योगी मॉडल से प्रेरणा ले बंगाल

डॉ दिलीप अग्निहोत्री


योगी आदित्यनाथ के कार्यकाल में सभी चुनाव शांतिपूर्ण ढंग से सम्पन्न हुए। संवैधानिक व्यवस्था का सम्मान हुआ। दूसरी तरफ पश्चिम बंगाल है। जहां चुनाव में हिंसा एक स्थाई पहचान बन गई है।  बंगाल की व्यवस्था बदहाल है। तृणमूल कांग्रेस को यही व्यवस्था पसन्द है, तो कोई बात नहीं। लेकिन यदि ममता बनर्जी इसे दूर करना चाहती है, तो उन्हें योगी मॉडल से प्रेरणा लेनी चाहिए। अभी तक तो अमेरिका ब्रिटेन में दिए गए राहुल गांधी के बयान पश्चिम बंगाल पर ही लागू होते हैं। तीर की तरह बयान भी कई बार गलत निशाने पर लग जाते हैं। राहुल गांधी ने ब्रिटेन से लेकर अमेरिका तक में दिए गए बयानों का भी यही अंजाम हुआ। भारत का नाम लेकर उन्होंने नरेंद्र मोदी पर निशाना लगाया था। लेकिन उनके बयान पश्चिम बंगाल पर फिट हो गए। निशाने पर ममता बनर्जी आ गईं। राहुल गांधी ने विदेशों में आरोप लगाए थे कि भारत में लोकतंत्र को समाप्त किया जा रहा है।

वह अपने बयान के समर्थन में कोई उचित प्रमाण नहीं दे सके थे। इसके साथ ही उन्होंने कहा था कि भारत में कुछ लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। राहुल के ये बयान भारत पर तो लागू नहीं हुए, लेकिन पश्चिम बंगाल में पूरी तरह चरितार्थ हुए हैं। पंचायत चुनाव इसका प्रमाण है। शांति पूर्ण और निष्पक्ष चुनाव कराने में प्रदेश सरकार पूरी तरह विफल रही है। हिंसा और उपद्रव के माहौल में निष्पक्ष चुनाव सम्भव भी नहीं होते। इस चुनाव मे बैलेट से चुनाव की वास्तविकता भी सामने आ गई है। विगत नौ वर्षों में जहां भी BJP विजयी हुई, वहां विपक्ष ने ईवीएम पर हमला बोला। तब उनका कहना था कि ईवीएम में गड़बड़ी करके BJP ने चुनाव जीता है। चुनाव आयोग तक गुहार लगाई गई। चुनाव आयोग ने आरोप सिद्ध करने के लिए विपक्षी पार्टियों को आमंत्रित किया।

लेकिन किसी ने चुनौती स्वीकार नहीं की। वैसे चुनाव में जब विपक्षी पार्टियां विजयी होती थीं, तब सर्वाधिक राहत ईवीएम को मिलती थी। वह विपक्षी हमले से बच जाती थी। तब कोई यह नहीं कहता था कि चुनाव बैलेट से होने चाहिए। भला हुआ कि अभी कर्नाटक में काग्रेस जीत गई। विपक्षी नेता वहां जश्न मनाने पहुँच गए। यदि BJP विजयी होती तो अभी तक ईवीएम पर हमले हो रहे होते। उधर पश्चिम बंगाल में बैलेट से चुनाव की दशा दिखाई देती, इधर बैलेट से चुनाव कराने की मांग हो रही होती। ऐसा नहीं कि पश्चिम बंगाल के लिए चुनावी हिंसा कोई नई बात है। यहां तो कम्युनिस्टों की सरकार से लेकर आज तक यही हो रहा है। विधानसभा चुनाव के दौरान और परिणाम के फौरन बाद पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा का दौर शुरू हुआ था। इसमें सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस के लोगों की सहभागिता सामने आई थी। यह भी आरोप था कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने इस हिंसा को रोकने में कोई गंभीरता नहीं दिखाई। आरोप लगा कि सत्ता पक्ष अपने विरोधियों में भय का संचार करना चाहता था। यह राजनीति की कम्युनिस्ट शैली थी, जिसे तृणमूल ने अपना लिया। तब

लोकसभा सदस्य ज्योतिर्मय सिंह महतो के नेतृत्व में BJP सांसदों के एक प्रतिनिधिमंडल ने तत्कालीन राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद से मुलाकात की। राष्ट्रपति भवन में हुई इस मुलाकात में सांसदों ने कोविंद को एक पत्र सौंप कर कहा कि पूरे पश्चिम बंगाल में अराजकता और डर का माहौल है। राज्य की कानून व्यवस्था पूरी तरह से ध्वस्त हो चुकी है। पश्चिम बंगाल के जंगल महल क्षेत्र में माओवादियों और अपराधियों की सक्रियता भी दिन प्रतिदिन बढ़ती जा रही है जो कि चिंता का विषय है। अपराधियों और नक्सलियों के छुपने के लिए जंगल महल एक सुरक्षित स्थान बन गया है। बावजूद राज्य सरकार और उसके आला अधिकारियों के कान पर जूं तक नहीं रेंग रहा। पुरुलिया कोल माफिया और रेत माफिया प्रशासन की शह पाकर खुले तौर पर अवैध कारोबार कर रहे हैं। जिन परिवारों ने BJP का समर्थन किया था उन्हें चुनाव बाद हुई हिंसा में अपने प्रियजन को खोना पड़ा।राज्य की एक बड़ी आबादी डर के माहौल में जी रही है। BJP समर्थक लोगों के साथ अमानवीय व्यवहार किया गया। तब पश्चिम बंगाल की राजनीतिक हिंसा पर एक रिपोर्ट भी जारी हुई थी। यहां चुनाव के बाद से ही हिंसक गतिविधि चलती रही हैं। इसमें BJP का समर्थन करने वाले निशाने पर थे। हिंसक तत्वों को सत्तारूढ़ तृणमूल कॉंग्रेस का खुला समर्थन था। यही कारण था कि पुलिस व प्रशासन ऐसी घटनाओं को नजरन्दाज करता रहा। इससे हिंसक तत्वों का मनोबल बहुत बढ़ गया था। पीड़ित लोगों की पुलिस थानों में कोई सुनवाई नहीं थी। वस्तुतः यह हिंसा सुनियोजित थी। इसका उद्देश्य BJP समर्थकों में भय फैलाना था।

गृह मंत्रालय की ओर से पोस्ट इलेक्शन वायलेंस पर बनाई गई फैक्ट फाइंडिंग कमिटी में सिक्किम हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस रह चुके जस्टिस प्रमोद कोहली, केरल के पूर्व चीफ सेक्रेटरी आनंद बोस, कर्नाटक के पूर्व अतिरिक्त सचिव मदन गोपाल, ICSI के पूर्व अध्यक्ष निसार चंद अहमद और झारखंड की पूर्व डीजीपी निर्मल कौर शामिल थे। TMC ने विधान सभा चुनाव में विजय मनाने से पहले ही विध्वंस की राजनीति शुरू की थी। ऐसी कोई घटना यदि BJP शासित राज्य में हो जाती तो तूफान खड़ा कर दिया जाता। जब बंगाल में दलितों,पिछड़ों, आदिवासियों और महिलाओं के साथ हिंसा होती है तो मानवाधिकार कार्यकर्ता की आवाज भी नहीं निकलती। पंचायत चुनाव में हिंसा धांधली और बूथ कैप्चरिंग पर विपक्षी दलों का मौन उनके विचारों को उजागर करने वाला है। डॉ. अनिर्बान गांगुली ने कहा कि मतदान से एक दिन पूर्व TMC ने राज्य भर में अपनी मशीनरी का उपयोग करते हुए अपने सशस्त्र गुंडों को तैनात कर दिया।

इन दस्तों को विभिन्न इलाके में देखा गया, लेकिन सूचना दिये जाने के बाद भी पुलिस मूकदर्शक बनी रही और इसको लेकर कोई कार्रवाई नहीं की। इन असामाजिक तत्वों ने राज्य भर में कई वारदातों को अंजाम दिया, मतदान के दिन कई लोगों को मतदान केंद्र पहुंचने पर पता चला कि उनका वोट पहले ही डाला जा चुका है, कुछ को वापस लौटा दिया गया और अन्य बिना मतदान किये वापस जाने को मजबूर थे। यह हालात उस वक्त देखने को मिले जब TMC के सशस्त्र गुंडों ने मतदान केंद्रों को अपने कब्जे में लेना आरंभ किया। इस दौरान अन्य दलों के बूथ एजेंटों पर हमला किया गया और मतदान अधिकारियों को भी केंद्रों से बाहर निकाल दिया गया। BJP बूथ एजेंटों को बूथों से दूर कर दिया गया। TMC का संरक्षण प्राप्त इन बाहरी उपद्रवी तत्वों ने सभी बूथों का नियंत्रण अपने हाथों में ले लिया था। ये गुंडे कभी हवा में बंदूक लहराते और कभी फायरिंग करते भी नजर आये। वास्तविकता यह है कि मतदान केंद्रों के सामने कोई कतार नहीं थी और फिर भी SEC ने दावा किया कि इन चुनावों में अस्सी प्रतिशत से अधिक मतदान हुआ और ‘कुल मिलाकर’ मतदान शांतिपूर्ण और व्यवस्थित रहा।

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