हेमंत कश्यप
जगदलपुर। बस्तर की धरती पर रंगमंच की परंपरा कोई नई नहीं, बल्कि सदियों पुरानी विरासत है। लगभग 625 वर्षों से यहां नाट्य कला जीवंत रूप में फल-फूल रही है। इस समृद्ध परंपरा की नींव बस्तर के राजा भैराज देव ने रखी थी, जिन्होंने मंचीय कार्यक्रमों की शुरुआत कर सांस्कृतिक अभिव्यक्ति को नई दिशा दी। बस्तर की संस्कृति हमेशा से समावेशी रही है। यहां का लोक जीवन, मेले-मंड़ई और पारंपरिक उत्सव नाट्य विधा से गहराई से जुड़े हुए हैं। यही कारण है कि रंगमंच यहां सिर्फ मनोरंजन का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक संवाद का माध्यम भी बना हुआ है। समय के साथ बस्तर की इस परंपरा ने बाहरी प्रभावों को भी आत्मसात किया, लेकिन अपनी जड़ों को कभी नहीं छोड़ा। स्थानीय बोलियों की मिठास और लोक शैली के साथ प्रस्तुत किए जाने वाले नाट आज भी दर्शकों को आकर्षित करते हैं।
वर्तमान समय में ‘अभियान’ और ‘जनरंग’ जैसे सांस्कृतिक मंच इस विरासत को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। ये संस्थाएं नई पीढ़ी को रंगमंच से जोड़ते हुए अभिनय कला को न केवल जीवित रखे हुए हैं, बल्कि उसे नए आयाम भी दे रहे हैं। विश्व रंगमंच दिवस के अवसर पर बस्तर की यह परंपरा भारतीय सांस्कृतिक धरोहर की एक अनमोल मिसाल के रूप में सामने आती है, जो बताती है कि कला समय के साथ बदलती जरूर है, लेकिन अपनी आत्मा को संजोए रखती है।
