उफ्फ..फ ! दलित मासूम के सात 55 दिन तक रेप

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लखनऊ। लगता है रेप करने वाले दरिन्दों को सरकार की परवाह नहीं है और पुलिस को वे जेब मे रखकर घूमते हैं। तमाम जिलों के आला पुलिस अफसर रेप के मामलें को लेकर सरकार को गुमराह कर रहे हैं। जिलों के पुलिस कप्तान रेप की घटनाओं को छुपाकर गुडवर्क को अंजाम का रिपोर्ट कार्ड शासन को दिखा रहे हैं पर असलिय कभी न कभी सामने आ ही जाती है। अलीगढ़ पुलिस की रेप को लेकर एक ऐसी ही कारगुजारी सामने आई है जहां उसने एक मासूम दलित से रेप की घटना को भी पी लिया। इतना ही नहीं अलीगढ़ पुलिस ने नामजद आरोपियों को तो झट से क्लीनचिट दे दी और इसकी एवज में दो बेगुनाहों को जेल में भेज दिया।

अलीगढ़ पुलिस के जुल्मों की कहानी यहीं पर खत्म नहीं होती है। जिस दलित मासूम के साथ रेप हुआ

उसका बयान तक पुलिस ने लेने की जरुरत नहीं समझी। मजबूर बाप ने जब बेटी के बयान के लिए कहा तो पुलिस ने उसे धमकाया और जेल में ठूंसने की धमकी तक दे डाली। मजबूर बाप बोलता है कि 55 दिन मेरी मासूम बेटी से रोज रेप करते मासूम पर क्या बीती होगी ? थाने में जाओं तो पुलिस कहती थी कि तेरी बेटी किसी के साथ भाग गई होगी। बात यहीं पर खत्म नहीं होती थाने के जिम्मेदार इंस्पेक्टर ने गैर-जिम्मेदराना शब्द बोलते हुए कहा कि जब वापस आएगी, तो एक बच्चा भी साथ लाएगी। लाचार बाप को समझौता करने की धमकियां मिल रही हैं।

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क्या कहा मासूम पीड़िता 

वे लोग मुझे खेत से उठा ले गए, फिर लोग नशा करके रेप करते रहे बच्ची ने कोर्ट को बताया कि मैं शौच के लिए घर से निकली थी। मुझे साहब सिंह, रामेश्वर और प्रकाश मिले। मेरे मुंह में कपड़ा ठूंसकर उठा ले गए। सड़क पर राकेश मौर्य की गाड़ी थी, उसमें डालकर एक अनजान जगह ले जाया गया। वहां दरोगा रामलाल भी मौजूद था। फिर राकेश गाड़ी को खैर के एक गोदाम में ले गया, जहां मेरे साथ चार दिन तक रेप हुआ। मेरे साथ राकेश, दरोगा रामलाल, रामेश्वर, साहब सिंह, प्रकाश के अलावा दरोगा पुत्तूलाल ने भी रेप किया। फिर मुझे दोबारा गाड़ी की डिक्की में डाल दिया गया। अलग-अलग जगह ले जाते। मुझे उन लोगों के नाम नहीं पता, मेरे साथ रेप होता रहा। फिर मुझे हरियाणा ले जाया गया। वो लोग हर रोज मेरे साथ रेप करते। मुझे पीटते, मैं सब कुछ सहने को मजबूर थी। आखिर में मुझे अनूपिया में जय प्रकाश के घर छोड़ दिया गया। यहां पर बॉबी, खेमचंद और जय प्रकाश ने मेरे साथ रेप किया। ये सब बहुत दर्दनाक था।

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जयप्रकाश के घर पर मुझे लगभग दो महीने रखा गया। हर दिन नए-नए लोग आते। वहां शराब पीते और इसके बाद मेरे के साथ रेप किया जाता। मैं चीखती, तो मेरे साथ मारपीट करते। जब उन लोगों का मन भर गया तो वह मुझे टप्पल के हामिदपुर में छोड़कर फरार हो गए। यहां पर बौना और पप्पू मिले, उन्होंने मेरी मदद की। लेकिन, पुलिसवालों ने उन दोनों को ही आरोपी बना दिया और मुकदमा दर्ज करके जेल भेज दिया। दोनों के खिलाफ चार्जशीट भी दायर कर दी गई थी। इस अनाचार पर दलित बेटी के लाचार पिता बताते हैं कि पिता कहते हैं कि बीती 30 अक्टूबर, 2022 की है। मेरी 13 साल की बेटी सुबह घर से बाहर निकली, मगर घर नहीं लौटी। मुझे लगा कि कहीं उसके साथ कोई अनहोनी न हो गई हो। पुलिस से मदद मांगी। जब बेटी नहीं मिली तो गांव के साहब सिंह, रामेश्वर और प्रकाश के खिलाफ नामजद नामजद रिपोर्ट दर्ज कराई। रिपोर्ट लिखने के 55 दिन के बाद 26 दिसंबर, 2002 को पुलिस ने मेरी बेटी को टप्पल के हामिदपुर के पास से बरामद किया। पुलिस ने कहा कि बौना और पप्पू उर्फ बिजेंद्र उसको उठाकर ले गए थे। पुलिस ने दो बेगुनाहों को जेल भेज दिया। 12 जनवरी, 2003 को चार्जशीट लगा दी। नामजद तीनों आरोपियों के नाम जांच में बाहर कर दिए। लेकिन मेरी बेटी के बयान नहीं कराए गए। मैंने जब बेटी के बयान लेने के लिए कहा, तो मुझे धमकाया गया और रुपए लेकर समझौता कर लेने के लिए कहा गया। जब मैं नहीं माना, तो जान से मारने की धमकी भी दी गई।

55 दिन मेरी मासूम बेटी से रोज रेप करते उस पर क्या बीता होगा? थाने में पुलिस कहती थी कि तेरी बेटी किसी के साथ भाग गई होगी। इंस्पेक्टर ने कहा कि जब वापस आएगी, तो एक बच्चा भी साथ लाएगी। मुझे धमकियां मिलीं। समझौता नहीं करेगा, तो मार डालेंगे। 23 साल बाद ये दर्द 75 साल के उस दलित बुजुर्ग का है, जिनकी नाबालिग बेटी के साथ 23 साल पहले अक्टूबर, 2002 में गैंगरेप हुआ था। 15 अक्टूबर को अलीगढ़ के फास्ट ट्रैक ने फैसला सुनाया।

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पुलिस ने दो बेगुनाहों को जेल भेजा। 12 जनवरी, 2003 को चार्जशीट लगा दी। जो आरोपी नामजद थे, उन्हें जांच में क्लीनचिट दे दी। बच्ची के बयान तक नहीं लिए। पिता ने जब बयानों के लिए कहा, तो उनको धमकाया गया। हाईकोर्ट के आदेश पर 17 फरवरी, 2003 को बच्ची के बयान हुए। तब सच्चाई सामने आई। बच्ची के साथ 55 दिन तक अलग-अलग लोगों ने लगातार रेप किया। कोर्ट ने बच्ची के बयान सुनने के बाद सात दोषियों को 20 साल की सजा सुनाई। इनमें दो रिटायर्ड इंस्पेक्टर, इंस्पेक्टर के बेटे समेत सात दोषी शामिल थे। बेटी के लाचार पिता ने हिम्मत नहीं खोई है वे कहते हैं कि बेटी को इंसाफ दिलाने के लिए मैं डटा रहा, डरा नहीं। हाईकोर्ट में केस दाखिल कराया। हाईकोर्ट के आदेश पर 17 फरवरी, 2003को मेरी बेटी के बयान दर्ज कराए गए। जब बेटी ने 55 दिनों की कहानी सुनाई, तो सुनने वालों की रूह कांप गई। जो महिला पुलिस कर्मी बयान ले रही थी, उनकी आंखों में भी आंसू आ गए। बुजुर्ग मां-पिता ने कहा- हमारे लिए ये जिंदगी और मौत की लड़ाई थी। इंसाफ मिलने से हम कुछ साल और जिएंगे।

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