साल 2004 की 17 मई भारतीय राजनीति का एक ऐसा दिन था, जब सत्ता, संवैधानिकता और राजनीतिक नैरेटिव तीनों एक साथ आमने-सामने खड़े दिखाई दिए। उस समय सोनिया गांधी ने सरकार बनाने का दावा पेश किया और तत्कालीन राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के सामने एक जटिल परिस्थिति खड़ी हो गई। सवाल केवल बहुमत का नहीं था, बल्कि उस बहस का भी था जो ‘विदेशी मूल’ के मुद्दे को लेकर देश भर में उभर रही थी। अंततः सोनिया ने प्रधानमंत्री पद का दावा छोड़ते हुए पूर्व वित्तमंत्री और आर्थिक विशेषज्ञ मनमोहन सिंह को आगे किया और खुद पीछे हट गईं। लेकिन उन्होंने परदे के पीछे से 10 साल तक यानी 2004 से 2014 तक देश की सत्ता को संचालित किया। हालांकि यह घटनाक्रम भारतीय लोकतंत्र में एक महत्वपूर्ण विमर्श को जन्म दे गया। सवाल उठा-क्या विदेशी मूल का व्यक्ति देश का सर्वोच्च पद संभाल सकता है?

कांग्रेस सुप्रीमो सोनिया गांधी को एक सप्ताह बाद दिल्ली के सर गंगा राम अस्पताल से छुट्टी मिल गई है। इलाज के बाद उनकी हालत में सुधार देखा गया और उन्हें घर जाने की इजाजत दे दी गई। सोनिया को 24 मार्च को एक गम्भीर संक्रमण और बुखार के कारण अस्पताल में भर्ती कराया गया था। अस्पताल के अध्यक्ष डॉ. अजय स्वरूप ने कहा कि डॉ. डीएस राणा, डॉ. एस नंदी और डॉ. अरूप बसु की देख-रेख में सोनिया गांधी का एंटीबायोटिक्स से उपचार किया गया, जिससे वो जल्दी ठीक हुईं। गौरतलब है कि सोनिया गांधी पहले भी खराब स्वास्थ्य के चलते अस्पताल में भर्ती हो चुकी हैं। उनका इलाज और ‘फॉलो-अप’ अब घर पर ही जारी रहेगा। अस्पताल अधिकारियों के अनुसार सोनिया गांधी को बीते महीने 24 मार्च की रात 10:22 बजे बुखार के साथ सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती कराया गया था। चिकित्सकों का कहना है कि सोनिया को कई तरह की बीमारी है, जिससे उन्हें अस्पताल में भर्ती होना पड़ता है। साल 2011 में उनके कैंसर का एक सफल ऑपरेशन अमेरिका में हुआ था। वहीं पिछले साल 15 जून 2025 में भी उन्हें पेट से जुड़ी परेशानी के कारण भी सर गंगा राम अस्पताल में भर्ती किया गया था। सितंबर 2022 में सोनिया गांधी एक लम्बित मेडिकल चेकअप के लिए अमेरिका गई थीं। डॉक्टरों का कहना है कि इसके अलावा सोनिया गांधी को सांस संबंधी समस्या, पुरानी खांसी और फेफड़ों के संक्रमण से संबंधित दिक्कतें हैं।
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इसी बीच पूर्व प्रधानमंत्री और जेडीएस नेता एचडी देवगौड़ा ने संसद में विपक्ष के हंगामे के तरीके को लेकर कांग्रेस संसदीय दल की अध्यक्ष सोनिया गांधी को एक पत्र लिखा है। 92 साल के देवगौड़ा ने दो पेज के पत्र में राहुल के हाल के प्रदर्शनों का जिक्र करते हुए कहा कि संसद के बजट सत्र के दौरान लगातार नारेबाजी, पोस्टर दिखाने और धरना-प्रदर्शन से लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा को नुकसान पहुंच रहा है। देवगौड़ा ने संसद परिसर में बढ़ती अव्यवस्था और विरोध के तरीके पर चिंता जताते हुए इसे ‘कैजुअल प्रोटेस्ट की संस्कृति’ बताया। उन्होंने सोनिया गांधी से अपील करते हुए कहा कि विपक्ष की वरिष्ठ नेता होने के नाते आप अपने सांसदों से बात करें और संसदीय मर्यादा बनाए रखने के लिए उन्हें समझाएं।
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देवगौड़ा ने पत्र में कहा कि संसद के भीतर और उसके परिसर में पैदा हो रही अराजक स्थिति लोकतंत्र की बुनियाद को नुकसान पहुंचा सकती है। विपक्षी दलों को विरोध करने का पूरा अधिकार है, लेकिन विरोध का तरीका ऐसा होना चाहिए जिससे लोकतांत्रिक संस्थाओं को क्षति न पहुंचे। विरोध लोकतंत्र का अहम हिस्सा है, लेकिन उसे संसदीय नियमों और परंपराओं के दायरे में ही होना चाहिए ताकि लोकतांत्रिक संस्थाओं की गरिमा बनी रहे। उन्होंने सोनिया गांधी से अपील की कि वह विपक्ष के वरिष्ठ नेताओं से बात करें और अपने अनुभव और परिपक्वता के आधार पर उन्हें संयम बरतने की सलाह दें। पूर्व प्रधानमंत्री ने कहा कि पिछले 75 वर्षों में देश ने मिलकर लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण किया है और विरोध का तरीका ऐसा होना चाहिए जो इस व्यवस्था को कमजोर न करें।

बताते चलें कि राहुल गांधी ने देश भर में एलपीजी गैस सिलेंडर की कमी और बढ़ती कीमतों के खिलाफ संसद परिसर में सांसदों के साथ सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया था। इस दौरान वे सांसदों के साथ संसद के मकर द्वार की सीढ़ियों पर बैठ गए और चाय-बिस्किट खाया था। राहुल गांधी पर कटाक्ष करते हुए गृहमंत्री अमित शाह ने पिछले महीने 15 मार्च को असम के गुवाहाटी में एक सभा को संबोधित करते हुए कहा था कि राहुल कभी-कभी संसद के दरवाजे पर बैठकर चाय और पकौड़े खाते हैं। क्या उन्हें यह एहसास नहीं है कि नाश्ता करने के लिए कौन-सी जगह उचित होती है? संसद हमारे लोकतंत्र की सर्वोच्च संस्था है। वहां बैठकर विरोध करना भी लोकतांत्रिक परम्परा नहीं है। लेकिन आप तो विरोध से भी दो कदम आगे बढ़ गए हैं। आप वहां चाय और पकौड़े खा रहे हैं। इससे दुनिया भर में भारत की छवि खराब हो रही है।
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सोनिया को खास बनाती हैं ये बातें…
दुनिया की शक्तिशाली महिलाओं में शुमार सोनिया गांधी वैसे किसी परिचय की मोहताज नहीं है। दुनिया की नामी-गिरामी पत्रिका टाइम्स ने उन्हें सशक्त महिला के रूप में अपने ‘फ्रंटपेज’ पर प्रकाशित किया था। वर्तमान में वो यूपीए सरकार की चेयरपर्सन और भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पार्टी की मुखिया हैं। बताते चलें कि सोनिया का वास्तविक नाम एन्टोनिया माइनो हैं। उनका जन्म इटली के लूसियाना गांव में हुआ था। साल 1965 में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान उनकी मुलाकात राजीव गांधी से हुई थी। शादी के बाद सोनिया भारत के सबसे बड़े राजनीतिक परिवार की बहू बनीं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि सोनिया बिल्कुल अलग क्यों दिखती हैं?
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सोनिया गांधी सफाई पसंद महिला हैं। वह अपने घर को साफ-सुथरा रखना चाहती हैं। बताया जाता है कि कई बैठकों से पहले वह बैठक कमरा खुद साफ करती हैं। कम ही लोगों को पता है कि सोनिया गांधी कुशल रसोइया हैं। वह अक्सर रेड चिली ऑयल बनाया करती हैं। शादी के बाद के दिनों में वह अपनी सास इंदिरा को स्वादिष्ट पास्ता बनाकर खिलाया करती थीं। उनके हाथ के बने गाजर के हलवे की चर्चा 10-जनपथ के बाहर भी चर्चा में रहता है। हालांकि शादी के कुछ दिनों बाद सोनिया की मां इटली लौट गईं। उनके जाने के बाद हर बेटी की तरह वह उदास रहने लगीं। इंदिरा गांधी ने स्थिति को भांप लिया। उन्होंने सोनिया को एक पत्र लिखा- ‘हाय सोनिया। हम आपको सिर्फ बताना चाहते हैं कि सभी आपको बहुत प्यार करते हैं।’
सोनिया को प्रेमचंद की लेखनी बहुत पसंद है। वह उनके उपन्यास को खूब पढ़ती हैं। गोदान उनकी पसंदीदा पुस्तक है। पूर्व प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव की तरह सोनिया कई भाषाओं में दक्ष हैं। वह हिन्दी सहित करीब नौ भाषाएं बोल लेती हैं। साथ ही उन्हें हैंडलूम की साड़ियां बहुत पसंद हैं। अपनी शादी में उन्होंने गुलाबी रंग की कॉटन की साड़ी पहनी थी। उनकी बेटी प्रियंका को भी साड़ियां बहुत पसंद है।
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आज भी वह रोज योगा करती हैं। खाने में पिज्जा, पास्ता और नूडल्स जैसे फास्ट फूड से दूर रहती हैं। दाल-रोटी चाव से खाने वाली सोनिया सर्दियों में कॉफी बहुत पीती हैं। उन्होंने आर्ट और पेंटिंग में कोर्स किया है। कला की परख है। समय-समय पर इन्ही कलाकृतियों से प्रेरणा लेती रहती हैं। शादी से पहले वह दिल्ली की सड़कों पर राजीव के साथ टहला करती थीं। इंडिया गेट पर आइसक्रीम खाना उन्हें बहुत पसंद था। वह अपनी सास के लिए भी आइक्रीम ले जाया करती थीं। बांग्लादेश बनने के बाद शेख मुजिबर रहमान दिल्ली दौरे पर आए। उस समय सोनिया गर्भवती थीं। फिर भी अपनी सास के साथ उनकी आगवानी में एयरपोर्ट गईं। उसके अगले दिन ही प्रियंका गांधी का जन्म हुआ था।
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सुब्रह्मण्यम स्वामी और सोनिया
कांग्रेस पार्टी और खुद सोनिया गांधी अपनी पृष्ठभूमि के बारे में जो बताते हैं , वो तीन झूठों पर टिका हुआ है। पहला ये है कि उनका असली नाम अंतोनिया है न कि सोनिया। ये बात इटली के राजदूत ने नई दिल्ली में 27 अप्रैल 1973 को लिखे अपने एक पत्र में जाहिर की थी। ये पत्र उन्होंने गृह मंत्रालय को लिखा था, जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया गया। सोनिया का असली नाम अंतोनिया ही है , जो उनके जन्म प्रमाण पत्र के अनुसार एकदम सही है। सोनिया ने इसी तरह अपने पिता का नाम स्टेफनो मैनो बताया था। वो दूसरे विश्वयुद्ध के समय रूस में युद्ध बंदी थे। स्टेफनो नाजी आर्मी के वालिंटियर सदस्य थे। बहुत ढेर सारे इतालवी फासिस्टों ने ऐसा ही किया था। सोनिया दरअसल इतालवी नहीं बल्कि रूसी नाम है। सोनिया के पिता रूसी जेलों में दो साल बिताने के बाद रूस समर्थक हो गये थे। अमेरिकी सेनाओं ने इटली में सभी फासिस्टों की संपत्ति को तहस-नहस कर दिया था। सोनिया ओरबासानो में पैदा नहीं हुईं , जैसा की उनके बायोडाटा में दावा किया गया है। इस बायोडाटा को उन्होंने संसद में सासंद बनने के समय पर पेश किया था , सही बात ये है कि उनका जन्म लुसियाना में हुआ। शायद वह इस जगह को इसलिए छिपाने की कोशिश करती हैं ताकि उनके पिता के नाजी और मुसोलिनी संपर्कों का पता नहीं चल पाये और साथ ही ये भी उनके परिवार के संपर्क इटली के भूमिगत हो चुके नाजी फासिस्टों से युद्ध समाप्त होने तक बने रहे।
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लुसियाना नाजी फासिस्ट नेटवर्क का मुख्यालय था, ये इटली-स्विस सीमा पर था। इस मायनेहीन झूठ का और कोई मतलब नहीं हो सकता। तीसरा सोनिया गांधी ने हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई कभी की ही नहीं , लेकिन रायबरेली से चुनाव लड़ने के दौरान उन्होंने अपने चुनाव नामांकन पत्र में उन्होंने ये झूठा हलफनामा दायर किया कि वो अंग्रेजी में कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से डिप्लोमाधारी हैं। ये हलफनामा उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान रायबरेली में रिटर्निंग ऑफिसर के सम्मुख पेश किया था। इससे पहले 1989 में लोकसभा में अपने बायोग्राफिकल में भी उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ यही बात लोकसभा के सचिवालय के सम्मुख भी पेश की थी, जो की गलत दावा था। बाद में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में उन्होंने इसे मानते हुए इसे टाइपिंग की गलती बताया। सही बात ये है कि श्रीमती सोनिया गांधी ने कभी किसी कालेज में पढाई की ही नहीं। वह पढ़ाई के लिए गिवानो के कैथोलिक नन्स द्वारा संचालित स्कूल मारिया आसीलेट्रिस गईं , जो उनके कस्बे ओरबासानों से 15 किलोमीटर दूर था। उन दिनों गरीबी के चलते इटली की लड़कियां इन मिशनरीज में जाती थीं और फिर किशोरवय में ब्रिटेन ताकि वहां वो कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें। मैनो उन दिनों गरीब थे। सोनिया के पिता और माता की हैसियत बेहद मामूली थी और अब वो दो बिलियन पाउंड की अथाह संपत्ति के मालिक हैं। सोनिया गांधी ने इतनी इंग्लिश सीख ली थी कि वो कैम्ब्रिज टाउन के यूनिवर्सिटी रेस्टोरेंट में वैट्रेस बन गईं। वो राजीव गांधी से पहली बार तब मिलीं, जब वो 1965 में रेस्टोरेंट में आए। राजीव यूनिवर्सिटी के स्टूडेंट थे, लेकिन वो लम्बे समय तक अपने पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बिठा पाये इसलिए उन्हें 1966 में लंदन भेज दिया गया। जहां उनका दाखिला इम्पीरियल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में हुआ। सोनिया भी लंदन चली आईं। मेरी सूचना के अनुसार उन्हें लाहौर के एक व्यवसायी सलमान तासिर के आउटफिट में नौकरी मिल गई। तासीर की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी का मुख्यालय दुबई में था लेकिन वो अपना ज्यादा समय लंदन में बिताते थे।
