मंदिर, राम सेतु और राजनीति: कैसे बदलते रहे नेताओं के सुर

Ram Setu
संजय सक्सेना
संजय सक्सेना

Ram Setu भारतीय राजनीति में भगवान राम का नाम दशकों से एक संवेदनशील और विवादित विषय रहा है। समय-समय पर अलग-अलग दलों और नेताओं के बयानों ने इस मुद्दे को गर्माया है, और हर बार यह बहस नए सिरे से शुरू हो जाती है कि कौन राम के प्रति कैसा नजरिया रखता है। 2007 में केंद्र की कांग्रेस नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने सेतुसमुद्रम शिपिंग कैनाल प्रोजेक्ट के मामले में सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दाखिल किया था। इस हलफनामे में यह तर्क दिया गया था कि रामायण और अन्य धार्मिक ग्रंथ ऐतिहासिक दस्तावेज नहीं माने जा सकते, और इसलिए राम सेतु के अस्तित्व को पुरातात्विक या वैज्ञानिक प्रमाण के तौर पर स्वीकार नहीं किया जा सकता। इस हलफनामे पर देशभर में भारी विरोध हुआ, जिसके बाद सरकार को इसे वापस लेना पड़ा और तत्कालीन विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी मंत्री कपिल सिब्बल ने सार्वजनिक रूप से माफी मांगी थी। इस घटना को आज भी बीजेपी और अन्य हिंदुत्ववादी संगठन कांग्रेस के खिलाफ एक प्रमुख राजनीतिक हथियार के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

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समाजवादी पार्टी के संस्थापक मुलायम सिंह यादव का नाम राम मंदिर आंदोलन के दौर से जुड़ा रहा है। 1990 में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए उन्होंने कारसेवकों पर गोली चलवाने का आदेश दिया था, जिसे लेकर बीजेपी और हिंदुत्ववादी संगठन आज भी उन्हें निशाना बनाते हैं। संसद और सार्वजनिक मंचों पर उनके कुछ बयानों को लेकर भी विवाद हुए, जिनमें अयोध्या में राम जन्मभूमि के ऐतिहासिक प्रमाणों पर सवाल उठाने की बात कही जाती रही है। हालांकि, सपा नेता इन आरोपों को अक्सर संदर्भ से काटकर पेश किए जाने की बात कहते रहे हैं। ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ यह नारा 1993 के यूपी विधानसभा चुनाव के दौरान सपा-बसपा गठबंधन के खिलाफ बीजेपी और उसके समर्थकों की ओर से गढ़ा गया था, ताकि यह संदेश दिया जा सके कि सपा-बसपा गठबंधन हिंदुत्व की राजनीति के विरोध में खड़ा है। यह नारा आज भी चुनावी भाषणों में सपा को घेरने के लिए इस्तेमाल होता है।

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आज सपा प्रमुख अखिलेश यादव खुद को ‘हिंदू’ बताते हुए मंदिरों में पूजा-अर्चना करते और जनेऊ पहनते नजर आते हैं। आलोचक इसे चुनावी रणनीति बताते हैं, जबकि सपा नेताओं का कहना है कि यह उनकी निजी आस्था है और इसे राजनीतिक चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए।बिहार में राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव पर भी बीजेपी अक्सर यह आरोप लगाती है कि उनकी पार्टी की राजनीति मुस्लिम-यादव (MY) समीकरण पर आधारित है, और इस वजह से राम मंदिर जैसे मुद्दों पर उनका रुख हमेशा सतर्क और गोलमोल रहा है। राजद की ओर से इसे धर्मनिरपेक्षता की राजनीति बताया जाता है, न कि किसी धर्म-विशेष के प्रति दुराग्रह। AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी लंबे समय से बीजेपी और हिंदुत्ववादी संगठनों के निशाने पर रहे हैं। उन पर मुस्लिम तुष्टिकरण और हिंदू प्रतीकों से परहेज करने के आरोप लगते रहे हैं। ओवैसी खुद अक्सर इन आरोपों को खारिज करते हुए कहते हैं कि वे भारतीय संविधान और धर्मनिरपेक्षता में विश्वास रखते हैं, और किसी धर्म के प्रति उनका कोई पूर्वाग्रह नहीं है।

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हाल के वर्षों में संभल की जामा मस्जिद को लेकर हुए विवाद और वहां के सपा सांसद जिया उर रहमान बर्क के बयानों ने भी सुर्खियां बटोरीं। यह मुद्दा भी सांप्रदायिक राजनीति और मस्जिद-मंदिर विवादों की व्यापक बहस का हिस्सा बन गया। कुछ दलित और बौद्ध नेता भी राम मंदिर आंदोलन से खुद को दूर रखते आए हैं। इसके पीछे तर्क यह दिया जाता है कि बौद्ध धर्म और अंबेडकरवादी विचारधारा हिंदू धार्मिक प्रतीकों और वर्ण-व्यवस्था से जुड़े इतिहास को अलग नजरिए से देखते हैं। इसे धार्मिक विरोध की बजाय वैचारिक और सामाजिक असहमति के तौर पर देखा जाना ज्यादा उचित होगा। इस पूरे विमर्श का एक दूसरा पहलू भी है, जिसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। आलोचकों का तर्क है कि ‘कौन राम का नाम लेता है और कौन नहीं’ इस आधार पर नेताओं को कठघरे में खड़ा करना खुद एक राजनीतिक हथियार बन चुका है, जिसका इस्तेमाल चुनावों में ध्रुवीकरण के लिए किया जाता है।

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विपक्षी दलों का कहना है कि आस्था एक निजी विषय है, और किसी नेता के धार्मिक बयान या मौन को उसकी राष्ट्रभक्ति या देशप्रेम से जोड़ना गलत मिसाल कायम करता है। वहीं बीजेपी और उसके समर्थकों का तर्क है कि जब कोई सार्वजनिक पद पर बैठा व्यक्ति बहुसंख्यक आस्था से जुड़े प्रतीकों पर सवाल उठाता है, तो जनता को उसका जवाब मांगने का अधिकार है। लब्बोलुआब यह है कि राम मंदिर और राम सेतु जैसे मुद्दे भारतीय राजनीति में आस्था, पहचान और सामाजिक न्याय की जटिल परतों को उजागर करते हैं। यह बहस जितनी धार्मिक है, उतनी ही राजनीतिक और सामाजिक भी। किसी नेता के बयान या मौन को समझने के लिए उसके पूरे संदर्भ, समय और परिस्थिति को ध्यान में रखना जरूरी है, ताकि एकतरफा या अधूरी तस्वीर पेश करने से बचा जा सके।

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