मैं श्मशान की ठंडी राख, कुछ बोल रही हूं

Aliganj Fire Incident 

   अरविंद कांत त्रिपाठी

Aliganj Fire Incident  :  मैं श्मशान से 15 किशोरों के चिता की ठंडी हुई “राख” बोल रही हूं – अभी तो वह नवनिहाल राष्ट्र की संरचना में सहयोग करने का ताना बाना बुन रहे थे लेकिन भ्रष्ट तंत्र और उसके सहायक उपकरणों (निजी संस्थानों) के घर्षण से लगी आग ने उन्हें भस्म कर दिया। मैं मौत से लड़कर हमेशा के लिए शांत हो जाने वाले युवाओं के चीत्कार की साक्षी हूं। मौत के ऊपर छलांग मारकर बचने की कोशिश में सड़क पर लहूलुहान नौजवानों के कराह की गवाह हूं। मैने भ्रष्टाचार की आग से बचने के लिए रस्सी के सहारे नीचे सरकते बदहवास बच्चों को देखा है। यह भयावह मंजर 22 जून को लखनऊ के अलीगंज स्थित एक कोचिंग सेंटर में भावी-भारत की 15 तरुण (युवा) आशाओं का हृदयहीन, अपंग और अपाहिज तंत्र की चौखट पर खाक हो जाने का है। हां, मैं श्मशान में सिमटी राख बोल रही हूं – मुझे याद है ;

अभी कुछ दशक पहले तक वह दौर था जब किसी निर्दोष के कत्ल हो जाने पर सारे इलाके का चूल्हा गहरे सदमें में पहुंचकर “एक पहर” के लिए ठंडा हो जाता था। क्योंकि कत्ल हुआ इंसान भले अपरिचि हो लेकिन समाज का, उससे इंसानियत का गहरा नाता रखता था। अब वह नाता बेगाना होता जा रहा है। तब चोर, उचक्कों की अलग पहचान थी। समाज के लिए वह नीच थे लेकिन उनमें भी लोकलाज थी। समाज द्वारा धिक्कारे जाने का भय था उनमें। लिहाजा चोर होकर भी उनके अपने सिद्धांत थे। मर्यादा थी। वह अपने गांव या उसके आसपास सेंधमारी नहीं करते थे। “डायन भी दस घर छोड़कर शिकार करती है” – समाज में प्रचलित यह कहावत उन्हें खुद से, खुद में नियंत्रित और संयमित करती थी। तब भी समाज में पुण्य था, पाप था। लेकिन “लोकलाज” का भय बहुत प्रभावी था। मैं श्मशान की मिट्टी हूं ! सज्जन, दुर्जन सब आते हैं मेरे यहां। लेकिन अब मेरे लिए भी “चोर और शाह” में भेद कर पाना आसान नहीं। फॉरेंसिक लैब करते हैं यह कार्य। तब चोर, डाकू समाज में नीच माने जाते थे। अब लगभग 250 संसद के माननीय हैं। तब अपराधी लोकलाज से डरते थे। अब जेल से बाहर आने पर गले में फूलों की दर्जनों माला, समर्थकों का जयकारा और गाड़ी के बोनट पर खड़े होकर “विक्ट्री” साइन का चटखारा है। मैं पंचभूत का भैरव मिश्रण हूं। चिताओं की पवित्र राख हूं।

सदियों का अनुभव है मेरा – यह दौर शापित (शापग्रस्त) है। भौतिक विकास के इस “बेगाने दौर” में इंसानियत, व्यर्थ है। पद से पैसा कमाना ही पुरुषार्थ है। तब “चोर” दस गांव छोड़कर चोरी करते थे। अब कहीं जाने की जरूरत नहीं, अपना विभाग ही अकूत है। अथाह है। तब बात लोकलाज की थी। अब समय ढीठ और बेशर्म आवाज का है। तब दुर्जन भी अपनी अंतरात्मा से नियंत्रित होते थे। अब आत्मा ही मर चुकी है। मैं श्मशान में प्रतिपल धधकती आग वाली राख हूं। जीवन का अंतिम सत्य हूं। जो कहूंगी सत्य कहूंगी। वर्तमान दौर में समाज के अधिकांश नेतृत्वकर्ता, “वातानुकूलित-प्रोटोकॉल” वाले हृदयहीन बहुरूपिए हैं। वातानुकूलन संस्कृति का यह शासन तंत्र हाथ, पैर, नाक, कान होते हुए भी अपाहिज दिखाता है। हाथ, तो है लेकिन अर्दली गेट खोलता है तब साहब गाड़ी में बैठ पाता है। कार्यालय का कोचवान गेट खोलता है तो साहब गाड़ी से बाहर निकल पाता है। आंख रहते हुए भी टीवी के जरिए ही समाज की दशा देख पाता है। कान है, लेकिन दुखियारों का दर्द नहीं सुन पाता है। हृदय रहते हुए भी मानवीय स्पंदन (धड़कन) महसूस कर पाने में असमर्थ रहता है। जी हां, मैं “करायल” (राल) की सघन गंध लिए हवाओं में घुलती राख हूं। श्मशान से बोल रही हूं। “मैं भस्म हो रही जमाने की संवेदनाओं और संस्कारों की भी राख हूं।……. मैं महसूस कर रही हूं – “हम अपने आप में अधूरे हैं, समाज हमारा पूर्ण स्वरूप है” – हमारे नेताओं और अधिकारियों की यह बड़ी सोच तेजी से बौनी होती जा रही है।…. “समाज में जो दुःख है, दर्द है, हंसी और खुशी है, हम उसी का प्रतिबिम्ब हैं” – हमारे पथ-प्रदर्शकों की यह सुकोमल भावना भौतिकता की अंधी दौड़ में पीछे, बहुत पीछे छुटती जा रही है।

22 जून की तपती दोपहरी में मैने लखनऊ के अलीगंज में मौत का कोहराम देखा है। हो-हल्ला सुना है। मौतों पर मुआवजे का लेप देखा है। सिंहासन की भौहें टेढ़ी हुई तो लखनऊ विकास प्राधिकरण ( LDA ) के मखमली फर्श और वातानुकूलित कक्ष वाले बड़े हाकिम के शरीर में कुछ हलचल हुई। आनन-फानन में उन्होंने अवैध चल रहे 100 कोचिंग सेंटर को सील करवा दिया? फील्ड में घूमकर चढ़ावा लेने वाले इंजीनियर और कुछ बाबू स्तर के कर्मचारियों को सस्पेंड कर दिया।…. मैं भी सब देख रही हूं। सुनो, कर्तव्यपरायणता के इस ढोंग में सवाल भी हैं ; (पहला) – अवैध कोचिंग सेंटर तो सील हो गए। क्या माना जाए कि अब तंत्र का भ्रष्ट्राचार भी सील हो जाएगा? (दूसरा) माना कि लखनऊ में कुल 100 अवैध कोचिंग सेंटर ही थे। लेकिन अगर एक भी था तो क्यों था? (तीसरा) राजधानी के बीचों बीच, योगी “आसान” के नीचे, सरे राह सालों से चल रहे इन अवैध धंधों को रोकने वाले हाथ अपंग क्यों थे? (चौथा) प्रदेश के अन्य जिलों की हालत क्या होगी? और (पांचवां) ऐसे अवैध कारोबार को रोकने के लिए शासन-प्रशासन में लगी हजारों लोगों (चपरासी से लेकर बड़े बड़े  IAS, PCS  अधिकारियों) की फौज क्यों है? किस काम के लिए उन्हें हर माह अरबों का वेतन और अन्य सुख सुविधा के लिए फंड दिया जाता है?

ध्यान रहे, आम लोग, विशिष्ट लोगों के सुख-सुविधा वाले जीवन जैसी अभिलाषा रखते हैं। कनिष्ठ (छोटे), अपने वरिष्ठों (बड़ों) का अनुकरण करते हैं। यह इंसानी फ़ितरत है। नैसर्गिक चलन है। इसी चलन से जमाना अपने भ्रष्ट तंत्र की चकाचौंध जिंदगी को देखकर उसे पाने के लिए भ्रष्ट होता जा रहा है। मंत्री, संतरी या उच्च अधिकारी बनने पर ही ऐश्वर्य प्रधान जीवन संभव है। लेकिन ऐसा बनना सबके वश में नहीं। उधर ऐश्वर्य प्रधान जीवन धन (पैसे) से भी संभव है। पैसा कमाने की आजादी सबको है। जिसमें 15 किलकते किशोरों को लाश बना देने की भी आजादी है। दिल्ली के मालवीय नगर के होटल में लगी आग में तड़पकर मरे 26 तीमारदारों की बात हो या मुजफ्फरपुर (बिहार) के एक अस्पताल में लगी भीषण आग में तीन मरीजों की मौत, यह सब घटनाएं तंत्र के रग-रग घुल चुके भ्रष्टाचार की बानगी भर है।

मैं श्मशान की चेतन राख हूं। जलती चिताओं से झरती मानवीय संवेदनाओं का सार हूं मैं। अकाल मारे गए निर्दोषों की मौत पर मैं भी फफक उठती हूं। सुनो मेरी – जानलेवा इन लपटों का कारण केवल और केवल तंत्र के तांत्रिकों की अनियंत्रित हवश है। इस हवसियों पर निर्णायक प्रहार ही एकमात्र विकल्प है। अलीगंज कांड में लापरवाही बरतने के कारण चार अफसरों को सस्पेंड और चार लोगों को गिरफ्तार भी किया गया है। किंतु जड़ पर प्रहार किए बिना सब पाखंड है। इस सस्पेंशन और गिरफ्तारी की “धारिता” और निर्दोषों की मौत से मिले अपार “दुःख” में संतुलन नहीं है। दोषियों को मिलने वाला दंड, मौत के मातम बराबर होना चाहिए। लापरवाही बरतने के कारण कुछ को सस्पेंड और कुछ को गिरफ्तार तो किया गया है लेकिन इन लोगों की लापरवाही पर निगाह न रखने वाले लापरवाह आलाधिकारियों की गिरफ्तारी कब होगी? भ्रष्ट तंत्र के सफेदपोश घरों पर बुलडोजर कब चलेगा? कार्रवाई, नजीर पेश करने लायक होनी चाहिए जिससे भ्रष्ट हुक्मरानों की आत्मा दहल सके।


नया लुक के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें  

खबरों में अपडेट रहना हमारी आदत है और सबसे आगे रहना मेरा जुनून। अब नया लु

क ऐप भी ले आया है। आप सभी से अनुरोध है कि आप इसे अपना प्यार, दुलार और आशीर्वाद दें। आप सभी से निवेदन है कि मेरा न्यूज ऐप अपने अपने फोन में इंस्टॉल कर लीजिए। मैं आप सभी का आभारी रहूंगा…. https://play.google.com/store/apps/details?id=com.app.nayalooknews

ये भी पढ़े

रामायण के लक्ष्मण सुनील लहरी का फूटा गुस्सा, कहा- रक्षक ही बन गए भक्षक

चांदी की कीमत में लगातार गिरावट, जानिए आपके शहर में क्या है ताजा रेट

Spread the love

 Ayodhya
Uttar Pradesh

चढ़ावा चोरी जांच तेज: चंपत राय का बयान दर्ज, गवाहों और दस्तावेजों से होगा मिलान

 Ayodhya : राम मंदिर चढ़ावा चोरी मामले की जांच में पुलिस ने ट्रस्ट के पूर्व महासचिव चंपत राय से करीब तीन घंटे तक पूछताछ कर उनका बयान दर्ज किया। जांच से जुड़े सूत्रों के अनुसार, पूछताछ के दौरान प्रशासनिक फैसलों, चढ़ावे की व्यवस्था, कर्मचारियों की नियुक्ति, निगरानी व्यवस्था और शिकायतों के निस्तारण से जुड़े कई […]

Spread the love
Read More
MNRE
homeslider Uttar Pradesh

पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना को जन-जन तक पहुंचाएगा नुक्कड़ नाटक ‘बधाई हो बधाई’, 200 जिलों में होगा मंचन

MNRE  स्वच्छ एवं सतत ऊर्जा को बढ़ावा देने तथा नागरिकों को नवीकरणीय ऊर्जा के लाभों से अवगत कराने के उद्देश्य से देशभर में ‘बधाई हो बधाई’ नामक एक विशेष नुक्कड़ नाटक अभियान शुरू किया गया है। यह अभियान पीएम सूर्य घर: मुफ्त बिजली योजना के बारे में जन-जागरूकता बढ़ाने के लिए आयोजित किया जा रहा […]

Spread the love
Read More
Lakshman Sunil Lahri
homeslider Uttar Pradesh

रामायण के लक्ष्मण सुनील लहरी का फूटा गुस्सा, कहा- रक्षक ही बन गए भक्षक

Lakshman Sunil Lahri अयोध्या स्थित श्रीराम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी के मामले ने अब बड़ा तूल पकड़ लिया है। इस घटना पर रामानंद सागर की ‘रामायण’ में लक्ष्मण का किरदार निभा चुके अभिनेता सुनील लहरी ने कड़ा गुस्सा जताया है। उन्होंने दोषियों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई की मांग की है। ‘रक्षक […]

Spread the love
Read More