नेपाल की त्रासदीः प्रकृति का कहर नहीं, भू-अभियांत्रिकी का प्रयोग?

Mudflood in Nepal

Mudflood in Nepal: कृत्रिम बारिश संभव है तो कृत्रिम बाढ़ भी संभव हो सकती है। नेपाल त्रासदी से यह बड़ा सवाल सामने आया है। नेपाल की त्रासदी केवल एक प्राकृतिक त्रासदी भर थी, या कोई गंभीर विध्वंसक प्रयोग ? ग्लेशियर में इतना कीचड़ ? इतनी कालिमा ? पहाड़ से इतना गंदा प्रवाह ? अब जबकि काफी कुछ थमने लगा है तो इस पक्ष पर विचार भी बहुत जरूरी है। कहीं यह कोई भू-अभियांत्रिकी का प्रयोग तो नहीं था? लगता तो ऐसा ही है कि यह एक ऐसा प्रयोग था जिसमे युद्ध दिखा नहीं, लेकिन था युद्ध ही।

चीन, तिब्बत-नेपाल बॉर्डर पर जो सैलाब आया, उसे मीडिया ने बड़ी चालाकी से फ्लैश फ्लड बोल दिया ताकि आप “कुदरत का कहर है, बारिश ज्यादा हुई,” यही समझें और इसी के इर्द-गिर्द सोचते रहें। मडफ्लड भी शायद सभी ने पहली बार ही सुना। सच यह है कि यह पानी की बाढ़ थी ही नहीं। ये तिब्बत-नेपाल बॉर्डर पर आया कीचड़ का सैलाब था और कीचड़ की बाढ़ कुदरत नहीं लाती, यह गंभीर प्रयोग करके लाई जाती है।

आचार्य संजय तिवारी

फ्लैश फ्लड और मडफ्लड में फर्क

फ्लैश फ्लड क्या होता है? पानी आता है, बहता है, निकल जाता है। मडफ्लड क्या होता है? इसमें पानी नहीं, गाढ़ा, काला, सीमेंट जैसा लावा आता है। 20 फीट ऊंचा। जो अपने साथ पहाड़, पेड़, घर, लोहा, सब कुछ पीसते हुए बहा ले जाता है। उसके बाद भूमि वर्षों तक बंजर रहती है। उसमें बदबू केमिकल की होती है, मिट्टी की नहीं। अब यह देखने और समझने की बात है कि नेपाल से जो वीडियो आए, उनमें पानी कहाँ था? इसमें काली राख, काला कीचड़, काला सैलाब था। किसी ने भी क्या कभी बारिश के पानी का रंग काला देखा है? ऐसा किसी ने नहीं देखा, क्योंकि यह बारिश थी ही नहीं।

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भू-अभियांत्रिकी अर्थात जियोइंजीनियरिंग का काला सच

जियोइंजीनियरिंग या भू अभियांत्रिकी के बारे में अब सभी को जान लेने का समय है। जब इंसान भगवान बनने की कोशिश करता है, तो वह मौसम को हथियार बना लेता है। इस प्रयोग को समझिए:

1. क्लाउड सीडिंग एंड केमिकल स्प्रेइंग

तिब्बत के पठार पर महीनों से लगातार हवाई जहाजों से केमिकल छिड़काव किया गया। आसमान में जो सफेद लकीरें तुम हवाई जहाज की समझते हो, वो जहर है। बेरियम, एल्युमिनयम के कण। बादलों को जबरदस्ती भारी बनाया जाता है।

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2. हार्प टेक्नोलाजी

पहाड़ों पर लगी बड़ी-बड़ी एंटीना जैसी मशीनें। जो आसमान में मौजूद नमी को एक जगह खींच कर, एक ही जगह पर फाड़ देती हैं। एक ही घाटी में 1 साल की बारिश 2 घंटे में गिरा दी जाती है।

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3. ग्लेसियल बॉम्बिंग

तिब्बत की तरफ के ग्लेशियर जो हजारों साल से जमे थे, उन्हें लेजर या थर्मल वेपन से पिघलाया गया। बर्फ के साथ हजारों साल की दबी हुई काली मिट्टी, राख और चट्टानें एक साथ पिघलीं – और बना मडफ्लड यानी काली कीचड़ वाली बाढ़।
स्पष्ट है कि नेपाल की यह बाढ़ कोई सामान्य पानी की बाढ़ नहीं, बल्कि एक सोचा-समझा भू अभियांत्रिकी से तैयार जल बम था। इसके पीछे का उद्देश्य भी स्पष्ट है। यह सीधा हमला नहीं था लेकिन एक प्रयोग जरूर कहा जाएगा। तिब्बत बॉर्डर पर जो नए रास्ते, जो डैम बन रहे थे, उनको एक रात में खत्म कर दो। बिना गोली चलाए, बिना दुनिया को पता चले। यह अभियान अत्यंत सफल हो गया।

इसका एक लक्ष्य भारत को चेतावनी जैसा था। बता दिया गया कि देखो, हम बिना सेना और हथियार भेजे तुम्हारी नदियों को कीचड़ बना सकते हैं। ब्रह्मपुत्र, कोसी, गंडक – सबका पानी हमारे पास है। अगला नंबर तुम्हारा भी हो सकता है। तीसरा और सबसे डरावना लक्ष्य जमीन हथियाना भी हो सकता है। इस मडफ्लड के बाद जो जमीन बचती है,वह रहने लायक नहीं रहती। लोग खुद ही छोड़ कर भाग जाते हैं। उस जमीन को कोई और आकर “विकास” के नाम पर ले लेता है।

वस्तुतः युद्ध की यह बिल्कुल नई तकनीक है। इसमें टैंक नहीं, बादल चलते हैं। कुछ दिनों में ही दुनिया इसे नेपाल की त्रासदी की खबर समझ कर भूल जाएगी। संभव है कि कल यही काला कीचड़ हिमाचल में आएगा, उत्तराखंड में आएगा, सिक्किम में आएगा। तब भी मीडिया कहेगा – “अचानक आई मूसलाधार बारिश से तबाही।” अब यह सबको याद रखना चाहिए कि बारिश में पानी गिरता है, कीचड़ नहीं। जब आसमान से कीचड़ गिरे, तो समझ लीजिए कि आसमान पर किसी और का कब्जा है। यह कुदरत का कहर नहीं है। ये लैब में बैठे कुछ लोगों का कहर का प्लान है। गंभीर योजना है। कोरोना की बीमारी वाले षडयंत्र की भांति। नेपाल में बाढ़ समझ कर सो जाने का समय नहीं है यह। यह समय अतिशय सतर्क रहने का है।

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