दबंगों, सरकारी शोहदों की पिटाई और धमकियां खाता देश का चौथा खंभा

Journalist Protection Act India

पत्रकारों की सुरक्षा के लिए केंद्र के एक एडवाइजरी पर काम कर रहीं राज्य सरकारें

देश में पत्रकारों की सुरक्षा के लिए किसी कड़े कानून का अभाव

ड्यूटी के दौरान पत्रकारों की सुरक्षा का वैश्विक संकट

  रंजन कुमार सिंह

Journalist Protection Act India : पत्रकारों को फ़ील्ड रिपोर्टिंग के दौरान सरकारी कर्मचारियों द्वारा मारपीट या दुर्व्यवहार से बचाने के लिए एक सख्त और प्रभावी ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ (Journalist Protection Act) का होना अत्यंत आवश्यक है। निष्पक्ष पत्रकारिता लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है, इसलिए पत्रकारों को बिना किसी डर के काम करने का अधिकार मिलना चाहिए।सरकारी कर्मचारियों के लिए मौजूद सुरक्षा: सरकारी कर्मचारियों के काम में बाधा डालने, उनके साथ मारपीट या दुर्व्यवहार करने पर उन्हें बचाने और दोषियों को दंडित करने के लिए भारतीय दंड संहिता (IPC) और नए कानूनों में स्पष्ट प्रावधान हैं। पत्रकारों के लिए कानून की आवश्यकता क्यों?निष्पक्ष रिपोर्टिंग: नेताओं और सरकारी अधिकारियों के भ्रष्टाचार या अनियमितताओं को उजागर करते समय पत्रकारों को धमकियों और शारीरिक हिंसा का सामना करना पड़ता है। असमानता: जब सरकारी कर्मचारियों के पक्ष में विशेष कानूनी संरक्षण है, तो जनता के हित में सच दिखाने वाले पत्रकारों को भी समान सुरक्षा मिलनी चाहिए।

संवैधानिक अधिकार : प्रेस की स्वतंत्रता भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(ए) के तहत एक मौलिक अधिकार है। इस अधिकार की रक्षा के लिए ठोस कानून जरूरी है। क्या भारत में ऐसा कोई कानून है? केंद्रीय स्तर पर अभी तक कोई विशिष्ट ‘पत्रकार सुरक्षा कानून’ नहीं बना है। केंद्र सरकार का रुख यह है कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए जो सामान्य कानून (जैसे IPC ) हैं, वे पर्याप्त हैं ।हालांकि, पत्रकारों पर लगातार हो रहे हमलों के कारण लंबे समय से इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर एक अलग कानून बनाने की मांग की जा रही है।

उदाहरण के लिए, संसद में भी पत्रकार (हिंसा और संपत्ति को नुकसान या हानि की रोकथाम) विधेयक, 2022 पेश किया गया था कुछ राज्यों ने इस दिशा में पहल की है। महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ जैसे कुछ राज्यों में मीडियाकर्मियों की सुरक्षा के लिए विशेष कानून पारित किए गए हैं। महाराष्ट्र में भी पत्रकारों और मीडिया संस्थानों की सुरक्षा के लिए ‘महाराष्ट्र मीडियाकर्मी एवं मीडिया संस्थान (हिंसा एवं संपत्ति क्षति या हानि निवारण) अधिनियम, 2017’ पारित किया गया है। यह कानून अक्टूबर 2019 में लागू किया गया था, जिसके बाद महाराष्ट्र ऐसा कानून बनाने वाला देश का पहला राज्य बन गया। इस महाराष्ट्र पत्रकार सुरक्षा कायदा के प्रमुख प्रावधान इस प्रकार हैं।

सजा और जुर्माना : पत्रकारों पर हमला करने, उन्हें नुकसान पहुँचाने या मीडिया संस्थानों की संपत्ति को नष्ट करने वालों के लिए तीन साल तक की जेल और 50,000 रुपये तक के जुर्माने का प्रावधान है।

गैर-जमानती अपराध : पत्रकारों पर हमला करना एक संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आता है। मुआवजा: दोषी पाए जाने पर हमलावर से पीड़ित पत्रकार के इलाज का खर्च और संपत्ति के नुकसान की भरपाई (मुआवजा) भी वसूली जाती है। कवरेज का दायरा: यह सुरक्षा केवल पूर्णकालिक पत्रकारों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें फ्रीलांस (freelance) और संविदा (contract) पर काम करने वाले पत्रकार भी शामिल हैं। जांच का स्तर: इस तरह के मामलों की जांच पुलिस उपाधीक्षक (Deputy SP) या उससे उच्च स्तर के पुलिस अधिकारी द्वारा ही की जाती है।इस कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए, यदि कोई पत्रकार हमले की झूठी शिकायत दर्ज करवाता है, तो उसके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई का प्रावधान है।

सनद रहे कि पत्रकारों की सुरक्षा के लिए कोई केंद्रीय या संघीय कानून नहीं है। केंद्र सरकार ने पत्रकारों की सुरक्षा हेतु राज्य सरकारों को मात्र एडवाइजरी जारी किया है। भारत के बाहर के देशों में भी पत्रकारों की सुरक्षा को लेकर इनके संगठन लगातार चिंतित हैं और सभी देशों में इस हेतु एक केंद्रीय एकीकृत कानून बनाने के लिए UNO पर दबाव बना रहे हैं। यूएन की International Media Support जैसी संस्थाएं और Committee to Protect Journalists दबाव बना रहे हैं कि सभी देशों के द्वारा पत्रकारों की सुरक्षा के लिए ‘राष्ट्रीय सुरक्षा तंत्र’ बनाए जाएं। शायद आने वाले समय में ये संभव हो और अखबारनवीस और मीडिया कर्मी निर्भय होकर काम कर सकें। पत्रकारों को ड्यूटी के दौरान पीटने और प्रताड़ित करने के कई गंभीर मामले सामने आए हैं, जहाँ उन्हें माफिया, राजनीतिक समर्थकों या असामाजिक तत्वों द्वारा निशाना बनाया गया।

झारखंड (2026) : हजारीबाग में मंत्री इरफान अंसारी के समर्थकों द्वारा और रांची या अन्य जगहों पर काम कर रहे पत्रकारों को कवरेज के दौरान पीटने और प्रताड़ित करने का मामला सामने आया – इस पर अंतरराष्ट्रीय संस्था Committee to Protect Journalists (CPJ) ने कड़ी जांच की मांग की।

महाराष्ट्र (2025):  पुणे के पास मंचर में अवैध निर्माण पर रिपोर्टिंग कर रहीं महिला पत्रकार स्नेहा बारवे पर रॉड से जानलेवा हमला हुआ और उन्हें गंभीर चोटें आईं।

मध्य प्रदेश (2025): इंदौर में क्षेत्रीय परिवहन कार्यालय (RTO) में भ्रष्टाचार की जांच कर रहे ‘News 24’ के पत्रकार हेमंत शर्मा और कैमरामैन राजा खान को बंधक बनाकर पीटा गया और उनके कैमरे तोड़ दिए गए।

उत्तर प्रदेश (2025): हमीरपुर में एक पत्रकार और आरटीआई कार्यकर्ता को गांव के सरपंच और उसके साथियों ने अगवा कर लिया, नंगा करके पीटा और उनके प्राइवेट पार्ट में बोतल तक डालने की कोशिश की। इसके अलावा गाजियाबाद के दिल्ली गेट इलाके में भी एक पत्रकार को एक दर्जन से ज्यादा लोगों ने बेरहमी से पीटा, जिससे उनके हाथ में फ्रैक्चर हो गया। बिहार (2018-2019): स्थानीय माफिया व बालू कारोबारियों के खिलाफ खबर लिखने के कारण दैनिक भास्कर के स्ट्रिंगर नवीन निश्चल और स्वतंत्र पत्रकार विजय सिंह की सासाराम हाईवे पर एक एसयूवी गाड़ी से कुचलकर हत्या कर दी गई।

विदेशों में भी पत्रकारों को ड्यूटी के दौरान प्रताड़ित करने के अनेक दृष्टांत मौज़ूद हैं। प्रमुख घटनाओं में युद्ध क्षेत्रों में पत्रकारों पर हमले, मनमाने ढंग से गिरफ्तारी और परिवार को धमकाना शामिल हैं। खतरनाक देशों में Committee to Protect Journalists (CPJ) और अंतर्राष्ट्रीय पत्रकार संघ (IFJ) जैसी संस्थाओं ने पत्रकारों की बड़े पैमाने पर हत्याओं और गिरफ्तारी का दस्तावेजीकरण किया है। अफ़ग़ानिस्तान में तालिबान द्वारा शारीरिक उत्पीड़न। काबुल में महिलाओं के प्रदर्शनों को कवर करने के दौरान, तालिबान ने कई स्थानीय पत्रकारों को हिरासत में लिया और उन्हें इतनी बेरहमी से पीटा कि वे बेहोश हो गए। इज़राइल-गाजा संघर्ष और पत्रकार।

अंतरराष्ट्रीय और स्थानीय मीडिया टीमों को युद्ध की रिपोर्टिंग करने के दौरान कई जोखिमों का सामना करना पड़ता है। गाजा में ड्यूटी के दौरान पत्रकारों की हत्या के मामले DW News में काफी अधिक रहे हैं। इरिट्रियन पत्रकार दावित इसहाक (Dawit Isaak) बिना किसी मुकदमे के जेल में बंद हैं। Raoul Wallenberg Centre, जो प्रेस की स्वतंत्रता के दमन का सबसे बड़ा उदाहरण है। फ्रांस में अज़रबैजान सरकार के खिलाफ वीडियो बनाने वाले एक निर्वासित ब्लॉगर पर दबाव बनाने के लिए, बाकू में उनके परिवार को निशाना बनाया गया, जिसमें उनकी बहन के अंतरंग वीडियो टेलीग्राम पर लीक किए गए। चीन और रूस में दर्जनों पत्रकारों को राष्ट्रीय सुरक्षा, ‘विदेशी एजेंट’ कानून और झूठी सूचना फैलाने जैसे फर्जी आरोपों में सलाखों के पीछे डाल दिया गया है।


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