यूपी में अखिलेश को भी लग सकता है ममता वाला झटका

राजनीति
अजय कुमार                             
अजय कुमार

पश्चिम बंगाल में बीजेपी की शानदार जीत का जो तूफान आया है, उसने पूरे देश को झंझोर के रख दिया है। वहां की जनता, खासकर हिंदू समुदाय ने एकजुट होकर ममता बनर्जी की तुष्टिकरण की राजनीति को करारा जवाब दिया। राज्य में वर्षों से चली आ रही मुस्लिम तुष्टिकरण की राजनीति के खिलाफ हिंदुओं ने वोट की ताकत से विद्रोह कर दिया। यह कहना गलत नहीं होगा कि जिस तरह से बीजेपी को हराने के लिये मुस्लिम वोटर तुष्टिकरण की सियासत करने वालों के पक्ष में लामबंद होते हैं, उसी तरह से अब हिन्दू वोटर बीजेपी के पक्ष में एकजुट होकर वोटिंग करने लगे हैं। अब सवाल उठ रहा है कि क्या उत्तर प्रदेश में भी यही इतिहास दोहराया जाएगा? यहां समाजवादी पार्टी के प्रमुख अखिलेश यादव की मुस्लिम तुष्टिकरण की सियासत को एकजुट हिंदू वोटर रोक देंगे? क्या अब जात-पात के नाम पर हिंदू समाज बंटेगा नहीं? और क्या पश्चिम बंगाल को फतह करने वाले रणनीतिकार सुनील बंसल एक बार फिर उत्तर प्रदेश की चुनावी जंग में कमान संभालकर भाजपा को विजयी बनाएंगे, जैसे उन्होंने 2017 में किया था?

उत्तर प्रदेश की राजनीति हमेशा से ही जटिल रही है। यहां सत्ता का खेल जातिगत समीकरणों पर टिका होता है। समाजवादी पार्टी ने लंबे समय से मुस्लिम वोट बैंक को मजबूत करने पर जोर दिया है। अखिलेश यादव ने अपनी रणनीति में मुस्लिम समुदाय को लुभाने के लिए कई कदम उठाए। पंचायत चुनावों में मुस्लिम उम्मीदवारों को टिकट बांटना, उनके क्षेत्रों में विकास के नाम पर विशेष योजनाएं चलाना और हिंदू त्योहारों पर विवादास्पद बयान देकर तुष्टिकरण का राग अलापना, ये सब उनकी सियासत का हिस्सा बने। लेकिन पश्चिम बंगाल का उदाहरण सबके सामने है। वहां ममता बनर्जी ने भी इसी फॉर्मूले पर दांव लगाया था। रामनवमी पर जुलूसों पर पाबंदी लगाना, हिंदू मंदिरों के आसपास दुकानों पर कार्रवाई और मुस्लिम समुदाय को वोट के बदले लाभ पहुंचाना, इन सबने हिंदुओं को जगा दिया। नतीजा सबके सामने है। भाजपा ने वहां हिंदू एकता का झंडा बुलंद किया और भारी सफलता हासिल की। पश्चिम बंगाल के नतीजे आने के बाद उत्तर प्रदेश के हिंदू वोटर भी अब यूनाइट होने की बात करने लगे हैं। सोशल मीडिया पर चर्चाएं गर्म हैं, धार्मिक आयोजनों में राजनीतिक संदेश गूंज रहे हैं और जातिगत बंटवारे की पुरानी चाल अब काम नहीं आ रही।

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पश्चिम बंगाल की जीत में भाजपा के रणनीतिकार सुनील बंसल की भूमिका अहम रही। उन्होंने हिंदू एकता पर जोर दिया। बंगाल के हर कोने में हिंदू समाज को एक सूत्र में बांधने के लिए सूक्ष्म रणनीति बनाई। गांव-गांव जाकर कार्यकर्ताओं को प्रशिक्षित किया, धार्मिक नेताओं से संपर्क साधा और मुस्लिम तुष्टिकरण के खिलाफ जन जागरण अभियान चलाया। 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी सुनील बंसल ने यही जादू दिखाया था। तब भाजपा ने जातिगत समीकरण तोड़े। ब्राह्मण, ठाकुर, दलित, ओबीसी सभी को एक मंच पर लाकर अखिलेश की सपा को पटखनी दी। योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में हिंदुत्व का मुद्दा उठा और विकास के वादों ने वोटरों को लुभाया। आज फिर वही हालात हैं। उत्तर प्रदेश में आगामी विधानसभा चुनाव नजदीक आते ही सुनील बंसल की वापसी की चर्चा जोरों पर है। क्या वे एक बार फिर कमान संभालेंगे? उनके पास अनुभव है, नेटवर्क है और हिंदू एकता का मंत्र है। अगर भाजपा उन्हें जिम्मेदारी सौंपती है, तो अखिलेश की राह कठिन हो जाएगी।

दरअसल, उत्तर प्रदेश के चुनावी समीकरण अब बदल चुके हैं। पहले हिंदू वोट जाति के आधार पर बंटते थे। जाटव दलित बसपा की ओर, यादव सपा की तरफ, ब्राह्मण और ठाकुर भाजपा के साथ। लेकिन अब हिंदू एकता का दौर चल पड़ा है। पश्चिम बंगाल की तर्ज पर यहां भी राम मंदिर निर्माण, काशी विश्वनाथ कॉरिडोर और अयोध्या विकास ने हिंदुओं को जोड़ा है। सोशल मीडिया ने जागरूकता फैलाई है। हर छोटे-बड़े हिंदू नेता अब तुष्टिकरण के खिलाफ बोल रहे हैं। अखिलेश की सपा अब सिर्फ मुस्लिम वोट पर निर्भर नहीं रह सकती। उनके पास मुस्लिम तुष्टिकरण के अलावा कुछ अन्य रास्ते खुले हैं। सबसे बड़ा रास्ता है युवाओं को लुभाना। सपा ने पहले भी लैपटॉप वितरण जैसी योजनाओं से युवा वोट हासिल किया था। अब वे बेरोजगारी, किसान कर्जमाफी और ग्रामीण विकास पर जोर दे सकते हैं। दूसरा रास्ता है गठबंधन की राजनीति। बसपा के साथ पुराना गठजोड़ दोहराना या छोटी जातियों को साधना। लेकिन सबसे चुनौतीपूर्ण होगा हिंदू ओबीसी वोट को तोड़ना। कुर्मी, मौर्य, निषाद जैसे समुदायों को सपा ने कभी मजबूत नहीं किया। अगर अखिलेश इनके लिए विशेष आरक्षण या योजनाएं घोषित करें, तो कुछ सफलता मिल सकती है। तीसरा रास्ता है विकास का। पूर्वांचल एक्सप्रेसवे, गंगा अभियान और शहरीकरण जैसे मुद्दों पर सपा अगर ठोस वादे करे, तो शहरी हिंदू वोटर आकर्षित हो सकते हैं। लेकिन इन सबके बावजूद मुस्लिम तुष्टिकरण छोड़ना होगा, वरना हिंदू एकता सबको नेस्तनाबूद कर देगी।

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इस सबके बीच यह हकीकत है कि उत्तर प्रदेश की सियासत में हवा का रुख बदल रहा है। पश्चिम बंगाल ने साबित कर दिया कि तुष्टिकरण की राजनीति का अंत हो चुका। यहां के हिंदू वोटर अब जाति से ऊपर उठकर सोच रहे हैं। भाजपा के पास योगी आदित्यनाथ जैसा मजबूत नेता है, जो बुलडोजर कार्रवाई से अपराधियों पर शिकंजा कस रहा है। कानून-व्यवस्था सुधरी है, माफिया खत्म हो रहे हैं। ये सब हिंदू समाज को भरोसा दे रहे हैं। सुनील बंसल अगर लौटे, तो उनकी रणनीति फिर कमाल करेगी। वे हर जिले में बूथ स्तर पर कार्यकर्ताओं को सक्रिय करेंगे, हिंदू संगठनों से गठजोड़ बनाएंगे और अखिलेश की कमजोरियों पर प्रहार करेंगे। सपा के पास मुस्लिम तुष्टिकरण के अलावा युवा, किसान और विकास के मुद्दे हैं, लेकिन इनका असर तभी होगा जब वे हिंदू वोट को नजरअंदाज न करें। अखिलेश को समझना होगा कि वोट बैंक की राजनीति अब पुरानी हो चुकी। एकजुट हिंदू वोटर अब किसी की नहीं सुनेंगे। वे सिर्फ अपने हितों की रक्षा करेंगे।

कुल मिलाकर, इस आज की तारीख में यूपी की चुनावी जंग में भाजपा का पलड़ा भारी लग रहा है। पश्चिम बंगाल की जीत ने पूरे देश में संदेश दिया है। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों से लेकर शहरों तक हिंदू समाज में उत्साह है। धार्मिक उत्सवों में राजनीतिक बहसें हो रही हैं। लोग कह रहे हैं, अब जात-पात नहीं, हिंदू एकता ही जीतेगी। अखिलेश अगर नहीं चेते, तो सपा का सफर मुश्किल होगा। सुनील बंसल की वापसी भाजपा के लिए वरदान साबित हो सकती है। 2017 की तरह वे फिर इतिहास रच सकते हैं। कुल मिलाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति एक नए मोड़ पर है। तुष्टिकरण की हवा निकल चुकी, अब एकता का दौर शुरू हो गया।


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