
चैत्र नवरात्रि के पावन अवसर पर आज देवी के दूसरे स्वरूप माँ ब्रह्मचारिणी की आराधना की जाती है। यह स्वरूप तप, त्याग, संयम और आत्मबल का प्रतीक माना जाता है। मां ब्रह्मचारिणी हमें सिखाती हैं कि जीवन को तपोमय बनाकर हम अपनी आंतरिक शक्ति और तेजस्विता को जागृत कर सकते हैं। तप और संयम से बढ़ती है तेजस्विता जीवन में ब्रह्मचर्य और संयम का पालन करने से न केवल शरीर पुष्ट होता है, बल्कि हम मानसिक और शारीरिक विकारों से लड़ने की शक्ति भी प्राप्त करते हैं। माँ ब्रह्मचारिणी का ध्यान और गुरु प्रदत्त मंत्रों का जप करने से भगवान भगवान शिव भी प्रसन्न होते हैं।
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तप की मिसाल: देवी पार्वती
मां ब्रह्मचारिणी का स्वरूप स्वयं देवी पार्वती के कठोर तप का प्रतीक है। देवी पार्वती ने अपने गुरु के वचनों पर अटूट विश्वास रखते हुए कठिन तपस्या की, जिससे भगवान शिव प्रसन्न हुए। यह हमें विश्वास, धैर्य और समर्पण का संदेश देता है।
इंद्रियों पर नियंत्रण ही असली साधना
संयम का अर्थ केवल त्याग नहीं, बल्कि अपनी इंद्रियों को नियंत्रित करना भी है,
वाणी का संयम : आवश्यकता अनुसार ही बोलना
जिह्वा का संयम : स्वाद के पीछे न भागना
नेत्र का संयम : अनावश्यक दृश्यों से बचना
श्रवण का संयम : बाहरी शोर से हटकर भीतर की आवाज सुनना
स्पर्श का संयम: भोग से दूर रहकर आत्मा में स्थिर होना
जब हम इन इंद्रियों को नियंत्रित कर आत्मा को परमात्मा से जोड़ते हैं, तब हमारे भीतर दिव्य शक्तियों का अवतरण होने लगता है। आज की उपासना का रहस्य माँ ब्रह्मचारिणी की उपासना का सार यही है कि हम अपने भीतर संयम, धैर्य और तप की शक्ति का संचार करें। यही साधना हमें आत्मबल प्रदान करती है और जीवन को श्रेष्ठ दिशा देती है।
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