दो टूक : चुनावी मोड में यूपी…अबकी लड़ाई हार्ड और साफ्ट हिंदुत्व की

UP in election mode

राजेश श्रीवास्तव

UP in election mode पिछले लगभग एक महीने से उत्तर प्रदेश की सियासत का माहौल बदला हुआ है। मुख्मयंत्री योगी आदित्यनाथ इन दिनों पूरे उत्तर प्रदेश को मथ रहे हैं, एक-एक दिन में वह दो-दो जिलों में जनसभायें कर रहे हैं। मानों विधानसभा चुनाव चल रहा हो। आखिर ऐसा क्या हो गया है चुनाव की मुनादी नहीं हुई और न ही चुनाव समय से पहले होने का आसार नजर आ रहे हैं। तो दरअसल ऐसा क्या हो गया कि उत्तर प्रदेश के आगामी विधानसभा चुनाव 2027 के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ अभी से पूरी तरह से चुनावी मोड में आ चुके हैं। उन्होंने अपनी रणनीति को धार देने और कार्यकर्ताओं में जोश भरने के लिए धुआंधार जिलों के दौरे शुरू कर दिए हैं। इसके साथ ही, मंत्रियों को जिलों के प्रभार सौंपकर सांगठनिक फ़ेरबदल भी किए हैं।

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मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने आगामी चुनावों को ध्यान में रखते हुए कई ठोस कदम उठाए हैं। सीएम योगी लगातार प्रदेश के अलग-अलग हिस्सों में जनसभाएं और प्रबुद्ध सम्मेलनों को संबोधित कर रहे हैं। चुनावी तैयारियों को पुख्ता करने के लिए, मुख्यमंत्री ने मंत्रियों और प्रभारी मंत्रियों के जिलों में बड़ा फ़ेरबदल किया है, ताकि योजनाओं का क्रियान्वयन और जमीनी पकड़ मजबूत हो सके। चुनाव से पहले सीएम योगी एक बार फिर अपने आक्रामक तेवर और ‘हार्ड हिदुत्व’ की रणनीति में लौट आए हैं। 2027 के महासमर को जीतने के लिए भाजपा और सरकार ‘गौ, गुंडा, गन्ना, गंगा और गाजियाबाद’ जैसे मुद्दों पर फोकस कर रही है। इस सब के बीच, भारतीय जनता पार्टी ने भी स्पष्ट कर दिया है कि 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव में सीएम योगी ही पार्टी का मुख्य चेहरा होंगे।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘चुनावी मोड’ में सक्रिय होने के पीछे 2027 के यूपी विधानसभा चुनाव की बड़ी तैयारियां हैं। हार के डर और सत्ता विरोधी रुझान को खत्म करने के लिए पार्टी ने नया ब्लू-प्रिंट तैयार किया है। भारतीय जनता पार्टी ने सीएम योगी के नेतृत्व में 2027 के चुनाव का ब्लूप्रिंट तैयार कर लिया है। विपक्ष खासकर समाजवादी पार्टी की जातियों की गिनती, पीडीए और ‘प्लान 100’ की काट के लिए योगी ने आक्रामक हिदुत्व और विकास का फॉर्मूला लागू किया है। हाल ही में मुख्यमंत्री ने अयोध्या में पुराने विवादों और तुष्टिकरण की राजनीति को लेकर सपा और कांग्रेस पर तीखे हमले किए हैं। वे विपक्षी दलों को जनता के सामने बेनकाब करने का कोई मौका नहीं छोड़ रहे। दरअसल 2024 के आम चुनाव में यूपी के नतीजों ने बीजेपी को सतर्क कर दिया है। इसे देखते हुए पार्टी 2027 में कोई कसर नहीं छोड़ना चाहती और अभी से जमीनी पकड़ मजबूत कर रही है। योगी लगातार जनसभाएं, ‘जनता दर्शन’ और करोड़ों रुपये की विकास योजनाओं का उद्घाटन करके जनता के बीच सीधे पहुंच बना रहे हैं। हाल ही में उन्होंने ‘पौधरोपण महायज्ञ-2026’ जैसे बड़े अभियानों का भी शुभारंभ किया है। कुल मिलाकर, वे चुनावी हार के जोखिमों को टालने और पार्टी संगठन को पूरी तरह एक्टिव रखने के लिए अभी से चुनावी मोड में पूरी ताकत झोंक रहे हैं।

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पार्टी राज्य में लगातार तीसरी बार सत्ता में वापसी के लिए कोई कोर-कसर नहीं छोड़ना चाहती। समाजवादी पार्टी और कांग्रेस लगातार राज्य के मुद्दों, कानून-व्यवस्था और जातिगत राजनीति को लेकर सरकार पर सवाल उठा रहे हैं। इसका करारा जवाब देने के लिए योगी ने राजनीतिक रैलियों और बयानों का रुख अपना लिया है। आगामी स्थानीय और बड़े चुनावों के मद्देनजर भाजपा का फोकस हिदुत्व, सुरक्षा और विकास के ‘योगी मॉडल’ को जनता के बीच रखने पर है। अयोध्या के हनुमानगढ़ी विवाद और वक्फ बोर्ड जैसे मुद्दों पर योगी के आक्रामक रुख इसी चुनावी रणनीति का हिस्सा हैं। भाजपा अध्यक्ष नितिन नवीन ने हाल ही में पार्टी के प्रदेश पदाधिकारियों को निर्देश देकर बूथ-स्तर और सांगठनिक स्तर पर सक्रिय होने के निर्देश दिए हैं, ताकि पिछले कुछ चुनावों में आए उतार-चढ़ाव से सीख लेकर स्थिति मजबूत की जा सके ।

उधर सपा सुप्रीमो अखिलेश यादव भी इन समीकरणों से अनजान नहीं हैं वह भी सीधे हमलावर हैं। इन दिनों उन्होंने योगी के हार्ड हिंदुत्व के जवाब में साफ्ट हिंदुत्व को हथियार बनाया है। उन्हें लगता है कि इसके सहारे वह यूपी की 2027 के विधानसभा चुनाव की वैतरिणी पार कर लेंगे। हालांकि पश्चिम बंगाल के चुनाव से मिली विपक्ष की करारी हार के बावजूद सपा सुप्रीमो अभी सीख लेते नजर नहीं आ रहे है। वहां भी चुनावों के दौरान ममता बनर्जी साफ्ट हिंदुत्व के सहारे उतरी थीं। अखिलेश के सामने दो तरफा चुनौती है एक तरफ दो बार के मुख्यमंत्री और तीसरी बार बनने को आतुर दिख रहे मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जैसा बड़ा कद्दावर नेता उनके सामने हैं दूसरी तरफ अपने ही सहयोगी कांग्रेेस के साथ उनकी कदमताल सही नहीं बैठ रही है। दूसरी तरफ यूपी में इस बात की भी चर्चा हो रही है कि राम मंदिर चंदा चोरी का मुद्दा विधानसभा चुनाव में क्या असर दिखायेगा । हालांकि उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में अभी समय है। इतने लंबे समय तक किसी मुद्दे को जिदा रखना मुश्किल होता है। विपक्ष जरूर कोशिश कर रहा है और उसे करना भी चाहिए। इसलिए अभी इस पर ये बताना कि चुनाव में ये मुद्दा रहेगा या नहीं मुश्किल है। अभी की स्थिति में ये कहना तो मुश्किल है कि इससे किसे फायदा होगा। ये जरूर लग रहा है कि इसका थोड़ा बहुत नुकसान भाजपा को हो सकता है, लेकिन समाजवादी पार्टी को भाजपा का नुकसान होने से फायदा हो जाए इसकी संभावना मुझे कम लगती है।

कार्ल मार्क्स ने कहा था कि शासक वर्ग धर्म को धर्म की तरह इस्तेमाल नहीं करता है, वो धर्म को आध्यात्मिक हथियार की तरह इस्तेमाल करता है। जहां तक बात है कि वोट बढ़ेंगे-घटेंगे, ये बताना बहुत मुश्किल है। भाजपा के पास जो राम नाम का हथियार था वो कहीं न कहीं थोड़ा कुंद पड़ गया है। हिदुस्तान की जनता बहुत जल्दी जागती है और बहुत जल्दी सो जाती है। अगर कोई ये कह दे कि चंपत राय निर्दोष हैं तो ये नहीं माना जा सकता है। बहुत सी चीजें को समय बताता है वो कैसे आएंगी, लेकिन एक चीज स्पष्ट है कि इस मामले में न तो भाजपा हारी है और न ही सपा जीती है। इसके बाद भी ये नहीं कहा जा सकता है कि कुछ हुआ ही नहीं है। चंपत राय अपनी मर्जी से चंपत हुए हैं।

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भारतीय लोगों में भ्रष्टाचार कभी मुद्दा नहीं बनता है। उसे कुछ दिनों बाद लोग भूल जाते हैं। राम मंदिर के मुद्दे से ही भाजपा की राजनीति परवान चढ़ी है। उसी राम मंदिर में ये मामला आ गया है। इसलिए ये राजनीतिक मुद्दा तो बन गया है। सवाल ये है कि क्या विपक्ष उसे सस्टेन कर पाएगा। इस मुद्दे की सुई अयोध्या में अटकी है। जो लोग इससे जुड़े रहे हैं वो इसे ठंडा नहीं होने देंगे। भाजपा के सामने चुनौती ये है कि ये उसकी अपनी पिच है, भाजपा इसका डैमेज कंट्रोल कैसे करती है ये मुद्दा उसी पर निर्भर करेगा। लेकिन फिलहाल दोनों तरफ आग बराबर लगी है पर इस साफ्ट या हार्ड हिंदुत्व में जीत किसकी होगी, और राम मंदिर का मुद्दा कितन प्रभावी होगा, इसके लिये हमें समय का इंतजार करना होगा। अंत में राहत इंदौरी की शायरी की ये लाइनें कि – नए किरदार आते जा रहे हैं, मगर नाटक वही पुराना चल रहा है।

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