नाट्य समीक्षा : राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में ‘फेमिनिस्ट मैनिफेस्टो’की प्रस्तुति

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  • स्त्री स्मृतियों के संग्रहालय में एक यात्रा

माया कुलश्रेष्ठ

राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय में फेमिनिस्ट मैनिफेस्टो देखना केवल रंगमंच की एक संध्या नहीं थी, बल्कि स्मृति में प्रवेश करने जैसा अनुभव था—व्यक्तिगत, सामूहिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक स्मृतियों में। मंच पर जो घटित हुआ, वह एक सीधी कथा नहीं थी, बल्कि एक जीवित अभिलेखागार था, जो आत्मा को सुकून देता है और साथ ही भीतर तक विचलित भी करता है। मंच के अंधकार में डूब जाने के बाद भी, इसके प्रश्न मन में गूंजते रहे—बिना किसी समाधान के। मलयालम भाषा में प्रस्तुत यह नाटक दर्शकों को एक साहसी और मुक्त करने वाला आमंत्रण देता है—अनुवाद स्क्रीन पर निर्भर हुए बिना देखने का। हमने उसी आमंत्रण को स्वीकार किया। देह की गति, श्वास, मौन, लय, संगीत और दृष्टि—इन सबने मिलकर भाषा का स्थान ले लिया। शरीर स्वयं भाषा बन गया और स्थिरता तर्क। यही सशक्त रंगमंच की पहचान है—जहाँ शब्द पीछे हट जाते हैं और सत्य सामने आता है।

जनभेरी के लिए अभिमन्यु विनायजकुमार द्वारा निर्देशित फेमिनिस्ट मैनिफेस्टो नाइजीरियाई लेखिका और नारीवादी चिंतक चिममांडा एनजोजी आदिशी के विचारों से प्रेरित है, विशेष रूप से उनकी पुस्तक Dear Ijeawale: A Feminist Manifesto in Fifteen Suggestions से। यह नाटक उस पाठ का सीधा रूपांतरण नहीं है, बल्कि उसके विचारों का सांस्कृतिक और वैश्विक विस्तार है—जो सीमाओं, भूगोल और पीढ़ियों को पार करता है। नाटक का मूल ढांचा एक काल्पनिक यात्रा पर आधारित है—एक छोटी लड़की अपनी माँ के साथ “स्मृतियों के संग्रहालय” में प्रवेश करती है। यह संग्रहालय कोई जड़ स्थान नहीं, बल्कि एक जीवित, साँस लेता हुआ परिसर है, जहाँ स्त्रियों के संघर्ष दर्ज हैं। ये संघर्ष उन सवालों से जन्म लेते हैं जो मासूम लगते हैं, लेकिन गहरे राजनीतिक हैं। स्त्रियों के शरीर पर नियंत्रण क्यों? उनसे मौन की अपेक्षा क्यों? ज्ञान स्त्रियों के लिए दंड क्यों बन जाता है? और जब एक स्त्री स्वयं को जान लेती है, तो सत्ता को खतरा क्यों महसूस होता है?

इस यात्रा में इतिहास, भूगोल, मिथक, साहित्य और कलाएँ साक्षी बनकर उपस्थित होती हैं। नाटक यह स्पष्ट करता है कि समय के पार स्त्रियों के जीवन में एक भयावह निरंतरता है—हिंसा, विलोपन और नैतिक अनुशासन की ऐसी पुनरावृत्ति जिसे समाज सामान्य बनाने की कोशिश करता है। ये स्मृतियाँ मिटाई नहीं जा सकतीं। हम चाहे जितना भी यह मान लें कि रात का अंधकार उजाले में बदल गया है, छायाएँ बनी रहती हैं। नाटक में विभिन्न सांस्कृतिक और ऐतिहासिक स्त्री चरित्रों की स्मृति को आमंत्रित किया जाता है। Phoolan Devi के माध्यम से बाल विवाह और जातिगत हिंसा की चरम क्रूरता सामने आती है। Matsyagandhi की कथा यह दिखाती है कि स्त्री को “नया जीवन” देने के नाम पर उसका पुराना अस्तित्व कैसे मिटा दिया जाता है। Desdemona की हत्या यह उजागर करती है कि सत्ता की मात्र शंका ही स्त्री के लिए घातक हो सकती है। और Nora हमें याद दिलाती है कि नारीवाद केवल विचार नहीं हो सकता—उसे जीना पड़ता है, जोखिम उठाने पड़ते हैं।

इन सभी कथाओं को जो जोड़ता है, वह है—ज्ञान। यह नाटक जोर देकर कहता है कि स्मृति स्वयं में एक राजनीतिक क्रिया है। जानना प्रतिरोध है। याद रखना पुनः-अधिकार है। मंच पर चार स्त्रियाँ विभिन्न सामाजिक पृष्ठभूमियों से आती हैं, पर उनकी पीड़ा एक ही सच्चाई में मिलती है—स्त्रियों के शरीर और भावनाओं का निरंतर उपनिवेशीकरण। गाँव हो या तथाकथित प्रगतिशील शहरी परिवेश, शोषण के रूप बदलते हैं, स्वरूप नहीं। छेड़छाड़, मौन थोपा जाना, भावनात्मक शोषण और सामाजिक अधिकार—ये सब व्यक्तिगत घटनाएँ नहीं, बल्कि व्यवस्थागत संरचनाएँ हैं। नाटक का सबसे असहज करने वाला पक्ष उसकी यह स्पष्टता है कि बौद्धिक और प्रगतिशील कहे जाने वाले समाज भी स्त्रियों से अपेक्षा करते हैं कि वे सहज रहें, अनुकूल रहें, भावनात्मक रूप से उपलब्ध रहें—परंतु कभी बाधक न बनें। यहाँ यह सुविधा भंग होती है।

इस मंच पर जब स्त्री चुप्पी तोड़ती है, वह कमजोर नहीं होती—वह सशक्त होती है। और यही सशक्तता समाज को विचलित करती है। दृश्य संरचना में निसार का योगदान उल्लेखनीय है। न्यूनतम लेकिन अर्थपूर्ण मंच सज्जा भावनात्मक और प्रतीकात्मक स्थानों के बीच सहजता से यात्रा करती है। कुछ भी सजावटी नहीं; हर वस्तु, हर रिक्तता कथा की सेवा में है। मंच स्वयं स्मृतियों का संग्रहालय बन जाता है। लगभग चालीस कलाकारों की टीम, जिनमें कई दुबई से आए थे, अद्भुत अनुशासन और सामूहिक चेतना के साथ मंच पर उपस्थित होती है। विशेष रूप से Kerala Kalamandalam से प्रशिक्षित दो शास्त्रीय नर्तकियों की उपस्थिति उल्लेखनीय रही। उनकी शारीरिक सजगता, स्थिरता और भावनात्मक सटीकता यह सिद्ध करती है कि शास्त्रीय प्रशिक्षण कितनी गहराई से राजनीतिक हो सकता है। एक नर्तकी होने के नाते, मेरे लिए एक क्षण अत्यंत अर्थपूर्ण था—कुचिपुड़ी प्रशिक्षित कलाकार अश्विनी का मंच पर जीवंत गायन। शास्त्रीय परंपराओं में अधिकांश नर्तक गायन में प्रशिक्षित होते हैं, पर उन्हें सार्वजनिक रूप से उस स्वर का प्रयोग करने की अनुमति नहीं दी जाती। यहाँ वह आंतरिक सीमा टूटती है। देह और स्वर एक हो जाते हैं।

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फेमिनिस्ट मैनिफेस्टो क्रोध का नाटक नहीं है। यह अंतर्मुखी पुनः-अधिकार की बात करता है। यह स्त्रियों से कहता है—शांति, कौशल, अध्ययन और कला की साधना की ओर लौटो। उन लोगों को प्रसन्न करने से इंकार करो जो भावनाओं का उपभोग करते हैं, पर उत्तरदायित्व नहीं लेते। यह नाटक चिल्लाता नहीं। यह सुनता है। और उसी सुनने में यह समाज से एक असहज प्रश्न पूछता है यदि एक स्त्री अपने इतिहास, अपनी देह, अपनी कला और अपने अंतःस्व को जान लेतो उस पर नियंत्रण कैसे संभव है?
फेमिनिस्ट मैनिफेस्टो केवल एक नाटक नहीं है। यह एक दर्पण है और कई लोगों के लिए एक सामना।

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