अमेरिका-ईरान सीजफायर: पाक की कूटनीतिक जीत, ‘विश्व गुरु’ पर उठे सवाल

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संजय सक्सेना

अमेरिका-ईरान सीजफायर: दुनिया की राजनीति में कभी-कभी ऐसे मोड़ आते हैं जो किसी देश की पहचान और उसकी विदेश नीति की असली परीक्षा लेते हैं। पिछले कुछ महीनों में जो कुछ हुआ, वह भारत के लिए एक गहरी सोच का विषय है। अमेरिका और ईरान के बीच चल रही जंग को रोकने में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज़ शरीफ़ और सेना प्रमुख आसिम मुनीर ने जो भूमिका निभाई, उसने पूरी दुनिया का ध्यान खींचा। ट्रंप ने खुद अपने बयान में साफ़ कहा कि पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शरीफ़ और फील्ड मार्शल मुनीर के अनुरोध पर उन्होंने ईरान पर होने वाले हमले को रोका और दो हफ्ते का संघर्ष विराम स्वीकार किया। यह कोई छोटी बात नहीं थी  यह उस वक़्त हुआ जब दुनिया एक बड़े युद्ध के मुहाने पर खड़ी थी। इससे पहले भी अक्टूबर में मिस्र के शर्म अल-शेख में आयोजित शांति सम्मेलन में ट्रंप ने मंच से शहबाज़ शरीफ़ को धन्यवाद दिया और आसिम मुनीर को मेरा पसंदीदा फील्ड मार्शल कहा। गाज़ा में युद्ध विराम नौ अक्टूबर को लागू हुआ और इस पूरी प्रक्रिया में पाकिस्तान की भूमिका को खुलकर सराहा गया। भारत उस वक़्त कहाँ था? यह सवाल अब सिर्फ़ विपक्षी नेता नहीं, बल्कि दुनिया के कूटनीतिक हलके भी पूछ रहे हैं।भारत की विदेश नीति की एक पुरानी और मज़बूत परंपरा रही है। द्विपक्षीय संबंध, किसी गुट में न जाना, और अपनी स्वायत्तता बनाए रखना। यही नीति नेहरू के ज़माने से चली आ रही है और मोदी सरकार भी इसी रास्ते पर चलती दिखती है। लेकिन आज की दुनिया में जहाँ कूटनीति की जगह संबंधों की गर्मजोशी और व्यक्तिगत रिश्ते तय करते हैं कि किसकी बात मानी जाएगी, वहाँ यह पुरानी नीति काफ़ी नहीं रह गई।मोदी और ट्रंप के बीच व्यक्तिगत रिश्ता हमेशा से चर्चा में रहा है। “हाउडी मोदी” और “नमस्ते ट्रंप” जैसे विशाल कार्यक्रम इसी गर्मजोशी की गवाही देते हैं। लेकिन जब ट्रंप ने बार-बार पचास से ज़्यादा मौकों पर कहा कि उन्होंने भारत-पाकिस्तान के बीच युद्ध विराम करवाया, तो भारत ने इसे मानने से इनकार कर दिया और कहा कि यह विराम दोनों देशों के बीच सीधी बातचीत से हुआ। पाकिस्तान ने उसी पल को भाँप लिया और उस खाली जगह को भरने के लिए आगे बढ़ गया।

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विश्लेषकों का कहना है कि भारत के उदास इनकार ने एक ऐसी जगह बना दी जिसे मुनीर और शरीफ़ ने तुरंत भर दिया। यह क्या भारत की कूटनीति की एक बड़ी चूक थी। ट्रंप जैसे नेता को श्रेय देना एक छोटी कीमत होती, लेकिन उस श्रेय को न देने की कीमत बहुत बड़ी निकली। पाकिस्तान ने ट्रंप की हर उपलब्धि पर तालियां बजाईं, उन्हें शांति का दूत कहा, और काहिरा के शांति सम्मेलन में शरीफ़ ने ट्रंप को नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित तक कर दिया। यह चाहे राजनीतिक चालाकी हो या असली सम्मान, इसने पाकिस्तान को वाशिंगटन की नज़रों में एक भरोसेमंद साझेदार बना दिया।अब सवाल उठता है कि भारत ने मध्य पूर्व में शांति के लिए सक्रिय भूमिका क्यों नहीं निभाई। इसके पीछे कई कारण हैं। पहला भारत की नीति रही है कि वह इजरायल और फिलिस्तीन दोनों से अपने संबंध बनाए रखे। भारत के इजरायल से गहरे रक्षा और तकनीकी संबंध हैं और वह उस पर सार्वजनिक दबाव डालने की स्थिति में नहीं है। दूसरा भारत अरब और मुस्लिम देशों के गुट का हिस्सा नहीं है, इसलिए गाज़ा पर उसकी आवाज़ का वह असर नहीं होता जो पाकिस्तान, तुर्किये या मिस्र की होती है। तीसरा भारत का पूरा ध्यान अपने क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान से संतुलन बनाने पर लगा है, वैश्विक शांति का मध्यस्थ बनने की राजनीतिक इच्छाशक्ति अभी तक नहीं दिखी।लेकिन इस सबके बावजूद एक कड़वी सच्चाई है। पाकिस्तान को इस पूरी कवायद का जो फायदा मिला, वह यह है कि अमेरिका और पाकिस्तान के संबंध अब नई ऊँचाइयों पर हैं  व्यापार, खनिज, सुरक्षा सहयोग, और क्षेत्रीय रणनीति, सब कुछ एक साथ आगे बढ़ रहा है। ट्रंप ने पाकिस्तानी निवेश के द्वार भी खोले और मुनीर को एक ऐसे नेता की तरह पेश किया जिस पर अमेरिका भरोसा करता है। यह पाकिस्तान की उस छवि से बिल्कुल अलग है जो दशकों से आतंकवाद के समर्थक के रूप में बनी थी।

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भारत की अंतरराष्ट्रीय छवि पर इसका सीधा असर पड़ रहा है। जो देश खुद को विश्वगुरु और एक उभरती हुई महाशक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, वह जब वैश्विक संकट के समय चुप्पी साधे रहता है, तो दुनिया सवाल पूछती है। भारत संयुक्त राष्ट्र की सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता की मांग करता है, लेकिन जब बड़े युद्धों को रोकने की बात आती है, तो उसकी भूमिका नदारद रहती है।यह भी ध्यान देने योग्य है कि यह सब उस पृष्ठभूमि में हो रहा है जहाँ मई में भारत और पाकिस्तान के बीच हुए संघर्ष और उसके बाद के युद्ध विराम को लेकर भारत के भीतर ही विपक्ष ने यह आरोप लगाया कि यह ट्रंप के दबाव में स्वीकार किया गया। यानी एक तरफ़ भारत कह रहा है कि वह किसी बाहरी दबाव में नहीं झुका, और दूसरी तरफ़ पाकिस्तान उसी दबाव को अपनी कूटनीतिक उपलब्धि बताकर दुनिया के सामने परोस रहा है। इस कथा-युद्ध में पाकिस्तान आगे निकल गया। असली सवाल यह है कि भारत आगे क्या करेगा। क्या वह अपनी पुरानी नीति पर कायम रहेगा, या वह भी अब सक्रिय कूटनीति की राह पकड़ेगा? दुनिया तेजी से बदल रही है। जो देश अपनी ताकत का इस्तेमाल केवल अपनी सीमाओं की रक्षा के लिए करते हैं, वे महाशक्ति नहीं बनते। महाशक्ति वह बनता है जो दूसरों के संकट में भी अपनी आवाज़ उठाने की हिम्मत रखता हो और जिसकी बात सुनी जाती हो। पाकिस्तान ने, अपनी तमाम आंतरिक कमजोरियों के बावजूद, यह साबित किया है कि सही वक़्त पर सही रिश्ते और सही साहस दिखाने से छोटे देश भी बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। भारत को इससे सीखना होगा, वरना विश्व गुरु की पदवी केवल भाषणों तक सिमटी रह जाएगी।

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