है कि हमने सालों तक सहा, चुपचाप बैठे रहे, लेकिन अब गुस्से की ज्वाला बाहर आनी चाहिए। इस समाज की जड़ता ने हमें दबाया, अब विद्रोह का समय है। उन्होंने बेशक इन पंक्तियों को राणा शासन के दमन के विरोध में लिखा था, लेकिन नेपाल की मौजूदा स्थिति को देखकर लग रहा है कि मानो जैसे उन्होंने दशकों पहले ही नेपाल की इस बगावत की भविष्यवाणी कर दी थी। नेपाल में बगावत एक दिन में नहीं फैली, न सिर्फ यह सच्चाई है कि सोशल मीडिया पर बैन ने तख्ता पलट कर दिया ।

दरअसल नेपाल में सालों से आक्रोश पनप रहा था। सुलग रहा था। नेपाल में भ्रष्टाचार इस कदर फैला है कि करप्शन के इंडेक्स में 18० देशों में वह 1०7वें पायदान पर है। देश के 84 फीसदी से ज्यादा लोग डंके की चोट पर बोलते हैं कि उनकी सरकार सिर से लेकर पैर तक करप्शन में डूबी हुई है। स्थिति ये बन गई है कि हर साल बड़ी संख्या में नेपाल के युवा देश छोड़ देते हैं। युवाओं का ये कोई साधारण माइग्रेशन नहीं है बल्कि आर्थिक असमानता, लगातार सीमित हो रहे अवसर और प्रशासनिक नाकामियों का भार है, जिसे देश में ही छोड़कर लोग माइग्रेट हो रहे हैं। बीते तीन दशक में लगभग 68 लाख नेपाली नागरिक विदेशों में काम कर रहे हैं। इनमें से 15 से 17 लाख नेपाली तो भारत में रहकर रोजी-रोटी कमा रहे हैं। एक लाख नेपाली स्टूडेंट हर साल पढ़ाई के लिए विदेश का रुख कर लेते हैं। नेपाल में बेरोजगारी का ग्राफ बताता है कि 2017-2018 की तुलना में यह 11.4 फीसदी से बढ़कर 2022-2023 में 12.6 फीसदी हो गई है। नेपाल की सड़कों पर आज विद्रोह का जो बिगुल बजा है।

ये भी पढ़े

आज सुबह देश-विदेश की 10 बड़ी खबरें पढ़ें

वह सिर्फ युवाओं की अचानक की गई बगावत नहीं है बल्कि सालों से धधक रहा ज्वालामुखी है, जो अब फट पड़ा है। इस हिसा को बेशक जायज ठहराया नहीं जा सकता। वर्षों के भ्रष्टाचार से लेकर नेपोटिज्म और ज्यादती का हिसाब चुकता करने के लिए युवा सड़कों पर हैं और हिसा का रास्ता अख्तियार कर रहे हैं। तभी तो विद्रोही भीड़ मौजूदा हुक्मरानों से लेकर पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार वालों पर हमला करने से भी नहीं चूक रही। लेकिन नेपाल में युवाओं का जो गुस्सा फूटा है, उसकी जड़ें बरसों की नाइंसाफी और हुक्मरान के खिलाफ पनप रहे गुस्से से सींची गई हैं। लेकिन सवाल है कि नेपाल में इतने दशकों से आखिर हो क्या रहा था? जो लोगों का गुस्सा इस कदर भड़का हुआ है। नेपाल के प्रधानमंत्री और उनकी सरकार के खिलाफ इस गुस्से की वजह तो समझ आती है लेकिन पूर्व प्रधानमंत्रियों और उनके परिवार पर हमले हैरान करने वाले रहे। इसका जवाब नेपाल में बरसों से हुए घोटालों की गर्त में छिपा है।

नेपाल की सियासत में गहरे तक पैठ कर चुके भ्रष्टाचार ने देश में उद्योग-धंधों को चौपट करना शुरू कर दिया। निवेशकों ने दूरी बनानी शुरू कर दी। इसका सीधा असर रोजगार पर भी पड़ा। बड़ी संख्या में युवाओं ने काम की तलाश में भारत से लेकर मलेशिया और गल्फ का रुख करना शुरू किया। इससे युवाओं में धीरे-धीरे सियासत के प्रति नफरत पनपने लगी। देश में राजशाही के पतन से लेकर, माओवादी आंदोलन और लोकतंत्र का पायदान चढ़ने तक देश में सत्ता का स्वरूप तो लगातार बदलता रहा लेकिन इस सत्ता को वही चेहरे हथियाते रहे। वही पुराने नेता, उनकी पार्टियां और उनके परिवार। शायद यही आक्रोश युवाओं के दिल के अंदर उबाल मार रहा था जो अब जेन-जी के रूप में हमें देखने को मिला। कोई हिंदू राष्ट्र इस तरह अपनी राजशाही के खिलाफ हो जायेगा, इसकी उम्मीद शायद किसी ने नहीं की थी। लेकिन हर चीज की इम्तिहा होती है। नेपाल के लोग विशेष रूप से युवा नेपोटिज्म यानी भाई-भतीजावाद से भी त्रस्त हैं। नेपाल की सियासत वंशवाद में जकड़ी हुई है।

ये भी पढ़े

कुछ ऐसे होते हैं कृष्ण पक्ष में जन्मे लोग, स्वभाव से निष्ठुर होने के साथ-साथ होते हैं क्रूर

नेपाली कांग्रेस से लेकर कम्युनिस्ट पार्टी (UML), माओवादी लगभग सभी पार्टियों में नेपो किड्स की भरमार है। संसद और प्रांतीय असेंबली में पूर्व प्रधानमंत्रियों, मंत्रियों और नेताओं के बच्चे और रिश्तेदारों की भरमार है। सरकारी नौकरियों से लेकर नौकरशाही और प्रतियोगी परीक्षाओं में भी प्राथमिकता नेपो किड्स हैं। सरकारी ठेके भी अक्सर नेताओं के रिश्तेदारों और उनके दोस्तों को मिल जाते हैं। इससे हताश होकर युवा विदेश पलायन कर रहे हैं। लेकिन इस साल की शुरुआत से ही युवाओं ने सोशल मीडिया पर नेपोटिज्म के खिलाफ खुलकर बोलना शुरू किया। सोशल मीडिया पर नेपोटिज्म के खिलाफ जमकर हैशटैग ट्रेंड होने लगे तो इस बीच सरकार ने कई सोशल मीडिया अकाउंट्स पर बैन लगा दिया। इसके लिए जरूरी रजिस्ट्रेशन नहीं होने का हवाला दिया गया। ओली सरकार का यही फैसला उनके लिए नासूर साबित हुआ। इतिहास गवाह है कि लंबे समय तक शोषण झेल रही जनता जब बगावत पर उतर आती है तो वह अच्छे और बुरे का फर्क भूल जाती है। उसे नजर आता है तो बस अपने साथ हुआ अन्याय…

One thought on “दो टूक : भ्रष्टाचार में डूबा मुल्क, नेपोटिज्म में उलझी सियासत और पीढ़ियों का गुस्सा ”

Comments are closed.

Untitled 12 copy
Analysis homeslider

यादों से विमुख होता समाज: क्या हम अपनी स्मृतियाँ खो रहे हैं?

India जिन पुरखों के गीत- गाते हम थकते नहीं, उनकी यादों को सुरक्षित रखने में हमारी दिलचस्पी कतई उत्साहजनक नहीं है। हमारे यहाँ त्योहारों पर ‘पूर्वजों का आशीर्वाद’ मांगा जाता है। शादियों में कुल-देवता को याद किया जाता है। भाषणों में शहीद भगत सिंह, महात्मा गांधी, अटल बिहारी बाजपेई  के नाम गूंजते हैं। पर जब बात […]

Read More
Hindu
Analysis homeslider

लाहौर को फिर मिलने लगी हिंदू नाम वाली पहचान

Hindu लाहौर जिसे पाकिस्तान का दिल कहा जाता है, उस लाहौर  की आत्मा  सांझी सांस्कृतिक विरासत का जीता-जागता गवाह भी है। रावी के किनारे बसा यह शहर सदियों तक हिंदू, सिख, मुसलमान और बौद्ध सभ्यताओं की साझा थाती रहा है। 1947 से पहले लाहौर में हिंदू और सिख आबादी की एक बड़ी हिस्सेदारी थी। बाजारों […]

Read More
Yogi
Analysis homeslider

योगी का संदेशः सड़क नमाजघर नहीं, कानून सबसे बड़ा धर्म

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने एक बार फिर स्पष्ट और सख्त संदेश दिया है कि सार्वजनिक सड़कों पर नमाज नहीं पढ़ी जाएगी। इससे पहले भी सीएम योगी आदित्यनाथ कई बार कह चुके हैं कि सड़क पर नमाज नहीं पढ़ी जाएगी और अगर कोई ऐसा करता है, तो कार्रवाई होगी। योगी ने पहले भी […]

Read More