
- आज भी राज परिवार मांगता है देवी से अनुमति
- काछन देवी की आराधना के बाद शुरू होंगे दशहरा के पारंपरिक आयोजन
- बेल की कांटेदार झूले पर लिटाई जाती है नाबालिग कन्या
हेमंत कश्यप
Jagdalpur: बस्तर के ऐतिहासिक दशहरा की परंपराएं आज भी सदियों पुरानी जनजातीय आस्था और सांस्कृतिक विरासत को जीवंत बनाए हुए हैं। इसी परंपरा के तहत काछन गादी का आयोजन शनिवार शाम को किया जाएगा। बस्तर राजपरिवार दशहरा मनाने के लिए काछन देवी से अनुमति और आशीर्वाद प्राप्त करेगा। दावा किया जाता है कि करीब 305 साल पहले बस्तर के तत्कालीन महाराजा दलपत देव ने इस परंपरा की शुरुआत की थी, जो आज भी जारी है।

बस्तर दशहरा की प्रमुख पूजा विधियों में शामिल काछन गादी के दौरान पनका जाति की एक नाबालिग कन्या को देवी के रूप में आराधित किया जाता है। परंपरा के अनुसार, कन्या को बेल के वृक्ष के कांटों से तैयार झूले पर लिटाया जाता है। इसके बाद राजपरिवार देवी की आराधना कर दशहरा उत्सव मनाने की अनुमति मांगता है। मान्यता है कि काछन देवी की स्वीकृति और आशीर्वाद के बाद ही दशहरा के पारंपरिक आयोजन आगे बढ़ते हैं।
1721 में जगतुगुड़ा से जुड़ी है परंपरा की कहानी
बस्तर की इस परंपरा का संबंध वर्ष 1721 की एक ऐतिहासिक घटना से बताया जाता है। उपलब्ध विवरणों के अनुसार, तत्कालीन बस्तर महाराज दलपत देव आंवट प्रेमी राजा थे। उन्होंने जगत को आश्रय दिया और एक दिन आंवट की तैयारी के साथ जगतुगुड़ा पहुंचे। वहां उन्हें भा गया, जिसके बाद उन्होंने अपनी राजधानी बस्तर गांव से जगतुगुड़ा स्थानांतरित कर ली।

बताया जाता है कि वहां पहले से रह रहे माहरा कबीले को राजा ने पर्याप्त सम्मान दिया। दशहरा मनाने के लिए काछन देवी से प्रतिवर्ष आशीर्वाद मांगने की परंपरा शुरू हुई। इसके बाद नगर में बस्तर दशहरा के प्रारंभिक आयोजन की अनुमति काछन देवी से लेने की परंपरा स्थापित हुई।
पशुधन और अन्न-धन की रक्षा करती हैं काछन देवी
स्थानीय मान्यताओं में काछन देवी को पशुधन और अन्न-धन की रक्षा करने वाली देवी माना जाता है। अश्विनी मास की अमावस्या के दिन काछन गादी का आयोजन किया जाता है। काछन देवी की गुड़ी नगर के पत्थरागुड़ा जाने वाले मार्ग पर स्थित बताई जाती है। लालबाग के पास भी इस परंपरा से जुड़े आयोजन होते हैं, जहां दशहरा के दौरान राजपरिवार की ओर से कार्यक्रम की अगुवाई की जाती है।
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काछन गादी बस्तर दशहरा की उन विशिष्ट परंपराओं में से एक है, जो इस उत्सव को देश के दूसरे दशहरा आयोजनों से अलग पहचान देती है। यहां धार्मिक अनुष्ठान के साथ जनजातीय संस्कृति, राजपरिवार की ऐतिहासिक भूमिका और स्थानीय समुदायों की आस्था का अनूठा संगम देखने को मिलता है।
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