मेरठ रैपिड रेल के बहाने भाजपा ने विकास, राजनीति और 2027 का चुनावी गणित साधा

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संजय सक्सेना

  पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में रविवार को हुआ रैपिड रेल और मेट्रो परियोजना का उद्घाटन एक सामान्य सरकारी कार्यक्रम नहीं था। यह ऐसा मंच था जहां विकास के आंकड़े, राजनीतिक संदेश और भविष्य की चुनावी रणनीति एक साथ रखी गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की मौजूदगी ने यह साफ कर दिया कि उत्तर प्रदेश में 2027 के विधानसभा चुनाव की बुनियाद अब खुले तौर पर रखी जा रही है। दिल्ली–मेरठ नमो भारत रैपिड रेल कॉरिडोर देश की सबसे महत्वाकांक्षी क्षेत्रीय परिवहन परियोजनाओं में गिना जा रहा है। इसकी कुल लंबाई करीब 82 किलोमीटर है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इस परियोजना पर 12 हजार 900 करोड़ रुपये से ज्यादा की लागत आई है।

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अब दिल्ली से मेरठ का सफर 50 से 55 मिनट में पूरा किया जा सकेगा, जबकि पहले यही दूरी सड़क मार्ग से तय करने में औसतन ढाई से तीन घंटे लगते थे। रैपिड रेल की अधिकतम डिजाइन स्पीड 180 किलोमीटर प्रति घंटा रखी गई है, जो इसे देश की सबसे तेज रफ्तार ट्रांजिट प्रणालियों में शामिल करती है। इसी कॉरिडोर के साथ मेरठ मेट्रो का संचालन भी शुरू किया गया है। इसका मकसद केवल दिल्ली से कनेक्टिविटी नहीं, बल्कि शहर के भीतर आवाजाही को भी आसान बनाना है। सरकार का दावा है कि इससे रोजाना हजारों यात्रियों को सीधा लाभ मिलेगा और ट्रैफिक का दबाव कम होगा। अधिकारियों के अनुसार, पूर्ण संचालन के बाद इस कॉरिडोर से हर दिन करीब ढाई से तीन लाख यात्रियों के सफर करने की क्षमता विकसित की गई है।

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प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में इन आंकड़ों को विकास की उपलब्धि के रूप में पेश किया, लेकिन संदेश सिर्फ इतना नहीं था। मंच से यह बार-बार रेखांकित किया गया कि इतने बड़े प्रोजेक्ट तभी संभव हो पाए जब केंद्र और राज्य सरकारें एक साथ काम कर रही हों। योगी आदित्यनाथ की तारीफ करते हुए कानून-व्यवस्था, निवेश और इंफ्रास्ट्रक्चर को उत्तर प्रदेश की नई पहचान बताया गया। यह सीधा संकेत था कि भाजपा ‘डबल इंजन सरकार’ के नैरेटिव को 2027 तक और मजबूत करने जा रही है। राजनीतिक दृष्टि से सबसे दिलचस्प पहलू विपक्ष पर किया गया हमला रहा। इस मंच से कांग्रेस पर तीखे शब्दों में निशाना साधा गया। पहली नजर में यह अटपटा लग सकता है, क्योंकि उत्तर प्रदेश में भाजपा का मुख्य मुकाबला समाजवादी पार्टी से माना जाता है। लेकिन राजनीति में विमर्श तय करना भी रणनीति का हिस्सा होता है। कांग्रेस को केंद्र में रखकर हमला करने से विपक्षी खेमे के भीतर नेतृत्व और दिशा को लेकर असमंजस पैदा करने की कोशिश साफ दिखी।इसका सीधा असर समाजवादी पार्टी और उसके प्रमुख अखिलेश यादव पर पड़ता है। यदि विपक्षी राजनीति का केंद्र कांग्रेस बनती है, तो सपा को न केवल अपने पारंपरिक वोट बैंक को संभालना होगा, बल्कि विपक्षी एकता में अपनी भूमिका को भी नए सिरे से परिभाषित करना पड़ेगा। यह दबाव केवल सीटों का नहीं, बल्कि नेतृत्व और वैचारिक दिशा का भी है।

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मेरठ का मंच पश्चिमी उत्तर प्रदेश की सामाजिक और राजनीतिक संवेदनशीलताओं को ध्यान में रखकर चुना गया। यह इलाका किसान आंदोलन, जातीय समीकरण और शहरीकरण तीनों के लिहाज से अहम माना जाता है। रैपिड रेल जैसी परियोजना के जरिए भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि विकास का लाभ सीधे इसी क्षेत्र को मिल रहा है। सरकार के आंकड़ों के मुताबिक, इस कॉरिडोर से जुड़े क्षेत्रों में जमीन के दाम, औद्योगिक निवेश और निजी प्रोजेक्ट्स में पहले ही बढ़ोतरी देखी जा रही है। सरकार का दावा है कि परियोजना के निर्माण और संचालन के दौरान करीब 30 हजार से ज्यादा लोगों को प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार मिला है। इसके अलावा, दिल्ली–एनसीआर के औद्योगिक और कॉरपोरेट हब तक तेज पहुंच मिलने से मेरठ, मोदीनगर और आसपास के शहरों के युवाओं के लिए नौकरी के नए विकल्प खुलेंगे। यही वह आर्थिक तर्क है, जिसे भाजपा राजनीतिक भरोसे में बदलने की कोशिश कर रही है।

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योगी आदित्यनाथ को मंच से जिस तरह विकास और सुशासन के चेहरे के रूप में पेश किया गया, वह भी 2027 की राजनीति से जुड़ा संकेत है। भाजपा यह दिखाना चाहती है कि राज्य में नेतृत्व स्थिर है और केंद्र का पूरा समर्थन उसे हासिल है। 2017 और 2022 के चुनावों में कानून-व्यवस्था और मजबूत नेतृत्व जिस तरह निर्णायक मुद्दा बना था, अब उसी के साथ बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट्स को जोड़ा जा रहा है। मेरठ में दिखी यह तस्वीर बताती है कि भाजपा आने वाले चुनाव को केवल भावनात्मक या वैचारिक मुद्दों पर नहीं, बल्कि ठोस आंकड़ों और विकास के दावों पर लड़ने की तैयारी में है। दूसरी ओर विपक्ष के सामने चुनौती है कि वह इन आंकड़ों का जवाब किस एजेंडे से देगा सामाजिक न्याय, बेरोजगारी, महंगाई या गठबंधन की राजनीति से।कुल मिलाकर, मेरठ में रैपिड रेल का उद्घाटन उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक बड़ा संकेत बनकर उभरा है। यह कार्यक्रम विकास का उत्सव भी था और आने वाले चुनाव का संकेतक भी। भाजपा ने यहां से यह साफ कर दिया है कि 2027 की लड़ाई विकास, स्थिर नेतृत्व और बिखरे विपक्ष के मुकाबले के रूप में पेश की जाएगी। मेरठ से उठी यह राजनीतिक गूंज आने वाले महीनों में पूरे प्रदेश की राजनीति को दिशा देती दिख सकती है।

 

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