जजों ने लेखन-सहिंता रचकर कह दिया : नारी तू अबला नहीं!

के. विक्रम राव 

अंततः सर्वोच्च न्यायालय ने महिला-संबंधी विषयों पर प्रयुक्त भाषा और शब्दों को सभ्य, शालीन और सुसंस्कारी बना ही दिया। अमूमन यह वैयाकरणों और भाषाविदों का क्षेत्र है। फिलहाल प्रधान न्यायाधीश धनंजय यशवंत चंद्रचूड ने कल (16 अगस्त 2023) एक दूरगामी न्यायिक कदम उठाया है। इसका प्रभाव भारतीय मीडिया पर तो निश्चित पड़ेगा ही, साहित्य लेखन पर भी। अब से नारी के बारे में हल्का, छिछ्ला, सतही, ओछा लेखन अवैध होगा। खासकर हम पत्रकार ज्यादा सचेत, शिष्ट और सौम्य बनेंगे, अभिव्यक्ति में। उच्चतम न्यायालय ने एक पुस्तिका का विमोचन किया जिसमें अनुचित लैंगिक शब्दों की शब्दावली है। उनकी जगह वैकल्पिक शब्द तथा वाक्यांश सुझाए गए हैं। छेड़छाड़, वेश्या और हाउसवाइफ जैसे शब्द जल्द ही कानूनी शब्दावली से बाहर हो सकते हैं। इनकी जगह यौन उत्पीड़न, यौनकर्मी और गृह स्वामिनी (होममेकर) जैसे शब्द होंगे। पुस्तिका में कहा गया है कि मायाविनी, वेश्या या बदचलन जैसे शब्दों का उपयोग करने के बजाय महिला शब्द का उपयोग किया जाना चाहिए। इसमें देह व्यापार और वेश्या जैसे शब्दों के इस्तेमाल पर भी रोक लगाई गई है। इनके स्थान पर यौन कर्मी शब्द का इस्तेमाल किया जाएगा।

प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड ने अपने पूर्व के प्रधान न्यायाधीश स्व. जगदीश शरण वर्मा की समिति के आदेशों की श्रृंखला में एक बढ़िया कड़ी जोड़ दी है। अपनी रपट (23 जनवरी 2013) में प्रधान न्यायाधीश वर्मा ने कहा था कि महिला पर अत्याचार के अपराधी पर तुरंत और कड़ी कार्रवाही की जाए। इसी के बाद निर्भया कांड में फांसी की सजा दी गई थी। यूं भी भारत का उच्चतम न्यायालय पीड़ित महिला अर्थात यौनकर्मियों के विषय में सदैव सहानुभूति से निर्देश देता रहा है। मसलन पीड़ित नारियों को आधार कार्ड जारी करना (1 मार्च 2022)। न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव और न्यायमूर्ति बी.आर. गवाई के कारण यह सुविधा दी गई। वेश्यावृत्ति को वैध बनाने का बेहतर विकल्प बताया था उच्चतम न्यायालय के (10 फरवरी 2009)। तब सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा था कि दंडात्मक कार्यवाई से वेश्यावृत्ति पर पाबंदी लगाना अगर व्यवहारिक तौर पर संभव नहीं हो तो क्या वह वेश्यावृत्ति को वैध बना सकता है ? न्यायमूर्ति दलबीर भंडारी और न्यायमूर्ति ए. के. पटनायक की पीठ ने सालिसीटर जनरल गोपाल सुब्राह्मण्यम से कहा, जब आप कानून से पाबंदी लगाने में सक्षम नहीं हैं तो आप इसे वैध क्यों नहीं बना देते ?

फिर जनवरी 16 (2010) में शीर्ष अदालत ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह बाल वेश्यावृत्ति रोके। कोर्ट ने कहा कि इसके लिए सभी जरूरी कदम उठाए जाएं और सेक्स टूरिज्म पर कड़ाई से रोक लगाई जाए। बच्चों की तस्करी और उन्हें वेश्यावृत्ति में धकेलना का यह एक प्रमुख कारण है। यौनकर्मियों के सामने कोविड के दौर में तो भुखमरी की नौबत आ गई थी। तब भी सर्वोच्च न्यायालय ने हस्तक्षेप किया। भारत सरकार का आदेश (10 मार्च 2022) दिया कि उन्हें राशन उपलब्ध कराया जाए। न्यायालय ने कहा : “देश के प्रत्येक नागरिक को मूल अधिकार प्रदत्त है, चाहे उसका पेशा कुछ भी हो। सरकार देश के नागरिकों को मूलभूत सुविधाएं देने के लिए कर्तव्यबद्ध है।

गत वर्ष 22 मई को उच्चतम न्यायालय ने स्पष्ट आदेश दिया था कि यौनकर्मियों को एक व्यवसाय की मान्यता दी जाती है। यह बड़ा ऐतिहासिक फैसला था। अदालत ने 19 मई 2022 को यह माना था कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत यौनकर्मियों सहित सभी को सम्मान और जीवन के अधिकार की गारंटी दी गई है। इस प्रकार, यौनकर्मियों को कानूनी रूप से परेशान और गिरफ्तार नहीं किया जा सकता है। महिला विषयक विवरणों में शब्द पर न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ ने एक बड़ा उम्दा उदाहरण दिया। वे बोले की 1908 में रचित सिविल प्रोसीजर कोड में शब्द था “Pauper” जिसके मायने हैं कंगाल या दरिद्र। उसे हटाकर अब शब्द “Indigent” कर दिया गया है जिसके अर्थ हैं निर्धन अथवा अकिंचन। इसी प्रकार वेश्या के लिए यौनकर्मी रखा गया है क्योंकि जो शारीरिक और मानसिक श्रम करता है वही श्रमिक कहलाता है। उनका व्यवसाय भी रोजी कहलाएगा। पेशा अथवा धंधा नहीं।

जिन महिला विधिवेत्ताओं ने इस नई पुस्तिका की रचना में अपना योगदान किया है वे सभी लब्ध प्रतिष्ठित महिला नेत्री हैं। कोलकता हाई कोर्ट की जज न्यायमूर्ति मौसमी भट्टाचार्य हैं। वे पटना, हैदराबाद और दिल्ली हाईकोर्ट में कार्यरत रहीं। कॉपीराइट कानून की निष्णात हैं। कैंब्रिज विश्वविद्यालय से शिक्षित हैं। मद्रास हाई कोर्ट की जज रही प्रभा श्रीदेवन तमिल की साहित्यकार भी हैं। बौद्धिक संपदा कानून की ज्ञाता हैं। उनका ऐतिहासिक न्यायिक निर्णय रहा नोवर्टिस ग्लिवेक मुकदमे में। ग्लिवेक एक कैंसर-रोधी दवा है। इसका उपयोग क्रोनिक माइलॉयड ल्यूकेमिया (सीएमएल), सफेद रक्त कोशिकाओं के कैंसर में किया जाता है। जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट की प्रथम महिला मुख्य न्यायाधीश श्रीमती गीता मित्तल ने इतिहास रचा था जब उन्होंने “टाइम्स आफ इंडिया” पर मुकदमा किया था क्योंकि उसने लिखा था कि जज मित्तल फैसले देने में बड़ा देर करती हैं। “टाइम्स” ने उनसे माफी मांगी थी उन्हें नारी शक्ति पुरस्कार से नवाजा गया था। न्यायमूर्ति प्रतिभा सिंह दिल्ली हाईकोर्ट की जज हैं। कई विधान सभाई कार्यों में उनकी राय विशेष मानी गई थी। इन जजों के साथ रहीं अकादमिक निष्णात प्रोफेसर झूमा सेन जो मानव अधिकारों के क्षेत्र में महत्वपूर्ण कार्य कर चुकी हैं। वे विधि आयोग तथा राष्ट्रीय महिला आयोग में बड़ा योगदान कर चुकी हैं। अतः इन विधि विदुषियों के कारण ही एक गलत भाषायी परिपाटी टूटी है। सम्यक शब्दावली बनी है। राष्ट्र का उन्हें आभार।

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