योगी से नाराज ब्राह्मण क्या बदल सकते हैं सियासी पाला

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अजय कुमार

उत्तर प्रदेश की सियासत में चुनावी रंग लगातार चटक होता जा रहा है। वोटरों को लुभाने के लिए सभी हथकंडे अपनाये और  हर छोटी-बड़ी  घटना, हर बयान और हर फैसला अब चुनावी नजरिये  से देखा जा रहा है कि  इससे वोट बैंक पर कितना असर पड़ेगा। फिलहाल यादव बिरादरी और मुसलमान काफी हद तक समाजवादी पार्टी के साथ नज़र आ रहे हैं, लेकिन यूपी में ओवैसी की एंट्री से सपा को नुकसान भी हो सकता है. ठीक इसी तरह ब्राह्मण समुदाय जो हमेशा से भाजपा का मजबूत वोट बैंक  रहा है, उसमें योगी सरकार के प्रति आक्रोश उबल रहा है. जिसमें हाल ही में एसआई  की परीक्षा में ब्राह्मणों को लेकर एक विवादित सवाल ने  ब्राह्मणों की नाराजगी को और बढ़ाने में आग में घी डालने का काम किया है। अब यह  सवाल सिर्फ एक परीक्षा तक सीमित नहीं रह गया है बल्कि इसने योगी सरकार के प्रति ब्राह्मणों के गुस्सा को और भी बढ़ा दिया है।

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राज्य पुलिस भर्ती की दरोगा परीक्षा में पूछा गया वह सवाल अब पूरे समाज की भावनाओं को चोट पहुंचाने का प्रतीक बन गया है। सवाल था अवसर के अनुसार बदल जाने वाले व्यक्ति को क्या कहा जाता है और उसके विकल्पों में पंडित शब्द को शामिल कर दिया गया। एक सामान्य परीक्षा का सवाल जिसका मकसद सिर्फ ज्ञान जांचना था वह अब जाति विशेष को अवसरवादी बताने का हथियार बन गया। डिप्टी मुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने तुरंत इसकी निंदा की। उन्होंने साफ कहा कि किसी भी सवाल से किसी समाज की गरिमा को ठेस पहुंचाना बिल्कुल स्वीकार्य नहीं है। सरकार ने मामले को गंभीरता से लिया है और कहा भविष्य में ऐसी गलती दोबारा नहीं होगी। इसके दोस्तों को पकड़ने के लिए जांच कमेटी भी बना दी गई है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी सभी भर्ती बोर्डों को सख्त निर्देश जारी कर दिए हैं कि किसी भी जाति पंथ या संप्रदाय की मर्यादा का ध्यान रखा जाए। अमर्यादित टिप्पणी बर्दाश्त नहीं की जाएगी और बार-बार गलती करने वालों पर प्रतिबंध लगाया जाएगा। लेकिन सवाल उठता है कि क्या यह सिर्फ क्षमा याचना और निर्देशों से काम चल जाएगा। क्योंकि ब्राह्मण समाज की नाराजगी अब एक-दो घटनाओं तक नहीं रही। यह एक सिलसिला बन चुका है जो पिछले कई महीनों से लगातार जारी है।

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दिसंबर 2025 में विधानसभा सत्र के दौरान जब भाजपा के कुछ ब्राह्मण विधायकों ने लखनऊ में बैठक की तो प्रदेश अध्यक्ष पंकज चौधरी ने तुरंत सख्त चेतावनी दे दी। कहा गया कि जाति आधारित बैठक राजनीति पार्टी को मंजूर नहीं। लेकिन ठीक उसी साल अगस्त में ठाकुर विधायकों की बैठक हुई जिसमें चालीस से ज्यादा नेता शामिल थे। वह बैठक पांच सितारा होटल में हुई और उसे कुटुंब परिवार का नाम दिया गया। लोध और कुर्मी विधायकों की बैठक भी हुई लेकिन उन पर कोई नोटिस नहीं दिया गया। कोई चेतावनी नहीं मिली। सपा और कांग्रेस ने इस दोहरे मानदंड पर तीखे सवाल खड़े किए। उन्होंने कहा कि भाजपा में ब्राह्मण विधायक एक जगह जुट भी नहीं सकते और न ही अपनी बात रख सकते हैं। यह ब्राह्मण पॉलिटिक्स पर सवाल था जो आज भी गूंज रहा है।फिर आया माघ मेला का विवाद। प्रयागराज में शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद पालकी पर सवार होकर स्नान के लिए जा रहे थे। पुलिस ने कानून व्यवस्था का हवाला देकर रोका। धक्का-मुक्की हुई। शंकराचार्य के समर्थक बटुक ब्राह्मणों की चोटियां खींचने के आरोप पुलिस पर लगे। मामला इतना बढ़ा कि शंकराचार्य धरने पर बैठ गए और बिना स्नान किए लौट गए। सपा और कांग्रेस ने इसे राजनीतिक मुद्दा बना दिया। डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य और ब्रजेश पाठक को ब्राह्मणों की नाराजगी दूर करने के लिए मैदान में उतरना पड़ा। बृजेश पाठक ने अपने सरकारी आवास पर सौ बटुकों को सम्मानित किया लेकिन क्या यह कदम पर्याप्त था। समाज अभी भी कह रहा है कि प्रशासन ने शंकराचार्य के साथ जो रवैया अपनाया वह अपमानजनक था।

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फिर आई फिल्म घूसखोर पंडित। नेटफ्लिक्स पर मनोज बाजपेयी अभिनीत इस फिल्म का टीजर फरवरी 2026 में जारी हुआ। पुलिस अधिकारी को पंडित कहकर संबोधित किया गया। ब्राह्मण संगठनों ने देशभर में विरोध प्रदर्शन किए। यूपी में पोस्टर जलाए गए। सड़कों पर प्रदर्शन हुए। मामले ने सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा। अदालत ने फिल्म रिलीज से पहले नाम बदलने का आदेश दिया और सीबीएफसी को नोटिस जारी किया। निर्माता नीरज पांडे को शीर्षक बदलना पड़ा। ब्राह्मण समाज ने इसे साजिश बताया कि जानबूझकर एक समुदाय को भ्रष्ट और घूसखोर करार दिया जा रहा है। फिल्म का नया नाम अभी तक तय नहीं हुआ लेकिन समाज के दिल में जो चोट लगी वह अभी भी ताजी है।UGC के नए नियमों ने भी सवर्ण समाज खासकर ब्राह्मणों को नाराज किया। दलित और ओबीसी छात्रों के साथ भेदभाव रोकने के नाम पर बनाए गए नियमों को ब्राह्मणों ने अपने खिलाफ देखा। बरेली के सिटी मजिस्ट्रेट अलंकार अग्निहोत्री ने इस्तीफा दे दिया। उन्होंने माघ मेले में शंकराचार्य शिष्यों के साथ दुर्व्यवहार और UGC नियमों को वजह बताया। सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप करना पड़ा। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्य बागची की बेंच ने UGC एक्ट 2026 पर रोक लगा दी। अदालत ने कहा कि नियम सामान्य वर्ग को टारगेट कर रहे हैं और सामाजिक बंटवारा बढ़ा सकते हैं। केंद्र को नए नियम बनाने के लिए कहा गया। लेकिन इस दौरान ब्राह्मण सड़कों पर उतरे सोशल मीडिया पर विरोध हुआ।

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ये सारी घटनाएं एक के बाद एक आईं और हर बार सरकार को सफाई देनी पड़ी। हर बार डैमेज कंट्रोल करना पड़ा। लेकिन ब्राह्मण समाज पूछ रहा है कि क्यों बार-बार उसकी भावनाओं की अनदेखी हो रही है। उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण वोटरों की संख्या दस प्रतिशत से ज्यादा है। 2017 के बाद से भाजपा को इनका 85 से 90 प्रतिशत वोट मिलता रहा है। यह परंपरागत वोट बैंक है जो पार्टी की रीढ़ रहा है। लेकिन 2017 के बाद ब्राह्मणों की शिकायत लगातार बढ़ी है। उन्हें पार्टी और सरकार में उचित सम्मान नहीं मिल रहा। उनकी बात नहीं सुनी जा रही। कुशीनगर के विधायक पीएन पाठक ने ब्राह्मण विधायकों की बैठक में कर्तव्य और अन्याय के खिलाफ खड़े होने की बात कही थी। लेकिन प्रदेश अध्यक्ष की चेतावनी के बाद खामोशी छा गई।

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अब सपा इस नाराजगी को अपना हथियार बना रही है। उसके ब्राह्मण नेता लगातार योगी सरकार पर हमलावर हैं। कांग्रेस भी पीछे नहीं। ब्राह्मण समाज के संगठन खुलकर कह रहे हैं कि भाजपा ने उन्हें सिर्फ वोट बैंक समझा है लेकिन सम्मान नहीं दिया। ठाकुर कुर्मी लोध जैसे अन्य समुदायों की बैठकें बिना किसी रोक टोक के हो जाती हैं लेकिन ब्राह्मणों की बैठक पर तुरंत नोटिस। परीक्षा का सवाल पंडित को अवसरवादी बताता है। फिल्म का नाम घूसखोर पंडित रखा जाता है। माघ मेले में बटुकों के साथ बदसलूकी। UGC नियम सामान्य वर्ग को निशाना बनाते हैं। ये सारे मुद्दे एक साथ जुड़कर ब्राह्मणों को यह अहसास दिला रहे हैं कि उनकी उपेक्षा हो रही है।2027 के चुनाव में अगर ब्राह्मण वोट में सिर्फ पांच प्रतिशत भी कमी आई तो भाजपा के कई सीटों पर असर पड़ सकता है। खासकर उन क्षेत्रों में जहां ब्राह्मण निर्णायक भूमिका में हैं। पार्टी के अंदर भी ब्राह्मण नेता चुपचाप असंतोष जता रहे हैं।

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लेकिन ऊपर से कोई भी खुलकर नहीं बोल रहा। सरकार को अब सिर्फ निर्देश जारी करने से आगे बढ़कर ठोस कदम उठाने होंगे। ब्राह्मण संगठनों से संवाद बढ़ाना होगा। परीक्षा बोर्डों में सख्त निगरानी करनी होगी। फिल्म और मीडिया में जाति आधारित अपमान को रोकने के लिए कानूनी प्रावधान मजबूत करने होंगे।  UGC जैसे मुद्दों पर संवेदनशीलता दिखानी होगी। ब्राह्मण समाज सदियों से ज्ञान विज्ञान और संस्कृति का संरक्षक रहा है। अवसरवादी या घूसखोर जैसे शब्दों से उसे जोड़ा जाना न सिर्फ गलत है बल्कि खतरनाक भी। योगी सरकार ने विकास और कानून व्यवस्था पर जोर दिया है लेकिन अगर सामाजिक संतुलन बिगड़ गया तो पूरा प्रयास प्रभावित हो सकता है। ब्राह्मण नाराजगी अब सिर्फ भावनात्मक मुद्दा नहीं रह गया है। यह सियासी गणित का हिस्सा बन चुका है। अगर सरकार ने समय रहते इसे समझा और ठीक किया तो 2027 में यह खतरा टल सकता है। वरना यह बादल और घने होते जाएंगे और चुनावी मैदान में भारी पड़ सकते हैं। ब्राह्मण समाज की आवाज अब सिर्फ चेतावनी नहीं बल्कि चेतावनी का अलार्म बन चुकी है। सरकार को इसे अनसुना नहीं करना चाहिए।

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