आई लव मोहम्मद की हकीकत और साज़िशों का सच

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अजय कुमार

इस्लाम धर्म में बुतपरस्ती यानी मूर्तिपूजा को कड़ाई से हराम घोषित किया गया है। पैग़म्बर साहब की किसी तस्वीर, चित्र या मूर्ति बनाने पर हमेशा से पाबंदी रही है, क्योंकि इस्लाम का मूल संदेश एक ईश्वर की इबादत पर आधारित है, न कि किसी प्रतिमा या चित्र की पूजा पर। लेकिन इन दिनों उत्तर प्रदेश में नए तरह का चलन देखने को मिल रहा है, जिसमें जगह-जगह आई लव मोहम्मद लिखे बैनर और पोस्टर लगाए जा रहे हैं। मोहम्मद साहब के नाम पर समाज का माहौल खराब करने सहित दंगा फैलाया जा रहा है। सवाल यह है कि जब पैग़म्बर की तस्वीर तक बनाना मना है, तब क्या इस तरह के भावनात्मक नारे लगाकर धार्मिक और राजनीतिक लाभ उठाने की कोशिशें जायज़ मानी जा सकती हैं? पैग़म्बर मोहम्मद साहब ने अपने जीवनकाल में तौहीद का संदेश दिया था। उन्होंने हर तरह की बुतपरस्ती और चित्र या मूर्ति पूजा का खंडन किया। लेकिन आई लव मोहम्मद जैसी कार्यवाहियाँ इस्लाम की उसी मूल भावना से टकराती नज़र आती हैं। यहाँ सवाल यह नहीं कि मोहम्मद साहब के प्रति प्रेम या आदर किया जा रहा है, बल्कि यह है कि उस प्रेम को किस रूप में प्रदर्शित किया जा रहा है। इस्लाम में अपने पैग़म्बर से मोहब्बत दिखाने का तरीका उनके बताए मार्ग पर चलना और अमल करना है, न कि नारेबाज़ी और पोस्टरों से हंगामा खड़ा करना। कानपुर से आई लव मोहम्मद के पोस्टर से जो चिंगारी निकली थी  बरेली में उसने उग्र रूप धारण कर लिया। उपद्रवियों ने जम कर हिंसा और लूटपाट की। इस अराजकता के लिये विवादित मुस्लिम मौलाना तौकीर रजा सीधे तौर पर उतरदायी है।बरेली में तौकीर रजा सहित दंगा फैलाने वालों पर कार्रवाई के बाद इस समय वहां तनावपूर्ण शांति है।

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बीते कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश के कई शहरों में आई लव मोहम्मद लिखे पोस्टर, दीवारों पर बने बड़े-बड़े बैनर और झंडे देखने को मिल रहे हैं। इन बैनरों को लगाने का नाम भले ही धार्मिक प्रेम दिखाना बताया जा रहा हो, लेकिन जानकारों का मानना है कि इसके पीछे गहरी राजनीतिक नीयत छिपी हुई है। यह सिर्फ साधारण नारा नहीं है, बल्कि एक सोची-समझी साज़िश है जिसमें धार्मिक भावनाओं को भड़काकर समाज में तनाव पैदा किया जा रहा है। इन बैनरों का उद्देश्य केवल अपने समुदाय में धार्मिक जोश जगाना नहीं, बल्कि दूसरे धर्मों के लोगों को उकसाना भी है। सार्वजनिक जगहों पर लगाए जाने वाले ये पोस्टर जब किसी अन्य संप्रदाय के इलाके में लगाए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से टकराव की स्थिति बनती है। उत्तर प्रदेश के कई कस्बों और शहरों में यही देखने को मिला। मोहल्लों में एक वर्ग जब आई लव मोहम्मद के झंडे या बैनर लेकर निकलता है, तो दूसरा वर्ग इसे उकसावे की कार्रवाई मानता है। धीरे-धीरे माहौल गरमाने लगता है और छोटे-छोटे विवाद बड़े दंगों में बदल जाते हैं।

गौरतलब है कि प्रदेश की कानून व्यवस्था लंबे समय से धार्मिक तनावों को लेकर चुनौती झेल रही है। प्रशासन अक्सर नारे लगाने और पोस्टर चिपकाने वालों के खिलाफ सख्ती नहीं दिखाता, क्योंकि इसे धार्मिक भावनाओं से जुड़ा मामला बना दिया जाता है। लेकिन सवाल ये उठता है कि जब इस्लामी शिक्षाओं में चित्र और मूर्ति जैसी चीज़ों का कोई स्थान नहीं है, तो फिर इन पोस्टरों को धार्मिक स्वतंत्रता कैसे माना जा सकता है? यह स्पष्ट है कि प्रशासन की शिथिलता के कारण ही ये साज़िशें परवान चढ़ रही हैं। धार्मिक नारों और बैनरों का दूसरा बड़ा पहलू राजनीति से जुड़ा हुआ है। हर चुनावी मौसम में समुदाय विशेष की भावनाओं को भड़काकर वोट पाना एक आम चलन बन चुका है। आई लव मोहम्मद आंदोलन भी यही खेल लगता है। आम लोगों की आस्था को हथियार बनाकर न केवल वातावरण दूषित किया जा रहा है, बल्कि दंगे-फसादों का डर दिखाकर राजनैतिक गोलबंदी भी की जा रही है। इन घटनाओं के कारण समाज के आम नागरिक लगातार दहशत में जी रहे हैं। जिन इलाकों में पोस्टर लगाए जाते हैं, वहां तनाव फैल जाता है। दुकानें जल्दी बंद हो जाती हैं, दैनिक जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है और छोटे-छोटे बच्चों तक के मन में डर बैठ जाता है। बड़ों के दिमाग में यह सवाल गूंजता है कि यह प्यार दिखाने का तरीका है या दंगे भड़काने की चाल?

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वहीं कई मुस्लिम विद्वानों ने खुलकर कहा है कि इस तरह के नारे और बैनर इस्लामी शिक्षा के खिलाफ हैं। पैग़म्बर मोहम्मद साहब से असली प्रेम उनका आदर्श जीवन अपनाने में है, न कि झंडे और पोस्टर लहराने में। लेकिन यही धार्मिक संदेश जब तक आम जनता तक सही रूप में नहीं पहुंचेगा, तब तक ये साज़िशें जारी रहेंगी। भारत का इतिहास धार्मिक उन्माद और दंगों से भरा पड़ा है। छोटी-सी चिंगारी बड़े विस्फोट में बदल जाती है। अंग्रेजों के जमाने से लेकर आज तक, फूट डालो और राज करो की नीति बार-बार दोहराई जाती रही है। फर्क बस इतना है कि अब राजनीति करने वाले आधुनिक तरीकों से यही काम कर रहे हैं। पोस्टर, बैनर और नारे इसी आधुनिक हथियार का हिस्सा हैं।  बहरहाल, कुल मिलाकर इस्लामी विद्वानों को आम जनता को समझाना होगा कि मोहम्मद साहब के नाम का उपयोग राजनीतिक मंसूबों के लिए करना पाप है। असली अनुसरण उनके जीवन मूल्यों को अपनाने में है।किसी भी समुदाय की आस्था की आड़ लेकर शहर की शांति बिगाड़ने वालों पर तत्काल कार्रवाई होनी चाहिए। धार्मिक नारेबाज़ी के नाम पर पोस्टर या बैनर लगाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। समाज के सभी वर्गों को मिलकर यह समझना होगा कि ऐसे नारों के पीछे कौन-सी अंतरात्मा काम कर रही है। जब जनता खुद इन खेलों का शिकार नहीं बनेगी, तभी शांति कायम हो पाएगी। राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी’राजनीति का आधार धार्मिक भावनाएँ नहीं, बल्कि विकास और न्याय होना चाहिए। इसके लिए जनता को कठोर सवाल करना आवश्यक है।

 

आई लव मोहम्मद जैसे नारों और पोस्टरों को देखने पर तत्कालीन भावनाएँ भले ही धार्मिक प्रेम की प्रतीक लगें, लेकिन असलियत में इनका इस्तेमाल समाज में नफरत फैलाने और दंगे भड़काने की साज़िश के रूप में किया जा रहा है। जब इस्लाम खुद पैग़म्बर साहब की तस्वीर तक हराम मानता है, तो ऐसे पोस्टर और नारे धर्म की सेवा नहीं बल्कि धर्म के नाम पर राजनीति करने का साधन हैं। शांति, भाईचारा और आपसी सम्मान ही असली संदेश है, जो इस्लाम समेत हर धर्म की आत्मा है। अगर उत्तर प्रदेश और देश को इन गहरी साज़िशों से बचाना है, तो समाज को सत्य पहचानना होगा और उस पर एकजुट होकर खड़ा होना होगा।

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