
प्रबुद्ध सम्मेलन से अखिलेश का बड़ा संदेश, PDA की नई परिभाषा में जोड़ा ‘पंडित’;
यूपी की 100 से अधिक सीटों पर असर डाल सकता है ब्राह्मण वोट
UP Brahmin Vote Bank 2027: उत्तर प्रदेश में 2027 विधानसभा चुनाव की आहट के साथ ही राजनीतिक दलों ने अपने-अपने सामाजिक समीकरण साधने शुरू कर दिए हैं। इसी कड़ी में समाजवादी पार्टी ने लखनऊ में आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन के जरिए साफ संकेत दिया है कि उसकी नजर भारतीय जनता पार्टी (BJP) के सबसे मजबूत माने जाने वाले ब्राह्मण वोट बैंक पर है। सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने सम्मेलन के मंच से ब्राह्मण समाज को साधने की कोशिश करते हुए न केवल कई प्रमुख ब्राह्मण नेताओं को आगे रखा, बल्कि PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की नई व्याख्या भी पेश की।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उत्तर प्रदेश में ब्राह्मण मतदाता करीब 10 से 12 प्रतिशत हैं और लगभग 100 विधानसभा सीटों पर उनका प्रभाव निर्णायक माना जाता है। ऐसे में यदि इस वोट बैंक में किसी प्रकार का विभाजन होता है तो उसका सीधा असर चुनावी नतीजों पर पड़ सकता है।
प्रबुद्ध सम्मेलन में ब्राह्मण कार्ड
लखनऊ में समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता और ‘छोटे लोहिया’ के नाम से प्रसिद्ध जनेश्वर मिश्र की जयंती पर आयोजित प्रबुद्ध सम्मेलन में सपा ने पूरी रणनीति के साथ ब्राह्मण समाज को संदेश देने की कोशिश की। मंच पर पवन पांडेय, माता प्रसाद पांडेय, अभिषेक मिश्रा, करुणेश द्विवेदी और सनातन पांडेय जैसे नेताओं की मौजूदगी रही।
कार्यक्रम में शिव तांडव स्तोत्र का पाठ हुआ, डमरू बजाया गया और अखिलेश यादव ने स्वयं त्रिशूल धारण कर सांस्कृतिक और धार्मिक प्रतीकों के जरिए संदेश देने का प्रयास किया।
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PDA की नई परिभाषा में ‘पंडित’
सम्मेलन में अखिलेश यादव ने PDA को लेकर नया राजनीतिक संदेश दिया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग PDA की अलग-अलग परिभाषाएं गढ़ रहे हैं, लेकिन PDA में ‘पी’ का अर्थ ‘पंडित’ भी है।
उन्होंने कहा कि जितनी पीड़ा समाज को दी जाएगी, उतना ही PDA मजबूत होगा। इस बयान को राजनीतिक जानकार ब्राह्मण समाज को सीधे संदेश देने की रणनीति के रूप में देख रहे हैं।
यूपी में ब्राह्मण वोट का राजनीतिक इतिहास
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण समुदाय हमेशा से प्रभावशाली भूमिका निभाता रहा है।
कांग्रेस का मजबूत आधार रहा ब्राह्मण समाज
आजादी के बाद लंबे समय तक ब्राह्मण मतदाता कांग्रेस के साथ जुड़े रहे। उत्तर प्रदेश में अब तक छह ब्राह्मण मुख्यमंत्री बने और सभी कांग्रेस से थे। इनमें पंडित गोविंद बल्लभ पंत, संपूर्णानंद, कमलापति त्रिपाठी, हेमवती नंदन बहुगुणा, वीर बहादुर सिंह और नारायण दत्त तिवारी प्रमुख नाम हैं।
राम मंदिर आंदोलन के बाद BJP की ओर झुकाव
1990 के दशक में राम मंदिर आंदोलन के बाद ब्राह्मण मतदाताओं का बड़ा हिस्सा बीजेपी के साथ जुड़ने लगा। हालांकि गठबंधन राजनीति के दौर में यह वोट बैंक कई दलों में बंटता भी रहा।
2007 में मायावती का सोशल इंजीनियरिंग मॉडल
बहुजन समाज पार्टी ने 2007 में ‘ब्राह्मण-दलित’ सामाजिक समीकरण के सहारे पूर्ण बहुमत की सरकार बनाई। उस चुनाव में BSP के 41 ब्राह्मण विधायक जीतकर विधानसभा पहुंचे थे।
जिसके ज्यादा ब्राह्मण विधायक, उसकी सत्ता
राजनीतिक आंकड़े बताते हैं कि 2007 के बाद से जिस दल के सबसे अधिक ब्राह्मण विधायक चुने गए, प्रदेश में सत्ता भी उसी दल के पास रही।
- 2007: BSP के 41 ब्राह्मण विधायक
- 2012: SP के 21 ब्राह्मण विधायक
- 2017: BJP के 58 ब्राह्मण विधायक
- 2022: BJP के 41 ब्राह्मण विधायक
कृष्ण-सुदामा की दोस्ती का उदाहरण
ब्राह्मण समाज को साधने के प्रयास में अखिलेश यादव ने भगवान कृष्ण और सुदामा की मित्रता का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि दुनिया में ऐसी दोस्ती का दूसरा उदाहरण नहीं मिलता और समाजवादी पार्टी ने हमेशा सम्मान और सामाजिक समरसता की राजनीति की है।
उनके इस बयान को सामाजिक और भावनात्मक जुड़ाव स्थापित करने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
BJP का पलटवार
समाजवादी पार्टी के इस अभियान पर बीजेपी ने भी तीखी प्रतिक्रिया दी है। उत्तर प्रदेश के उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक ने सपा पर निशाना साधते हुए कहा कि यह वैसा ही है जैसे “सौ-सौ चूहे खाकर बिल्ली हज को चली।”
उन्होंने आरोप लगाया कि सपा के शासनकाल में प्रदेश में गुंडागर्दी, अराजकता और दंगों का माहौल रहा तथा सनातन संस्कृति को नुकसान पहुंचाने का काम किया गया।
राम मंदिर और ब्राह्मण वोट पर नजर
इधर राम मंदिर में चढ़ावे और दानपात्र से जुड़े कथित विवाद को लेकर भी सियासत तेज हो गई है। विधानसभा से लेकर संसद तक विपक्ष सरकार को घेरने की कोशिश कर रहा है। समाजवादी पार्टी इस मुद्दे को उठाकर ब्राह्मण और हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने की रणनीति पर काम करती दिखाई दे रही है।
2027 की सियासत का बड़ा सवाल
उत्तर प्रदेश की राजनीति में ब्राह्मण मतदाता हमेशा सत्ता की दिशा तय करने वाले अहम वर्गों में रहे हैं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या समाजवादी पार्टी बीजेपी के पारंपरिक ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाने में सफल होगी, या फिर बीजेपी अपनी मजबूत पकड़ बरकरार रखेगी?
2027 के विधानसभा चुनाव की ओर बढ़ते उत्तर प्रदेश में यह लड़ाई केवल वोटों की नहीं, बल्कि सामाजिक समीकरणों और राजनीतिक संदेशों की भी होगी।
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