‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ में बढ़ती टकराहट, पूरी दुनिया में ऊर्जा संकट की आहट

भौमेंद्र शुक्ल
भौमेंद्र शुक्ल

  • लकड़ी से जलाने पड़ेंगे घर के चूल्हे और बंद होने की कगार पर कई रेस्टोरेंट
  • शादी-विवाह समारोहों पर एक नई आफत, बिटिया का सामान जुटाएं या सिलेंडर

ईरान-इजराइल और अमेरिका के कारण पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव के बीच दुनिया के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। इस बीच विश्व के सबसे अहम समुद्री तेल मार्ग ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ (Strait of Hormuz) में हमलों की खबरों ने पूरी दुनिया को संकट में डाल दिया है। तेल टैंकरों और कंटेनर जहाज़ों पर हमलों की घटनाओं ने यह संकेत दे दिया है कि यदि यह संवेदनशील जलमार्ग लम्बे समय तक असुरक्षित रहता है, तो इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था और ऊर्जा बाजार पर पड़ेगा। भारत जैसे देशों के लिए यह स्थिति और भी गंभीर है, क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है। ऐसे में ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ में बढ़ती अस्थिरता केवल अंतरराष्ट्रीय राजनीति का मुद्दा नहीं, बल्कि भारतीय रसोई, महंगाई और आर्थिक स्थिरता से भी सीधे तौर पर जुड़ा सवाल बनता जा रहा है।

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मध्य पूर्व और पश्चिम एशिया में बढ़ता तनाव अब भारत की रसोई तक पहुंच चुका है। एक दिन पहले पूर्वी उत्तर प्रदेश के बस्ती और सीएम योगी के गृह जिले पीपीगंज में सिलेंडर को लेकर भगदड़ और मारपीट की घटनाएं प्रकाश में आई थीं। यानी अब रसोई का संकट भारत को झेलना पड़ रहा है। कमर्शियल सिलेंडर पर सरकार ने कुछ दिनों पहले ही रोक लगा दिया था, जिसके जलते देश के कई रेस्तरां में लकड़ी और कोयले की भट्ठियां सुलगने लगीं। लेकिन शादी-विवाह के इस सीजन में लोगों पर यह नई आफत बड़ी भारी पड़ रही है। बिटिया की शादी में जुटे परिजनों का कहना है कि हम शादी के सामान जुटाएं या सिलेंडर। बीजेपी सरकार में यह पहली बार हुआ है, जब घरेलू गैस के लिए मारामारी हो रही है। ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ की असुरक्षा ने दुनिया के सामने ऊर्जा संकट खड़ा किया है।

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अभी कुछ दिनों पहले की बात है। एक वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ। उस वीडियो में दुनिया में ऊर्जा प्रवाह लेकर जा रहे दो तेल कंटेनर धू-धू कर जल रहे थे। इसके अलावा कई और तेल जहाज़ों पर हमले की घटनाएं भी सामने आई हैं। कई कंटेनरों को दुनिया ने जलते हुए देखा है। कूटनीति के जानकारों का कहना है कि पश्चिम-एशिया में उठी युद्ध की यह लपटें भले ही हजारों किलोमीटर दूर हों, लेकिन उनका असर भारतीय रसोई तक महसूस किया जा रहा है। वो कहते हैं कि यही समय है, जब भारत को अपनी ऊर्जा नीति को और अधिक मजबूत, आत्मनिर्भर और संकट-रोधी बनाने की दिशा में निर्णायक पहल करनी होगी। गौरतलब है कि भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा विदेशों से पूरा करता है। जबकि कच्चे तेल के मामले में भारत करीब-करीब 88 प्रतिशत आयात पर निर्भर है। लम्बे समय तक इस आयात का बड़ा हिस्सा पश्चिम एशिया के उस संवेदनशील समुद्री मार्ग से होकर आता रहा है जिसे ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ कहा जाता है। युद्ध की स्थिति के कारण यहां जहाजों की आवाजाही बाधित हो गई है, जिससे पूरे देश में सिलेंडर को लेकर चिल्ल-पों मचा हुआ है। समाजवादी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इसी मुद्दे को लेकर कल राजधानी लखनऊ में बवाल काटा। वहीं जेल से छूटकर बाहर आए दिल्ली के पूर्व मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल इसी मुद्दे को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर न केवल गरजे, बल्कि उन पर काफी बरसे भी हैं।

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गौरतलब है कि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ केवल एक समुद्री मार्ग नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा की रीढ़ है। इसे वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की धड़कन माना जाता है। इसके उत्तरी तट पर ईरान और दक्षिण में ओमान तथा यूएई स्थित हैं। यह समुद्री गलियारा खाड़ी क्षेत्र को अरब सागर से जोड़ता है और अपने सबसे संकरे हिस्से में लगभग 33 किलोमीटर चौड़ा है। अमेरिकी ऊर्जा सूचना प्रशासन के अनुसार वर्ष 2025 में प्रतिदिन लगभग दो करोड़ बैरल तेल इसी जल मार्ग से होकर गुज़रा। यह वैश्विक तेल व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत है, जिसकी वार्षिक कीमत करीब 600 अरब डॉलर आंकी जाती है। खाड़ी क्षेत्र के प्रमुख ऊर्जा निर्यातक देश, सउदी अरब, ईराक, कुवैत, कतर और यूएई अपना अधिकांश तेल इसी मार्ग से दुनिया भर के बाजारों तक पहुंचाते हैं। यहां बढ़ता तनाव केवल मध्य पूर्व का क्षेत्रीय मुद्दा नहीं है, बल्कि इसका असर दुनिया की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा कीमतों और आम उपभोक्ताओं की जेब तक महसूस किया जा सकता है। ब्रिटेन की समुद्री सुरक्षा एजेंसी ‘यूनाइडेट किंगडम मैरीटाइम ट्रेड ऑपरेशंस’ की मानें तो इराक़ के तट के पास दो तेल टैंकरों को ‘अज्ञात मिसाइल’ से निशाना बनाया गया। इसके अलावा संयुक्त अरब अमीरात के तट के पास एक कंटेनर जहाज़ पर हमले की भी सूचना मिली है। इन घटनाओं ने वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को लेकर हाहाकार मचा रखा है। केंद्रीय मंत्री हरदीप पुरी ने कल लोकसभा में भले ही चिग्घाड़-चिग्घाड़ कर यह कहा कि देश में कच्चे तेल के पर्याप्त भंडार है। साथ ही हम खाड़ी के अलावा अन्य देशों से भी सुरक्षा को लेकर चिंता और गहरा दी है।

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साथ ही बढ़ते संघर्ष के कारण वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बढ़ गई है। तेल की कीमतें हाल ही में लगभग 120 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई थीं। वहीं जहाज़ों के बीमा और परिवहन लागत में भी तेज़ उछाल आया है। ऊर्जा बाज़ार के विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही जलमार्ग पूरी तरह बंद नहीं हुआ है, लेकिन सुरक्षा जोखिम इतना बढ़ गया है कि कई टैंकर कम्पनियां यहां से गुजरने से बच रही हैं। जहाज़ों के लिए बीमा महंगा हो गया है और कुछ मामलों में बीमा कम्पनियां जोखिम उठाने को तैयार नहीं हैं। बताते चलें कि हर महीने करीब तीन हजार जहाज़ इस जलमार्ग से गुजरते हैं। यदि यह मार्ग बंद हो जाता है, तो वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति में भारी परेशानी देखने को मिलेंगी। इसका सबसे ज्यादा असर एशियाई देशों पर पड़ेगा, क्योंकि अनुमान के अनुसार होर्मुज़ से निकलने वाले लगभग 82 प्रतिशत तेल का गंतव्य एशिया होता है। तेल की कीमतों में उछाल का असर केवल ऊर्जा बाजार तक सीमित नहीं रहेगा। बढ़ती लागत के कारण परिवहन, उत्पादन और उपभोक्ता वस्तुओं की कीमतें भी दुनिया भर में बढ़ सकती हैं।

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पिछले कुछ वर्षों में खाड़ी देशों ने इस जोखिम को कम करने के लिए वैकल्पिक मार्ग विकसित किए हैं। उदाहरण के तौर पर सउदी अरब ने लगभग 12 सौ किमी लम्बी पाइपलाइन विकसित की है जो रोज़ाना करीब 50 लाख बैरल तेल ले जा सकती है। वहीं यूनाइटेड अरब अमीरात ने अपने तेल क्षेत्रों को फ़ुजैरा बंदरगाह से जोड़ने वाली पाइपलाइन बनाई है, जिसकी क्षमता लगभग 15 लाख बैरल प्रतिदिन है। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इन वैकल्पिक मार्गों के बावजूद यदि ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ लम्बे समय तक बाधित रहता है तो वैश्विक आपूर्ति में प्रतिदिन 80 से 100 लाख बैरल तक की कमी आ सकती है।

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बात हिंदुस्तान की करें तो पेट्रोल-डीजल के मोर्चे पर भारत ने फिलहाल संतुलन बनाए रखा है। इसका एक बड़ा कारण यह है कि देश ने पिछले कई वर्षों में कच्चे तेल के आयात के स्रोतों को काफी हद तक विविध बनाया है। पहले भारत 27 देशों से तेल खरीदता था, अब इसकी संख्या 40 पार पहुंच चुकी है। इसके अलावा रूस से होने वाली खरीद भी महत्वपूर्ण कड़ी बनी हुई है। प्रतिबंधों के बावजूद रूस से कच्चे तेल की खरीद में हाल के दिनों में बढ़ोतरी ने आपूर्ति के दबाव को कुछ हद तक कम किया है। वहीं भारत की मजबूत रिफाइनिंग क्षमता भी इस स्थिति में राहत देने वाली साबित हुई है। यही वजह है कि पेट्रोल और डीजल की घरेलू आपूर्ति में फिलहाल कोई गंभीर संकट नहीं दिखाई दे रहा।

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लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू घरेलू रसोई गैस (एलपीजी) के मामले में लगातार चिंताजनक बना हुआ है। इसकी मांग का बड़ा हिस्सा अभी भी आयात पर निर्भर है। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी उपभोक्ता है और इसकी मासिक खपत करीब 30 लाख टन है। देश में उत्पादन केवल 40 से 45 प्रतिशत जरूरत ही पूरी कर पाता है, जबकि बाकी 55 से 60 प्रतिशत आयात से आता है। यह पूरा का पूरा हिस्सा इसी ‘स्ट्रेट ऑफ होर्मुज़’ से आता है, जो फिलहाल बाधित है। सरकार ने स्थिति को संभालने के लिए रिफाइनरियों को एलपीजी उत्पादन बढ़ाने का निर्देश दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे कुल मांग का आधा हिस्सा ही पूरा हो पाएगा। अन्य क्षेत्रों से एलपीजी आयात संभव तो है, लेकिन उसमें समय अधिक लगता है, जिससे तत्काल राहत मिलना मुश्किल हो जाता है। इस संकट ने एक और बड़ी कमजोरी को उजागर किया है। वो है, एलपीजी का रणनीतिक भंडार। कच्चे तेल के मामले में भारत के पास मैंगलोर, पादुर और विशाखापत्तनम जैसे स्थानों पर रणनीतिक भंडार मौजूद हैं, जो आपातकालीन स्थिति में काम आ सकते हैं। देश में मौजूद सीमित भंडारण क्षमता मुश्किल से दो दिनों की जरूरत ही पूरी कर सकती है। स्पष्ट है कि यह स्थिति केवल एक अस्थाई आपूर्ति संकट नहीं, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा की व्यापक रणनीति पर पुनर्विचार का संकेत है। भारत को अब एलपीजी के लिए भी दीर्घकालिक रणनीतिक भंडार विकसित करने, आयात स्रोतों का और अधिक विविधीकरण करने और घरेलू उत्पादन बढ़ाने की दिशा में ठोस कदम उठाने होंगे।

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