दो टूक : कोरोना फिर आया तो क्या हम हैं तैयार

राजेश श्रीवास्तव


इन दिनों देश में फिर उसी बीमारी की चर्चा तेज हो गयी है, जिसने पूरे विश्व को अपनी चपेट में ले रखा है। लोग जब कोरोना को भूलने लगे थे। तब चीन से ऐसी तस्वीरें सामने आ रही हैं, जिसने भारत को झकझोर कर रख दिया है। कहा जा रहा है कि चीन अगल नहीं संभला तो अगले 2० दिनों में वहां मरने वालों का आंकड़ा कई लाख का हो सकता है । इसके बावजूद चीन कुछ समझने को तैयार नहीं दिख रहा, उसके यहां तो बुखार की दवाइयों तक के लाले पड़े हैं । डाक्टरों को दूसरी जगहों से बुलाना पड़ रहा है। श्मशानघाटों पर लंबी कतारें लगी हैं । आज सवाल यह है कि क्या भारत को इस तस्वीर से कुछ सबक लेने की जरूरत है या नहीं । कुछ लोग कहेंगे कि नहीं, अब भारत में नहीं आयेगा। लेकिन मालुम हो कि चीन में फै ले कोराना के नए वैरिएंट बीफोर 7 के चार मरीज भारत में मिल चुके हैं।

इस बीच सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या कोरोना वायरस के डेल्टा, ऑमिक्रॉन वेरिएंट के बाद भारत में कोरोना का कोई नया वेरिएंट सामने आ सकता है? अगर कोरोना की नई लहर आती है तो उसके लिए भारत कितना तैयार है? भारत में वैक्सीनेशन, ऑक्सीजन सप्लाई, अस्पतालों में कोविड बेड, कोरोना सर्विलांस, टेस्टिंग और हेल्पलाइन जैसी सुविधाएं किस हाल में है? भारत ने पहले आई कोरोना की लहरों से कुछ सबक सीखा भी है या नहीं? हालांकि भारत में कोरोना के सक्रिय मामले फिलहाल चार हज़ार से कम हैं लेकिन एयरपोर्ट पर रैंडम टेस्टिंग शुरू की जा चुकी है । कोरोना के बढ़ते मामलों के बीच भारत में वैक्सीनेशन प्रोग्राम पर भी चर्चा शुरू हो गई है। यह बात दूसरी है कि भारत सरकार लोगों को वैक्सीन की दोनों डोज़ लगाने में कामयाब रही है । वैक्सीन से हम लोग इंफ़ेक्शन को तो नहीं रोक पाए लेकिन वायरस की सीवियरटी और मोर्टेलिटी (घातक असर और मृत्युदर) को काफी कम कर पाए हैं । भारत में क़रीब कोरोना के 22० करोड़ टीके लगाए जा चुके हैं। जिसमें से क़रीब 7 करोड़ व्यक्ति ऐसे हैं जिन्हें अभी वैक्सीन की दूसरी डोज़ नहीं लगी है। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ देश में इस वक्त क़रीब 92 प्रतिशत लोग ऐसे हैं जिन्हें कोरोना वैक्सीन की पहली डोज़ के बाद उसकी दूसरी डोज़ भी लग चुकी है, लेकिन वैक्सीन के मामले में कुछ राज्यों की हालात काफी ख़राब है ।

इसमें सबसे बड़ा नाम है झारखंड का है। यहां सिर्फ़ 74 प्रतिशत लोग ही ऐसे हैं जिन्होंने कोरोना वैक्सीन के पहले टीके के बाद दूसरा टीका भी लगवाया है। झारखंड के बाद मेघालय, नागालैंड, मणिपुर, चंडीगढ़ और महाराष्ट्र जैसे राज्यों के नाम आते हैं। वहीं आंध्र प्रदेश, जम्मू और कश्मीर, कर्नाटक ऐसे राज्य हैं जहां कोरोना वैक्सीन की दूसरी डोज़ का नंबर पहली डोज़ से भी ज्यादा है । लेकिन सवाल यह है कि क्या बूस्टर डोज़ कोरोना के किसी नए वेरिएंट के ख़िलाफ़ असरदार साबित होगी? और भारत में लोग बूस्टर डोज़ क्यों नहीं लगवा रहे हैं । स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक़ कोरोना की पहली डोज़ लगवाने वाले क़रीब 23 प्रतिशत लोगों ने ही अभी तक बूस्टर डोज़ लगवाई है। कोरोना की दूसरी लहर के दौरान अपने पति को सीपीआर देते हुए रेणु की तस्वीर देश में ऑक्सीज़न की कमी से पैदा हुए भयानक मंज़र का प्रतीक बन गई थी । न सिर्फ सड़कों पर बल्कि अस्पतालों में भर्ती मरीज़ भी ऑक्सीजन की कमी के चलते दम तोड़ रहे थे । गंगा किनारे शवों का ढेर देखा गया था । श्मशान घाटों पर लंबी कतारों को हम अभी भूले नहीं हैं । ऑक्सीजन की किल्लत से हुई मौतों का भले सरकार ने नाम नहीं लिया लेकिन उसकी कमी को ज़रूर महसूस किया। यही वजह थी कि नेशनल मेडिकल कमीशन ने सभी मेडिकल कॉलेजों के लिए प्रेशर अब्ज़ॉर्प्शन ऑक्सीजन जनरेशन प्लांट लगाने को अनिवार्य कर दिया । इसके अलावा केंद्र सरकार ने क़रीब चार लाख मेडिकल ऑक्सीजन सिलेंडर और क़रीब डेढ़ लाख ऑक्सीजन कंसन्ट्रेटर्स भी खरीदे हैं । लेकिन अपने देश में पिछली बार की तरह इस बार भी कोरोना के दौरान राजनीति होती साफ दिख रही है।

पिछली बार भी जब हम सब कोरोना की दूसरी लहर की चपेट में थे। तो देश की सबसे बड़ी पार्टी के नेता पश्चिम बंगाल के चुनाव में व्यस्त थे । उसके बाद यहां उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव कराये गये। इन चुनावों के बाद ही यहां कोरोना काल का ग्रास बनकर सामने आया था । अस्पतालों से लेकर सड़कों तक कतारें लगी थीं। न अस्पताल मरीज ले पा रहे थे, न श्मशान घाट शवों का अंतिम संस्कार कर पा रहे थे। इसी तरह इस बार भी केंद्र सरकार की ओर से राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा को कोरोना की सियासत का केंद्र बनाया गया है। जबकि कांग्रेस कह रही है कि भाजपा अपने कार्यक्रम रोके। अभी कुछ दिनों बाद उत्तर प्रदेश में बड़े पैमाने पर फिर भीड़ इकट्ठा होगी, जनसभाएं होंगी। क्योंकि यहां पर भी निकाय चुनाव की तारीखों का ऐलान जल्द होने वाला है। ऐसे में सरकार कोरोना ने अगर भारत में दस्तक दी तो वह कैसे निबटेगी, यह भी यक्ष सवाल है, क्योंकि संसाधन कितने भी हों पर मरीज बढ़ने पर वह ऊंट के मुंह में जीरा ही नजर आते हैं। सरकारें कितने भी दावें करें पिछले बार हम सबने बर्बादी और बदइंतजामी देखी है। शायद ही कोई ऐसा होगा जिसके परिजनों में कोई न कोई कोरोना की भोंट न चढ़ा हो। तमाम सारे अस्पताल ऐसे हैं जहां वेंटीलेटर तो खरीदे गये हैं लेकिन उनको चलाने वाला कोई नहीं है । इस बार उप्र के स्वास्थ्य मंत्री के सामने बड़ी चुनौती है पिछली बार वह चिट्ठी लिख रहे थे। इस बार खुद विभाग उनके पास है।

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