दिल्ली दरबार पर भारी पड़ा जमीनी नेता, केरल में सतीशन क्यों बने कांग्रेस का चेहरा

केरल
अजय कुमार                             
अजय कुमार

केरल की राजनीति में इस बार सिर्फ सरकार नहीं बदली, कांग्रेस की अंदरूनी ताकत का नक्शा भी बदल गया। दस वर्षों बाद सत्ता में लौटी यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट सरकार ने जब वीडी सतीशन को मुख्यमंत्री चुना तो यह फैसला केवल एक व्यक्ति को कुर्सी सौंपने का नहीं था, बल्कि कांग्रेस के भविष्य की राजनीतिक दिशा तय करने वाला कदम बन गया। चुनाव नतीजे आने के बाद लगभग दस दिनों तक दिल्ली से तिरुवनंतपुरम तक जिस तरह की खींचतान चली, उसने साफ कर दिया था कि यह लड़ाई सिर्फ मुख्यमंत्री पद की नहीं, बल्कि कांग्रेस में ‘दिल्ली मॉडल बनाम जमीनी मॉडल’ की थी। आखिरकार पार्टी ने संगठन महासचिव और राहुल गांधी के सबसे करीबी नेताओं में गिने जाने वाले केसी वेणुगोपाल के बजाय उस नेता पर भरोसा जताया, जिसने पांच वर्षों तक विपक्ष में रहकर कांग्रेस को दोबारा खड़ा किया। 2026 के विधानसभा चुनाव में 140 सदस्यीय विधानसभा में यूडीएफ ने 102 सीटें जीतकर इतिहास रच दिया। कांग्रेस ने अकेले 63 सीटें हासिल कीं, जबकि उसकी सहयोगी इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग ने 22 सीटें जीतीं। LDF गठबंधन 35 सीटों पर सिमट गया। 2021 में कांग्रेस नीत UDF को सिर्फ 41 सीटें मिली थीं और LDF 99 सीटों के साथ सत्ता में लौटा था। यानी पांच वर्षों में कांग्रेस ने 22 सीटों की सीधी बढ़त दर्ज की, जबकि वाम मोर्चा 64 सीटें खो बैठा। यही आंकड़े बताते हैं कि यह जीत किसी सामान्य सत्ता विरोधी लहर का परिणाम नहीं थी, बल्कि विपक्ष के नेता के रूप में वीडी सतीशन की बनाई राजनीतिक रणनीति का असर थी।

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दरअसल, 2021 की हार कांग्रेस के लिए केवल चुनावी पराजय नहीं थी, बल्कि संगठनात्मक संकट भी थी। पार्टी के भीतर वर्षों से चल रही ‘ए ग्रुप’ और ‘आई ग्रुप’ की राजनीति ने कार्यकर्ताओं को थका दिया था। ओमन चांडी और के. करुणाकरण के दौर से चली आ रही गुटबाजी ने कांग्रेस को जनता से दूर कर दिया था। ऐसे समय में राहुल गांधी ने रमेश चेन्निथला की जगह वीडी सतीशन को विपक्ष का नेता बनाया। उस समय यह फैसला जोखिम भरा माना गया, क्योंकि सतीशन के पास न दिल्ली की लॉबी थी और न ही संगठन पर वैसी पकड़, जैसी केसी वेणुगोपाल के पास मानी जाती थी।

लेकिन पांच साल बाद वही फैसला कांग्रेस के पुनर्जीवन की सबसे बड़ी वजह बन गया। सतीशन ने विपक्ष का नेता बनने के बाद सबसे पहले कांग्रेस की चुनावी राजनीति की शैली बदली। उन्होंने साफ कहा कि टिकट वितरण में गुटीय वफादारी नहीं, बल्कि जीतने की क्षमता देखी जाएगी। इसका असर स्थानीय निकाय चुनावों में दिखाई दिया। दिसंबर 2025 में हुए स्थानीय निकाय चुनावों में यूडीएफ ने 941 पंचायतों में से 505 पर जीत हासिल की। 87 नगरपालिकाओं में से 54 यूडीएफ के खाते में गईं। 14 जिला पंचायतों में से 7 पर कब्जा हुआ, जबकि 6 में से 4 नगर निगमों में कांग्रेस गठबंधन को सफलता मिली। इन नतीजों ने पहली बार यह संकेत दिया कि एलडीएफ की पकड़ कमजोर हो रही है और कांग्रेस सत्ता में वापसी कर सकती है।

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सतीशन की सबसे बड़ी राजनीतिक ताकत उनकी ‘डेटा आधारित राजनीति’ रही। विधानसभा में उन्होंने सिर्फ राजनीतिक आरोप नहीं लगाए, बल्कि सरकारी आंकड़ों के जरिए पिनाराई विजयन सरकार को घेरा। केरल में बेरोजगारी दर, राज्य का बढ़ता कर्ज, सरकारी संस्थानों में भ्रष्टाचार और युवाओं के पलायन जैसे मुद्दों को उन्होंने लगातार उठाया। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के अनुसार, 2025 में केरल की शहरी बेरोजगारी दर 18 प्रतिशत के करीब पहुंच गई थी, जबकि युवाओं में यह आंकड़ा 30 प्रतिशत से अधिक था। पिछले पांच वर्षों में लगभग 18 लाख युवा रोजगार और शिक्षा के लिए राज्य से बाहर गए। सतीशन ने इन आंकड़ों को लगातार राजनीतिक मुद्दा बनाया और कांग्रेस को ‘भविष्य की अर्थव्यवस्था’ की भाषा बोलने वाली पार्टी के रूप में पेश किया। केरल की सामाजिक संरचना को समझे बिना इस फैसले को समझना मुश्किल है। राज्य की राजनीति में नायर, ईसाई और मुस्लिम समुदाय निर्णायक भूमिका निभाते हैं। वीडी सतीशन और केसी वेणुगोपाल दोनों नायर समुदाय से आते हैं, जिसकी आबादी राज्य में लगभग 14 से 15 प्रतिशत मानी जाती है। लेकिन फर्क यह रहा कि सतीशन लगातार नायर बहुल परवूर सीट से पांच बार चुनाव जीत चुके हैं। 2001, 2006, 2011, 2016 और 2021 में उन्होंने लगातार जीत दर्ज की। इससे उनकी जमीनी पकड़ मजबूत मानी जाती है। दूसरी ओर, वेणुगोपाल लंबे समय से राष्ट्रीय राजनीति में सक्रिय रहे और राज्य की सक्रिय राजनीति से उनकी दूरी बढ़ती गई।

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कांग्रेस के लिए सबसे अहम बात यह थी कि सतीशन को अल्पसंख्यक समुदायों का भी व्यापक समर्थन हासिल था। केरल की लगभग 26 प्रतिशत आबादी मुस्लिम और करीब 18 प्रतिशत ईसाई है। यूडीएफ की सबसे बड़ी सहयोगी आईयूएमएल शुरू से सतीशन के पक्ष में थी। मुस्लिम लीग को यह आशंका थी कि अगर दिल्ली से कोई नेता मुख्यमंत्री बनकर आता है तो गठबंधन के भीतर संतुलन बिगड़ सकता है। चर्च समूहों के बीच भी सतीशन की छवि एक ऐसे नेता की रही, जो वैचारिक रूप से उदार हैं लेकिन धार्मिक तुष्टिकरण की खुली राजनीति नहीं करते। यही वजह रही कि कांग्रेस नेतृत्व ने उन्हें ‘सर्वस्वीकार्य चेहरा’ माना। केसी वेणुगोपाल की दावेदारी के सामने सबसे बड़ा संकट उनकी राजनीतिक स्थिति थी। वे लोकसभा सांसद हैं और पार्टी महासचिव भी। अगर उन्हें मुख्यमंत्री बनाया जाता तो पहले संसद सदस्यता छोड़नी पड़ती। इसके बाद किसी विधायक की सीट खाली कराकर उन्हें छह महीने के भीतर विधानसभा पहुंचाना पड़ता। यानी एक लोकसभा और एक विधानसभा उपचुनाव का अतिरिक्त जोखिम पैदा होता। कांग्रेस पहले ही जानती थी कि सत्ता में आने के बाद शुरुआती महीनों में किसी भी तरह की राजनीतिक अस्थिरता का संदेश नुकसानदेह साबित हो सकता है। यही कारण है कि अंतिम समय में हाईकमान ने ‘कम जोखिम वाले विकल्प’ पर भरोसा जताया।

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इस फैसले का राष्ट्रीय राजनीतिक संदेश भी बड़ा है। कांग्रेस लंबे समय से इस आलोचना का सामना करती रही है कि पार्टी में फैसले सिर्फ दिल्ली दरबार के आधार पर होते हैं। लेकिन केरल में पार्टी ने पहली बार साफ संकेत दिया कि अब चुनाव जिताने वाले क्षेत्रीय नेताओं को प्राथमिकता दी जाएगी। सतीशन की ताजपोशी कांग्रेस के भीतर पीढ़ीगत बदलाव का भी प्रतीक मानी जा रही है। मुख्यमंत्री पद की दौड़ में शामिल प्रमुख चेहरों  केसी वेणुगोपाल, रमेश चेन्निथला और वीडी सतीशन  में सतीशन को अपेक्षाकृत युवा और नई पीढ़ी के नेता के तौर पर देखा गया। उनका पूरा राजनीतिक अभियान ‘नई कांग्रेस’ की अवधारणा पर आधारित था। भाजपा के बढ़ते प्रभाव को रोकना भी इस फैसले के पीछे एक बड़ा कारण रहा। पिछले कुछ वर्षों में भाजपा ने केरल में हिंदू वोटों, खासकर नायर समुदाय के बीच अपनी पैठ बढ़ाने की कोशिश की। 2024 के लोकसभा चुनाव में भाजपा का वोट प्रतिशत 16 प्रतिशत के करीब पहुंच गया था। कांग्रेस समझती थी कि उसे ऐसा चेहरा चाहिए, जो हिंदू समाज में स्वीकार्य हो लेकिन अल्पसंख्यकों के बीच भी भरोसेमंद बना रहे। सतीशन इस राजनीतिक संतुलन में फिट बैठते हैं। उनकी छवि आक्रामक सांप्रदायिक राजनीति से दूर लेकिन सांस्कृतिक रूप से जुड़ी हुई मानी जाती है। अब सबसे बड़ी चुनौती वादों को जमीन पर उतारने की होगी। केरल इस समय लगभग 4 लाख करोड़ रुपये के कर्ज के बोझ से जूझ रहा है। राज्य में निजी निवेश की रफ्तार धीमी है और युवाओं का पलायन लगातार बढ़ रहा है। सतीशन ने चुनाव के दौरान ‘ग्लोबल जॉब नेटवर्क’, शिक्षा सुधार और स्टार्टअप अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का वादा किया था। अगर वे इन मोर्चों पर ठोस परिणाम देते हैं तो कांग्रेस सिर्फ केरल में ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी एक नया राजनीतिक मॉडल पेश कर सकती है। वीडी सतीशन की जीत ने यह साफ कर दिया है कि कांग्रेस अब केवल हाईकमान आधारित राजनीति के भरोसे नहीं चलना चाहती। केरल में पार्टी ने पहली बार यह स्वीकार किया है कि जनता और कार्यकर्ताओं के बीच स्वीकार्यता रखने वाला नेता ही सबसे बड़ा राजनीतिक निवेश होता है। यही कारण है कि इस बार दिल्ली की ताकत पर जमीन की हकीकत भारी पड़ गई।

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