कांशीराम की विरासत पर सभी दलों की नजर, यूपी की राजनीति बदलने की होड़

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अजय कुमार

उत्तर प्रदेश की राजनीति में कई प्रतीक ऐसे रहे हैं जिनकी विरासत समय-समय पर नई सियासी व्याख्या के साथ सामने आती है। बहुजन आंदोलन के प्रणेता कांशीराम भी ऐसे ही नेता हैं। 15 मार्च को उनकी जयंती हर साल बसपा मनाती रही है, लेकिन इस बार तस्वीर कुछ अलग है। कांग्रेस से लेकर समाजवादी पार्टी और बीजेपी तक, लगभग सभी दल कांशीराम की राजनीतिक विरासत को अपने तरीके से याद कर रहे हैं। लखनऊ से दिल्ली तक कार्यक्रमों की श्रृंखला बन रही है, बहुजन संवाद की बातें हो रही हैं और पीडीए दिवस जैसे नए राजनीतिक नारे सामने आ रहे हैं। यह सब महज संयोग नहीं है, बल्कि 2027 के विधानसभा चुनाव से पहले बदलते सामाजिक समीकरणों का संकेत भी है। दिलचस्प यह है कि कांशीराम की राजनीति का मूल आधार कांग्रेस विरोध से ही बना था। 1980 और 1990 के दशक में उन्होंने जिस बहुजन राजनीति की नींव रखी, उसने कांग्रेस को उत्तर प्रदेश में लगभग हाशिए पर पहुंचा दिया था। लेकिन अब वही कांग्रेस उनकी जयंती को परिवर्तन दिवस के रूप में मना रही है। 13 मार्च को लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में होने वाले कार्यक्रम में राहुल गांधी की मौजूदगी और बहुजन संवाद की योजना इसी कोशिश का हिस्सा है। कांग्रेस का तर्क है कि कांशीराम को किसी एक पार्टी के नेता के रूप में सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि उन्हें सामाजिक न्याय की लड़ाई के बड़े प्रतीक के रूप में समझना चाहिए। राहुल गांधी पिछले कुछ समय से सामाजिक न्याय, जातीय जनगणना और हिस्सेदारी की राजनीति को जोर-शोर से उठा रहे हैं। कांशीराम के उस पुराने नारे जिसकी जितनी संख्या भारी, उसकी उतनी हिस्सेदारी को कांग्रेस आज अपने राजनीतिक तर्क के रूप में सामने रख रही है।

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समाजवादी पार्टी की रणनीति भी कम दिलचस्प नहीं है। अखिलेश यादव ने कांशीराम की जयंती को पीडीए यानी पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक दिवस के रूप में मनाने का फैसला किया है। यह सिर्फ प्रतीकात्मक आयोजन नहीं है, बल्कि उस सामाजिक समीकरण को मजबूत करने की कोशिश है जो 2024 के लोकसभा चुनाव में आंशिक रूप से दिखाई दिया था। अखिलेश यादव को यह एहसास है कि सिर्फ यादव-मुस्लिम वोटों के सहारे बीजेपी को चुनौती देना मुश्किल है। इसलिए पीडीए का फार्मूला दरअसल उस बड़े सामाजिक गठबंधन की तलाश है जिसमें दलित, पिछड़े और अल्पसंख्यक एक साझा राजनीतिक मंच पर आएं। कांशीराम की जयंती को इस रणनीति से जोड़ना इसी सोच का हिस्सा है, क्योंकि बहुजन राजनीति की अवधारणा में यही सामाजिक वर्ग सबसे अहम रहे हैं।बीजेपी भी इस पूरी बहस से अलग नहीं है। पार्टी ने दलित महापुरुषों की जयंती और पुण्यतिथि मनाने के लिए एक कैलेंडर तैयार किया है, जिसमें कांशीराम का नाम भी शामिल है। योगी सरकार के मंत्री असीम अरुण के नेतृत्व में दलित समाज से संवाद बढ़ाने की कोशिशें की जा रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में बीजेपी ने दलित समुदाय के बीच अपनी पैठ मजबूत करने के लिए कई प्रतीकात्मक और सामाजिक कार्यक्रम किए हैं। संत रविदास से लेकर बाबा साहेब आंबेडकर तक, दलित प्रतीकों को पार्टी अपने राजनीतिक विमर्श में शामिल कर चुकी है। ऐसे में कांशीराम का नाम भी इस सूची में जुड़ना स्वाभाविक माना जा रहा है। बीजेपी की रणनीति साफ है दलित समाज को यह संदेश देना कि उसकी राजनीति सिर्फ एक पार्टी की बपौती नहीं है।दरअसल, कांशीराम की विरासत को लेकर अचानक बढ़ी यह दिलचस्पी उत्तर प्रदेश की बदलती राजनीति से जुड़ी है। राज्य में दलित मतदाता लगभग 21 प्रतिशत हैं और अगर अतिपिछड़े वर्ग को जोड़ दिया जाए तो यह संख्या 50 प्रतिशत के करीब पहुंच जाती है। कांशीराम ने इन्हीं वर्गों को राजनीतिक ताकत के रूप में संगठित करने का काम किया था। बसपा के उदय के साथ दलित राजनीति को पहली बार ऐसा मंच मिला जिसने सत्ता तक पहुंचने का रास्ता बनाया। मायावती चार बार उत्तर प्रदेश की मुख्यमंत्री बनीं और बहुजन राजनीति का एक नया अध्याय लिखा गया।

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लेकिन पिछले कुछ चुनावों में बसपा का जनाधार लगातार कमजोर होता गया है। 2022 के विधानसभा चुनाव और 2024 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन बेहद सीमित रहा। यही वह राजनीतिक खालीपन है जिसे भरने के लिए दूसरी पार्टियां कोशिश कर रही हैं। सपा को लगता है कि दलित मतदाता अब नए विकल्प की तलाश में हैं और पीडीए फार्मूले के जरिए उन्हें अपने साथ जोड़ा जा सकता है। कांग्रेस भी इसी संभावना को देख रही है और सामाजिक न्याय की नई बहस के जरिए दलित-ओबीसी वर्गों से संवाद बढ़ाना चाहती है। बीजेपी के सामने चुनौती थोड़ी अलग है। पार्टी ने 2014 के बाद से दलित वोटों में उल्लेखनीय बढ़त हासिल की थी, लेकिन 2024 के चुनाव में कई जगहों पर इस समर्थन में हल्की दरार दिखी। इसलिए बीजेपी भी सामाजिक इंजीनियरिंग के जरिए दलित और अतिपिछड़े वर्गों को अपने साथ बनाए रखने की रणनीति पर काम कर रही है। कांशीराम जैसे प्रतीकों को याद करना उसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है।असल सवाल यह है कि क्या कांशीराम की विरासत को सिर्फ राजनीतिक प्रतीक के रूप में इस्तेमाल करना ही काफी होगा? कांशीराम ने जिस बहुजन राजनीति की कल्पना की थी, उसका मूल उद्देश्य सत्ता में भागीदारी और सामाजिक सम्मान था। उन्होंने दलितों और वंचित वर्गों को यह एहसास कराया कि लोकतंत्र में संख्या भी ताकत होती है। उनकी राजनीति सिर्फ चुनाव जीतने की रणनीति नहीं थी, बल्कि सामाजिक चेतना का आंदोलन भी थी।

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आज जब अलग-अलग पार्टियां उनकी जयंती मनाने की होड़ में हैं, तब यह भी देखना होगा कि उनकी मूल सोच को कितनी गंभीरता से अपनाया जाता है। क्या यह सिर्फ वोटों की गणित है या सामाजिक न्याय की वास्तविक चिंता भी है? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि उत्तर प्रदेश की राजनीति में प्रतीकों का इस्तेमाल नया नहीं है। अक्सर नेता और दल किसी बड़े सामाजिक नायक की विरासत को अपने पक्ष में पेश करते रहे हैं।2027 का विधानसभा चुनाव अभी दूर है, लेकिन उसकी आहट अभी से सुनाई देने लगी है। सपा सत्ता में वापसी का सपना देख रही है, बीजेपी तीसरी बार सरकार बनाने की तैयारी में है और कांग्रेस खोए हुए जनाधार को फिर से हासिल करना चाहती है। ऐसे में कांशीराम की विरासत एक बार फिर राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गई है।लेकिन अंतिम फैसला हमेशा मतदाता ही करता है। यह वही मतदाता है जिसे कांशीराम ने कभी कहा था कि सत्ता की चाबी उसके हाथ में है। अब देखना यह है कि 2027 की लड़ाई में यह चाबी किसके ताले को खोलती है और किसकी राजनीति को नया रास्ता दिखाती है।

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