तसलीमा नसरीन की ‘लज्जा’ पर क्यों हुआ था इतना विवाद?

बाबरी विध्वंस के बाद बांग्लादेश की कहानी और विवाद का पूरा घटनाक्रम

Taslima Nasrin Lajja Controversy: बांग्लादेश की चर्चित लेखिका तसलीमा नसरीन एक बार फिर अपने बयानों को लेकर चर्चा में हैं। हाल ही में करीब 19 साल बाद कोलकाता पहुंचीं तसलीमा ने मदरसों, मस्जिदों, धर्म और बांग्लादेश की राजनीति पर खुलकर अपनी राय रखी। उन्होंने बांग्लादेश में आवामी लीग पर प्रतिबंध लगाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए कहा कि किसी भी बड़े राजनीतिक दल पर प्रतिबंध लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।

उन्होंने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का समर्थन करते हुए कहा कि हर व्यक्ति को अपनी बात रखने का अधिकार मिलना चाहिए। हालांकि, उनके इन बयानों के बाद कुछ मुस्लिम संगठनों ने कड़ी आपत्ति जताई। यह पहला अवसर नहीं है जब तसलीमा नसरीन विवादों में घिरी हों। इससे पहले उनका चर्चित उपन्यास ‘लज्जा’ भी व्यापक विवाद का कारण बना था।

‘लज्जा’ में क्या लिखा गया था?

तसलीमा नसरीन का उपन्यास ‘लज्जा’ वर्ष 1993 में प्रकाशित हुआ था। यह उपन्यास 6 दिसंबर 1992 को बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में हिंदू अल्पसंख्यकों के खिलाफ हुई सांप्रदायिक हिंसा की पृष्ठभूमि पर आधारित है।

उपन्यास में हिंदू समुदाय पर हुए हमलों, लूटपाट, मंदिरों को नुकसान पहुंचाने, पलायन और हिंसा का चित्रण किया गया है। लेखिका ने धार्मिक कट्टरता और सांप्रदायिक हिंसा की आलोचना करते हुए यह सवाल उठाया कि धर्मनिरपेक्षता के आधार पर बने बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा क्यों नहीं हो सकी।

समर्थकों ने इस पुस्तक को सामाजिक यथार्थ का दस्तावेज बताया, जबकि आलोचकों ने आरोप लगाया कि इसमें मुस्लिम समुदाय की नकारात्मक छवि पेश की गई है।

क्या है ‘लज्जा’ की कहानी?

उपन्यास की कहानी सुधामय दत्ता और उनके परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है। परिवार में पत्नी किरणमयी, बेटा सुरंजन और बेटी माया हैं। परिवार धर्मनिरपेक्ष सोच रखता है और तमाम मुश्किलों के बावजूद अपना देश छोड़ना नहीं चाहता।

बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद बांग्लादेश में सांप्रदायिक तनाव बढ़ता है और हिंदू समुदाय पर हमलों का सिलसिला शुरू हो जाता है। हालात लगातार बिगड़ते हैं और अंततः माया का अपहरण हो जाता है। इस घटना के बाद परिवार पूरी तरह टूट जाता है और सुधामय दत्ता, जो पहले देश छोड़ने के खिलाफ थे, अंत में भारत आने का फैसला करते हैं।

विवाद क्यों हुआ?

‘लज्जा’ के प्रकाशन के बाद बांग्लादेश में व्यापक विरोध प्रदर्शन हुए। कुछ कट्टरपंथी संगठनों ने आरोप लगाया कि पुस्तक इस्लाम को बदनाम करती है और मुस्लिम समाज की नकारात्मक छवि प्रस्तुत करती है। दूसरी ओर तसलीमा नसरीन का कहना था कि उन्होंने किसी धर्म का नहीं, बल्कि धर्म के नाम पर होने वाली हिंसा और कट्टरता का विरोध किया है।

‘लज्जा’ विवाद का घटनाक्रम

1993

  • ‘लज्जा’ प्रकाशित हुई।
  • बांग्लादेश सरकार ने पुस्तक पर प्रतिबंध लगा दिया।
  • कई संगठनों ने विरोध प्रदर्शन किए और लेखिका को धमकियां मिलने लगीं।

मई 1994

  • एक साक्षात्कार के बाद धार्मिक भावनाएं आहत करने के आरोप लगे।
  • कुछ संगठनों ने उनके खिलाफ फतवे जारी किए और जान से मारने की धमकियां दीं।
  • सरकार ने उनके खिलाफ मामला दर्ज किया।

5 जून 1994

  • गिरफ्तारी से बचने के लिए तसलीमा सार्वजनिक जीवन से गायब हो गईं।

अगस्त 1994

  • उन्होंने ढाका हाई कोर्ट में आत्मसमर्पण किया, जहां उन्हें जमानत मिली।
  • लगातार सुरक्षा खतरे के बीच उन्होंने बांग्लादेश छोड़ दिया और स्वीडन चली गईं।

2004

  • भारत ने उन्हें अस्थायी निवास की अनुमति दी और वे कोलकाता में रहने लगीं।

2007

  • कोलकाता में विरोध प्रदर्शनों के बाद उन्हें पश्चिम बंगाल छोड़ना पड़ा और बाद में वे भारत के अन्य शहरों में रहीं।

2025

  • लगभग 19 वर्ष बाद तसलीमा नसरीन दोबारा कोलकाता पहुंचीं। उन्होंने इच्छा जताई कि यदि सुरक्षा सुनिश्चित हो तो वे वहां स्थायी रूप से रहना चाहेंगी।

तसलीमा नसरीन का पक्ष

तसलीमा नसरीन ने हमेशा यह कहा है कि ‘लज्जा’ किसी धर्म विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि सांप्रदायिक हिंसा और धार्मिक कट्टरता के विरोध में लिखी गई थी। उनके अनुसार, उनके खिलाफ जारी फतवों और विरोध का कारण केवल यह उपन्यास नहीं, बल्कि महिलाओं के अधिकार, धार्मिक कट्टरता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर लिखी गई उनकी अन्य पुस्तकें और लेख भी रहे हैं।

आज भी ‘लज्जा’ दक्षिण एशिया के सबसे चर्चित और विवादित उपन्यासों में गिनी जाती है। यह पुस्तक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, धार्मिक सहिष्णुता और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बहस का महत्वपूर्ण आधार मानी जाती है।

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