जानकी नवमी आज: जानें शुभ मुहूर्त व पूजा विधि, कथा और महत्व

Mother Sita
राजेन्द्र गुप्ता

वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को माता सीता की जयंती मनाई जाती है। इसे सीता नवमी या जानकी नवमी के नाम से जाना जाता है। इस दिन को माता सीता के धरती पर अवतरण की तिथि माना जाता है। इस वर्ष सीता नवमी या जानकी नवमी 25 अप्रैल को मनाई जाएगी। इस वर्ष वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि 25 अप्रैल को सीता नवमी या जानकी नवमी मनाई जाएगी। इस दिन भक्त व्रत रखकर माता सीता की विधि-विधान से पूजा करेंगे।

सीता नवमी कब है? 

वैशाख कृष्ण नवमी को सीता नवमी का व्रत रखा जाता है। वैदिक पंचांग की गणना के अनुसार, नवमी तिथि 24 अप्रैल, शुक्रवार को शाम 7 बजकर 22 मिनट से शुरु होकर अगले दिन 25 अप्रैल, शनिवार को शाम 6 बजकर 29 मिनट पर समाप्त होगी। हिंदू धर्म में सूर्योदय के समय विद्यमान तिथि को व्रत और त्योहार के लिए सबसे उत्तम माना जाता है। ऐसे में उदया तिथि के अनुसार, 25 अप्रैल 2026, शनिवार के दिन सीता नवमी मनाई जाएगी।

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सीता नवमी की पूजा विधि

सीता नवमी को विधि-विधान से माता सीता की पूजा से भक्तों पर माता सीता की असीम कृपा होती है। सीता नवमी की पूजा के लिए व्रत के दिन सुबह जल्दी उठकर स्नान आदि कर तन मन से पवित्र होकर व्रत का संकल्प करना चाहिए। पूजा की चौकी पर लाल रंग का वस्त्र बिछाकर माता सीता का भगवान राम, लक्ष्मण और हनुमान जी के साथ चित्र स्थापित करें। राम दरबार के चित्र को गंगा जल से अभिषेक कराएं और कुमकुम रोली व अक्षत से तिलक करें। सभी देवी देवताओं को पीले फूलों की माला चढ़ाएं और देसी घी से दीये जलाएं। फल फूल, रोली अक्षत चढ़ाएं और मखाने की खीर से भोग लगाएं। सीता नवमी के दिन रामायण पाठ बहुत शुभ माना जाता है। इस दिन भजन कीर्तन का आयोजन करें और राम मंदिर जाकर प्रभु श्रीराम और माता जानकी के दर्शन करें। सीता नवमी को राम नवमी की तरह ही पवित्र और शुभ माना जाता है। इस दिन विधि-विधान से प्रभु श्रीराम और माता सीता की पूजा करनी चाहिए। इससे वैवाहिक जीवन सुखमय होता है और महादान के बराबर पुण्य प्राप्त होता है।

माता सीता की जन्म की कथा

वाल्मीकि रामायण के अनुसार एक बार मिथिला में भयंकर सूखा पड़ा था। इससे राजा जनक बेहद परेशान थे। इस समस्या से छुटकारा पाने के लिए उन्हें एक ऋषि ने यज्ञ करने  और खुद धरती पर हल चलाने का मंत्र दिया। राजा जनक ने अपनी प्रजा के लिए यज्ञ करवाया और फिर धरती पर हल चलाने लगे। तभी उनका हल धरती के अंदर किसी वस्तु से टकराया। मिट्टी हटाने पर उन्हें वहां सोने की डलिया में मिट्टी में लिपटी एक सुंदर कन्या मिली। जैसे ही राजा जनक सीता जी को अपने हाथ से उठाया, वैसे ही तेज बारिश शुरू हो गई। राजा जनक ने उस कन्या का नाम सीता रखा और उसे अपनी पुत्री के रूप में स्वीकार किया।


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