अनुभव बनाम प्रतियोगिता : क्या कार्यरत शिक्षकों के लिए समान मापदंड उचित हैं?

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TET for in-service teachers
    रीना  त्रिपाठी                                                       

अध्यक्ष, महिला प्रकोष्ठ ,सर्वजन हिताय संरक्षण समिति।

 TET for in-service teachers :  उत्तर प्रदेश में जुलाई 2026 में आयोजित शिक्षक पात्रता परीक्षा (TET) केवल एक सामान्य पात्रता परीक्षा नहीं रही, बल्कि इसने शिक्षा व्यवस्था, शिक्षक अनुभव और नीति निर्माण को लेकर नई बहस छेड़ दी है। सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के बाद 23 अगस्त 2010 से पहले नियुक्त इन-सर्विस (कार्यरत) शिक्षकों के लिए भी TET उत्तीर्ण करना अनिवार्य कर दिया गया है। हालांकि न्यायालय ने इस परीक्षा को पास करने की समय-सीमा 31 अगस्त 2028 तक बढ़ा दी है, लेकिन इस फैसले ने वर्षों से शिक्षण कार्य कर रहे लाखों शिक्षकों के सामने नई चुनौती खड़ी कर दी है। वर्ष 2010 से पहले शिक्षक भर्ती की प्रक्रिया वर्तमान व्यवस्था से अलग थी।

उस समय TET जैसी पात्रता परीक्षा अनिवार्य नहीं थी। शिक्षकों की नियुक्ति निर्धारित शैक्षणिक योग्यता, मेरिट और तत्कालीन भर्ती नियमों के आधार पर हुई थी। वहीं, 2010 के बाद नियुक्त सभी शिक्षकों के लिए TET पास करना अनिवार्य कर दिया गया। ऐसे में दोनों वर्गों की भर्ती प्रक्रिया और परिस्थितियां पूरी तरह अलग रही हैं। आज जिन शिक्षकों को दोबारा परीक्षा देनी पड़ रही है, वे पिछले 15 से 20 वर्षों से विद्यालयों में बच्चों को शिक्षा दे रहे हैं। उन्होंने केवल पाठ्यक्रम पूरा नहीं कराया, बल्कि विद्यार्थियों के व्यक्तित्व विकास, नैतिक मूल्यों और सामाजिक चेतना के निर्माण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ऐसे अनुभवी शिक्षकों को एक बार फिर प्रतियोगी परीक्षा के मानकों पर परखना स्वाभाविक रूप से कई सवाल खड़े करता है।

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स्थिति इसलिए भी चुनौतीपूर्ण है क्योंकि इन वर्षों में बेसिक शिक्षा के शिक्षकों को केवल शिक्षण कार्य तक सीमित नहीं रखा गया। उन्हें चुनाव ड्यूटी, मतदाता सूची पुनरीक्षण, जनगणना, विभिन्न भर्ती परीक्षाओं, बीएलओ कार्य और कई सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन जैसी अतिरिक्त जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ीं। इन सबके बीच प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी के लिए पर्याप्त समय निकालना आसान नहीं था। इसके बावजूद लाखों कार्यरत शिक्षकों ने परीक्षा में शामिल होकर अपनी जिम्मेदारी और कर्तव्यनिष्ठा का परिचय दिया। निश्चित रूप से बड़ी संख्या में शिक्षक सफल होंगे, लेकिन यह भी सच है कि उनकी प्रतिस्पर्धा उन अभ्यर्थियों से है जिन्होंने हाल ही में बी.एड. या डी.एल.एड. की पढ़ाई पूरी की है और जिनकी तैयारी पूरी तरह प्रतियोगी परीक्षाओं पर केंद्रित रही है।

ऐसे में शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार और नीति-निर्माताओं को इस विषय पर संतुलित और संवेदनशील दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। यदि उद्देश्य केवल न्यूनतम पात्रता सुनिश्चित करना है, तो कार्यरत शिक्षकों के वर्षों के अनुभव, सेवा रिकॉर्ड, विद्यार्थियों के प्रदर्शन और उनके शैक्षणिक योगदान को भी मूल्यांकन का हिस्सा बनाया जा सकता है। आवश्यकता पड़ने पर इन-सर्विस शिक्षकों के लिए अलग कट-ऑफ या पृथक मूल्यांकन प्रणाली पर भी विचार किया जा सकता है।

एक शिक्षक की क्षमता का आकलन केवल लिखित परीक्षा से नहीं किया जा सकता। उसकी वास्तविक योग्यता उसके वर्षों के अनुभव, विद्यार्थियों के विकास और समाज पर पड़े सकारात्मक प्रभाव से भी तय होती है। शिक्षा व्यवस्था का लक्ष्य केवल परीक्षा पास कराना नहीं, बल्कि जिम्मेदार और जागरूक नागरिक तैयार करना है। इसलिए गुणवत्ता बनाए रखने के साथ-साथ वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों के अनुभव और सम्मान के बीच संतुलन स्थापित करना समय की आवश्यकता है।

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