उमेश चन्द्र त्रिपाठी
प्रयागराज में मौनी अमावस्या के दौरान ज्योतिर्मठ के शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती के साथ हुए व्यवहार ने सनातन समाज में आक्रोश पैदा किया है। महराजगंज के कांग्रेस नेता व पूर्व जिला पंचायत सदस्य डॉ. राम नारायण चौरसिया ने इस पर गहरी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि शासन-प्रशासन को संतों की जनभावना का सम्मान करते हुए तुरंत हस्तक्षेप करना चाहिए और सम्मानजनक समाधान निकालना चाहिए।
आदि शंकराचार्य सनातन धर्म के महान पुनरुद्धारक थे। लगभग 1200 वर्ष पूर्व उन्होंने भारत को आध्यात्मिक व सांस्कृतिक एकता प्रदान की। केरल में जन्मे शंकराचार्य ने अल्पायु में वेद-उपनिषदों में महारत हासिल की। काशी में मंडन मिश्र व भारती से शास्त्रार्थ जीता। कुमारिल भट्ट से ज्ञान प्राप्त किया। मात्र 32 वर्ष में उन्होंने अद्वैत दर्शन की नींव रखी, जो आज भी भारतीय दर्शन की आधारशिला है। उन्होंने चार मठ स्थापित कर सनातन परंपरा को मजबूत किया।
वर्तमान विवाद में मौनी अमावस्या पर स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद प्रयागराज पहुंचे। संगम स्नान के लिए उनके बटुकों व अनुयायियों के साथ प्रशासन ने कथित अमर्यादित व्यवहार किया। भीड़ प्रबंधन के नाम पर रोका गया, धक्का-मुक्की हुई। इससे विवाद बढ़ा। शंकराचार्य ने स्नान बहिष्कार कर धरना दिया। अन्य पीठों के शंकराचार्य स्वामी सदानंद सरस्वती (द्वारका) व स्वामी निश्चलानंद सरस्वती (पुरी) ने प्रशासन से माफी मांगने की अपील की। उन्होंने कहा कि सत्ता अस्थायी है, अहंकार उचित नहीं। संयम व संवेदनशीलता दिखानी चाहिए। यह मुद्दा व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे सनातन समाज के स्वाभिमान से जुड़ा है। आदि शंकराचार्य की परंपरा में शंकराचार्य का सम्मान सर्वोपरि है। प्रशासन की हठधर्मिता से भावनाएं आहत हुईं। डॉ चौरसिया ने मांग की कि शासन शीघ्र हस्तक्षेप कर विवाद समाप्त करे, संतों का सम्मान सुनिश्चित करे। ऐसा न करने से धार्मिक सद्भाव प्रभावित होगा।
