ममता का मिथक टूटा, मुखर्जी का मंत्र लौटा: केसरिया हुआ बंगाल

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प्रणय विक्रम सिंह

पश्चिम बंगाल का सियासी आसमान केसरिया हो गया। ‘ममता’ का अभेद्य महल ढह गया। दिल में ‘काबा’, नयन में ‘मदीना’ रखने वाली TMC आज बंगाल के सियासी समर में नेस्तनाबूद हो गई। जो बात वर्षों तक बंगाल के मन में थी, वह आज साहस के स्वर में ढलकर गूंज रही है कि हम हिंदू हैं… और अपने होने पर हमें गर्व है। यह जनादेश TMC सरकार के संरक्षण में पल रहे तुष्टिकरण माफिया, सैंड माफिया, कोल माफिया, लैंड माफिया, घुसपैठ माफिया और कैटल माफिया के चंगुल में जकड़े बंगाल की मुक्ति का दस्तावेज है। इस विजय के साथ ही बंगाल की राजनीति का चक्र वहीं लौट आया है, जहां से डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने अपनी वैचारिक यात्रा प्रारंभ की थी। यह जनादेश उनके बलिदान, उनकी दृष्टि और बंगाल के प्रति उनकी अटूट निष्ठा पर इतिहास की सबसे भव्य और भावपूर्ण मुहर है। भारतीय जनता पार्टी की विजय केवल मतों का गणित नहीं, बल्कि मनों का मंथन और मान्यताओं का परिवर्तन है। बंगाल में रिकॉर्ड मतदान उद्घोष था कि इस बार लोग ‘डरे’ नहीं। लगभग 1 लाख से अधिक केंद्रीय अर्धसैनिक बलों की तैनाती ने मतदान केंद्रों पर सुरक्षा की ऐसी छाया दी, जिसमें मतदाता ने पहली बार ‘मन की मुहर’ खुलकर लगाई।

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बंगाल की राजनीति का एक पक्ष लंबे समय तक रक्तरंजित रीतियों, रंजिशों और रसूख की राजनीति से जुड़ा रहा है। पोस्ट-पोल वायलेंस के घाव यहां गांव-गांव में दिखाई देते थे। क्लब कल्चर के नाम पर स्थानीय स्तर पर पनपे दबाव-तंत्र, संगठित समूहों का प्रभाव और प्रशासनिक संरचनाओं पर उनकी छाया लोकतंत्र को सीमित कर दिया था। किंतु इस जनादेश ने स्पष्ट कर दिया है कि जनता अब भय के उस फलक को तोड़कर विश्वास के विस्तार की ओर बढ़ चुकी है। चुनाव परिणामों में भाजपा और सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस की सीटों का विशाल अंतर भले संख्यात्मक लगे, पर इसके भीतर मनोवैज्ञानिक बदलाव का विशाल आयाम छिपा है, नाराजगी से निर्णय तक की यात्रा। यह नाराजगी केवल शासन से नहीं, बल्कि उस व्यवस्था से थी जिसे तुष्टीकरण कहते हैं। बहुसंख्यक समाज के भीतर पनपी पीड़ा, अवसरों की असमानता की अनुभूति और प्रशासनिक असंतुलन का आभास ये सभी भाव लंबे समय से भीतर-ही-भीतर सुलगते रहे। इस चुनाव ने उस सुलगन को स्वर दिया। इस परिवर्तन की पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय नेतृत्व की छाया भी स्पष्ट दिखती है। नरेंद्र मोदी का विकास-विश्वास-विस्तार का मंत्र, अमित शाह की संगठन-संरचना-संकल्प की सघनता और योगी आदित्यनाथ का सुरक्षा-सख्ती-सुशासन का मॉडल ने मिलकर एक ऐसा राजनीतिक प्रतिरूप रचा, जिसने बंगाल के मतदाता के मन में विकल्प की स्पष्टता दी।

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अब नजर उस भविष्य पर है, जिसे यह जनादेश आकार देगा। विकास के मोर्चे पर यह जनादेश नई अपेक्षाएं लेकर आया है। बंद पड़े कारखानों की चिमनियां फिर से धुआं उगलें, बंदरगाहों की रफ्तार तेज हो और युवाओं के हाथों को काम मिले, यह उम्मीद अब हवा में तैरती है। राज्य का जीडीपी लगभग ₹17 लाख करोड़ के आसपास है, पर इसकी औद्योगिक वृद्धि दर राष्ट्रीय औसत से पीछे रही है। यदि नई सरकार गति, कनेक्टिविटी और रोजगार के त्रिकोण को प्राथमिकता देती है और कोलकाता पोर्ट, हल्दिया डॉक, दीनदयाल औद्योगिक कॉरिडोर और पूर्वी डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं तेज़ी पकड़ती हैं तो बंगाल पूर्वी भारत का आर्थिक इंजन बन सकता है। विदित हो कि निवेश वहीं जाता है, जहां नीतियां स्पष्ट और व्यवस्था विश्वसनीय हो और विश्वसनीयता का बीज सुरक्षा और स्थिरता की मिट्टी में ही पनपता है। लेकिन बंगाल केवल अर्थशास्त्र नहीं है। वह एक संस्कृति-समृद्ध सभ्यता भी है। दुर्गा पूजा के ढाक की ध्वनि, काली मंदिरों की आरती और स्वामी विवेकानंद की वाणी इस भूमि की आत्मा रचते हैं। पूरी संभावना है कि नई सरकार के सहयोग से यह सभी मिलकर एक ऐसे सांस्कृतिक स्वाभिमान को जन्म देंगे, जहां पहचान पर संकट नहीं, बल्कि आत्मगौरव का आलोक होगा। जहां परंपरा प्रगति की प्रतिद्वंद्वी नहीं, बल्कि प्रेरक शक्ति बनेगी। यह पुनर्जागरण ऐसा हो सकता है, जैसे राख से उठता हुआ फीनिक्स अपनी ही ज्वाला से नया जीवन पाता हुआ।

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लंबे समय तक यह धारणा बनी रही कि भारतीय जनता पार्टी की राजनीतिक सीमाएं हिंदी पट्टी तक सिमटी हुई हैं। परंतु बंगाल विजय ने इस मिथक को निर्णायक रूप से तोड़ दिया है। यह स्पष्ट संदेश है कि भाजपा अब एक ऐसी शक्ति है जो पूर्व से पश्चिम और उत्तर से दक्षिण तक अपनी उपस्थिति दर्ज कराने में सक्षम है। गंगोत्री से गंगासागर तक भाजपा है। इस परिणाम का सबसे तीखा प्रभाव विपक्षी राजनीति पर पड़ेगा। तृणमूल कांग्रेस जैसे गढ़ का ढहना केवल एक राज्य की हार नहीं, बल्कि उस पूरी वैचारिक संरचना का संकट है, जो भाजपा के विरोध को ही अपनी राजनीति का आधार मानती रही। अब विपक्ष के सामने केवल संगठनात्मक नहीं, बल्कि अस्तित्व का प्रश्न खड़ा है नेतृत्व कौन करेगा, दिशा क्या होगी और जनता को क्या विकल्प देगा? इससे विपक्षी दलों के बीच नेतृत्व और दिशा को लेकर असमंजस और गहरा सकता है।

इस जनादेश ने नरेंद्र मोदी के नेतृत्व को भी नई राजनीतिक वैधता प्रदान की है। यह विजय केवल संगठनात्मक क्षमता का परिणाम नहीं, बल्कि उस विश्वास का प्रमाण है, जो जनता ने उनकी नीतियों, निर्णयों और दृष्टि पर जताया है। जब कोई राजनेता अपने पारंपरिक प्रभाव क्षेत्र से बाहर जाकर भी जनसमर्थन अर्जित करता है, तो वह केवल राजनेता नहीं रहता, वह एक राष्ट्रीय प्रवाह बन जाता है। वर्तमान समय में मोदी इस श्रेणी के एक मात्र राजनेता हैं। बंगाल की इस जीत ने ‘डबल इंजन’ मॉडल को एक नए आयाम में परिवर्तित कर दिया है। अब उत्तर प्रदेश, बिहार और पश्चिम बंगाल के साथ उभरता Triple Engine Corridor केवल विचार नहीं, बल्कि ठोस नीति की दिशा बन चुका है। यह परिवर्तन पूर्वी भारत को नई आर्थिक ऊर्जा, औद्योगिक विस्तार और अवसंरचनात्मक सशक्तता प्रदान करते हुए आने वाले दशकों की विकास-दिशा तय करेगा। इसके साथ ही यह परिणाम राष्ट्रीय विमर्श को भी प्रभावित करेगा। 2029 के आम चुनावों की दृष्टि से भी यह विजय अत्यंत महत्वपूर्ण है। बंगाल जैसे बड़े राज्य में भाजपा की सफलता का अर्थ है लोकसभा में संभावित सीटों की बढ़ोतरी, जो भविष्य की सत्ता-समीकरणों को निर्णायक रूप से प्रभावित कर सकती हैं। यह जीत भाजपा को न केवल राजनीतिक बढ़त देती है, बल्कि मनोवैज्ञानिक बढ़त भी प्रदान करती है, जो किसी भी चुनावी युद्ध में अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। अंततः यह परिणाम बंगाल की जीतने से अधिक ‘जागने’ की दास्तान है। यह भय से विश्वास, असंतोष से विकल्प और क्षेत्रीय राजनीति से व्यापक राष्ट्रीय दृष्टि की ओर बढ़ते भारत की कहानी है।


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