लखनऊ की इस महिला अधिवक्ता ने ‘सबसे बड़ी कचहरी’ में उठाई बड़ी आवाज, कई कठिन सवालों का मांगा जवाब

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  • मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट में बड़ी सुनवाई, भेदभावपूर्ण कानून को दी चुनौती

नई दिल्ली। देश की सर्वोच्च अदालत में मुस्लिम महिलाओं के उत्तराधिकार अधिकारों से जुड़े एक महत्वपूर्ण संवैधानिक मुद्दे पर सुनवाई हुई। यह मामला लखनऊ की अधिवक्ता पॉलोमी पावनी शुक्ला द्वारा दायर जनहित याचिका (PIL) से जुड़ा है, जिसमें मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) आवेदन अधिनियम, 1937 के तहत उत्तराधिकार से जुड़े प्रावधानों को महिलाओं के प्रति भेदभावपूर्ण बताते हुए चुनौती दी गई है।

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याचिका में कहा गया है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत महिलाओं को पुरुषों की तुलना में कम उत्तराधिकार अधिकार मिलते हैं, जो भारतीय संविधान में प्रदत्त समानता के सिद्धांत के विपरीत है। याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण अदालत में यह अहम संवैधानिक प्रश्न उठाया कि क्या मुस्लिम महिलाओं के लिए असमान उत्तराधिकार अधिकारों को वैधानिक मान्यता देना संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के तहत मिले समानता और भेदभाव-निषेध के अधिकारों का उल्लंघन नहीं है।
याचिका में अधिवक्ता पौलोमी पाविनी ने तर्क दिया कि उत्तराधिकार का अधिकार केवल पारिवारिक या निजी विषय नहीं है, बल्कि यह महिलाओं के नागरिक और आर्थिक अधिकारों से सीधे जुड़ा हुआ है। उनका कहना है कि संपत्ति में बराबरी का अधिकार महिलाओं की गरिमा, आर्थिक सुरक्षा और आत्मनिर्भरता के लिए बेहद महत्वपूर्ण है। याचिका में यह भी उल्लेख किया गया है कि भारत में मुस्लिम महिलाएँ ऐसी एकमात्र श्रेणी की महिलाएँ हैं, जिनके उत्तराधिकार अधिकार अब भी व्यक्तिगत कानून को वैधानिक मान्यता मिलने के कारण असमान बने हुए हैं।

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मामले की ग्राह्यता पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह याचिका व्यक्तिगत कानून और संवैधानिक अधिकारों के संबंध में महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है, इसलिए इस पर न्यायिक समीक्षा के दायरे में विचार करना आवश्यक है। बताते चलें कि अधिवक्ता पौलोमी पाविनी शुक्ला सामाजिक रूप से कमजोर और वंचित वर्गों से जुड़े मुद्दों पर लगातार सक्रिय रही हैं। इससे पहले उन्होंने भारत में अनाथ बच्चों के अधिकारों और उनके लिए बेहतर नीतियों की मांग को लेकर सुप्रीम कोर्ट में एक महत्वपूर्ण जनहित याचिका दायर की थी। हाल ही में उन्होंने आवारा कुत्तों के वैज्ञानिक प्रबंधन के मुद्दे पर भी अदालत में पैरवी की है। वह पुस्तक Weakest on Earth – Orphans of India की लेखिका भी हैं, जिसमें भारत में अनाथ बच्चों की स्थिति, उनकी उपेक्षा और उनसे जुड़ी चुनौतियों का विश्लेषण करते हुए कानून और नीतियों में संरचनात्मक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

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