कारगिल युद्ध में IAF का शौर्य, ऑपरेशन सफेद सागर ने ऐसे तोड़ी दुश्मन की कमर

Operation Safed Sagar

कारगिल की 18 हजार फीट ऊंची चोटियों पर IAF का पराक्रम

Operation Safed Sagar: साल 1999 में जब देश क्रिकेट वर्ल्ड कप के रोमांच में डूबा था, उसी दौरान जम्मू-कश्मीर के कारगिल की ऊंची और दुर्गम पहाड़ियों पर एक ऐसा संघर्ष आकार ले रहा था, जिसने भारतीय सेना और वायुसेना के सामने अभूतपूर्व चुनौती खड़ी कर दी। मई की शुरुआत में कारगिल की चोटियों पर संदिग्ध गतिविधियों की जानकारी मिलने लगी और धीरे-धीरे यह साफ हुआ कि पाकिस्तानी सैनिकों और घुसपैठियों ने रणनीतिक ऊंचाइयों पर कब्जा जमा लिया है। इन चोटियों की ऊंचाई कई जगह 14,000 से 18,000 फीट तक थी। यहां से दुश्मन की चौकियां श्रीनगर-लेह मार्ग की अहम सप्लाई लाइन पर नजर रख सकती थीं। ऐसे हालात में भारतीय वायुसेना को बेहद ऊंचाई पर दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाने की जिम्मेदारी मिली।

पेट्रोलिंग टीम पर हमले से खुली घुसपैठ की तस्वीर

कारगिल में हालात की गंभीरता तब सामने आने लगी जब लेफ्टिनेंट सौरभ कालिया के नेतृत्व वाली पेट्रोलिंग टीम का संपर्क टूट गया। टीम के सदस्यों को पाकिस्तानी सेना ने पकड़ लिया और बाद में उनके साथ अमानवीय व्यवहार किए जाने की खबर सामने आई। इसके बाद इलाके की स्थिति समझने और लापता जवानों का पता लगाने के लिए दूसरी टीम भेजी गई। इस दौरान भी जवानों को भारी विरोध का सामना करना पड़ा। जैसे-जैसे सेना को दुश्मन की मौजूदगी और उसके कब्जे वाली चोटियों की जानकारी मिलती गई, भारतीय सुरक्षा बलों ने अपनी कार्रवाई तेज कर दी।

वायुसेना के सामने थी बेहद कठिन चुनौती

कारगिल युद्ध में वायुसेना का इस्तेमाल अपने आप में एक बड़ी चुनौती थी। इतनी ऊंचाई पर हवा बेहद पतली होती है, जिसका सीधा असर लड़ाकू विमानों के इंजन और हथियारों की क्षमता पर पड़ता है। इसके अलावा भारतीय पायलटों को ऐसे लक्ष्यों पर हमला करना था जो चट्टानों और पहाड़ियों के बीच छिपे हुए थे। सामान्य युद्ध परिस्थितियों के विपरीत यहां बड़े और आसानी से दिखाई देने वाले सैन्य ठिकाने नहीं थे। एक और बड़ी पाबंदी यह थी कि भारतीय विमानों को नियंत्रण रेखा (LoC) पार नहीं करनी थी। इसका मतलब था कि पायलटों को भारतीय सीमा के भीतर रहते हुए ही बेहद सटीक तरीके से दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाना था।

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शुरू हुआ ‘ऑपरेशन सफेद सागर’

कारगिल में हवाई कार्रवाई के लिए भारतीय वायुसेना ने ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ शुरू किया। यह अभियान ऊंचाई वाले इलाकों में हवाई युद्ध की नई रणनीतियों के लिए जाना गया। शुरुआत में Mi-17 हेलीकॉप्टरों को भी रॉकेट हमलों के लिए इस्तेमाल किया गया। लड़ाकू विमान इन अभियानों में हवाई सुरक्षा प्रदान कर रहे थे। हालांकि जल्द ही पाकिस्तानी सेना की पोर्टेबल मिसाइलों का खतरा सामने आया और वायुसेना को अपनी रणनीति में बदलाव करना पड़ा।

नचिकेता के इजेक्ट होने और अजय आहूजा की शहादत ने बदली रणनीति

ऑपरेशन के शुरुआती दौर में भारतीय वायुसेना को कुछ गंभीर नुकसान भी उठाने पड़े। फ्लाइट लेफ्टिनेंट नचिकेता के MiG-27 में तकनीकी समस्या आने के बाद उन्हें विमान से इजेक्ट करना पड़ा और वह पाकिस्तानी क्षेत्र में जा पहुंचे। उनकी तलाश में गए स्क्वाड्रन लीडर अजय आहूजा को भी पाकिस्तान की ओर से निशाना बनाया गया। बाद में उनकी शहादत ने पूरे देश को झकझोर दिया। इसके बाद एक Mi-17 हेलीकॉप्टर को भी मिसाइल से निशाना बनाया गया, जिसमें स्क्वाड्रन लीडर राजीव पुंडीर समेत चार वायुसेना कर्मी शहीद हुए। इन घटनाओं के बाद वायुसेना ने हेलीकॉप्टरों के इस्तेमाल की रणनीति पर पुनर्विचार किया।

GPS और नई तकनीक से मिली सटीकता

दुश्मन के छिपे हुए ठिकानों पर सटीक हमला करने के लिए वायुसेना ने उपलब्ध तकनीक का बेहतर इस्तेमाल शुरू किया। लक्ष्य की पहचान और बमबारी को ज्यादा सटीक बनाने के लिए GPS और अन्य निगरानी साधनों की मदद ली गई। पायलटों ने ऊंचाई वाले इलाकों में बम गिराने की तकनीक को भी परिस्थितियों के मुताबिक बदला। अलग-अलग एयर-टू-ग्राउंड रेंज में अभ्यास कर पायलटों ने उन परिस्थितियों के लिए खुद को तैयार किया, जिनका सामना उन्हें कारगिल की चोटियों पर करना था।

मिराज-2000 ने बदली जंग की तस्वीर

कारगिल युद्ध में भारतीय वायुसेना के Mirage-2000 लड़ाकू विमानों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण साबित हुई। इन विमानों को लेजर-गाइडेड बमों और आधुनिक लक्ष्य पहचान प्रणालियों के साथ तैयार किया गया। इन विमानों की सटीक बमबारी ने पाकिस्तानी सेना के कई महत्वपूर्ण ठिकानों को भारी नुकसान पहुंचाया। खास तौर पर बटालिक क्षेत्र में मुंथो ढालो जैसे लॉजिस्टिक्स बेस पर किए गए हमले ने पाकिस्तानी सेना की सप्लाई व्यवस्था को प्रभावित किया। इसके बाद टाइगर हिल समेत कई रणनीतिक चोटियों के आसपास पाकिस्तानी ठिकानों पर सटीक हवाई हमले किए गए। इन हमलों ने जमीन पर आगे बढ़ रही भारतीय सेना के लिए रास्ता आसान करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

‘ऑपरेशन सफेद सागर’ बना भारतीय वायुसेना की ताकत का प्रतीक

कारगिल युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना ने बेहद कठिन भौगोलिक और मौसम संबंधी परिस्थितियों में अभियान चलाया। 18 हजार फीट तक की ऊंचाई पर दुश्मन के ठिकानों को निशाना बनाना आसान नहीं था, लेकिन पायलटों ने अपनी रणनीति, तकनीक और प्रशिक्षण के दम पर चुनौती का सामना किया। ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ ने यह साबित किया कि ऊंचाई वाले युद्धक्षेत्र में हवाई ताकत कितनी निर्णायक भूमिका निभा सकती है।

सेना की जमीनी कार्रवाई और वायुसेना के सटीक हमलों के संयुक्त प्रभाव ने अंततः कारगिल की चोटियों को वापस हासिल करने में अहम योगदान दिया। कारगिल युद्ध भारतीय सैन्य इतिहास के उन अध्यायों में शामिल है, जहां विपरीत परिस्थितियों में भारतीय जवानों और वायु योद्धाओं ने अदम्य साहस का परिचय दिया। ‘ऑपरेशन सफेद सागर’ आज भी भारतीय वायुसेना के साहस, रणनीति और तकनीकी क्षमता की मिसाल के तौर पर याद किया जाता है।

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