दो टूकः प्रधानमंत्री जी! कम से कम मातृ शक्ति को तो सियासत का केंद्र न बनाइए

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दो टूकः प्रधानमंत्री जी! कम से कम मातृ शक्ति

  • पार्टियों को कोसने से नहीं दिल बड़ाकर सीट देने और काबीना में शामिल करने से बनेगी बात
  • कानून बनाने वाले ही कानून तोड़ने लगे तो ‘नारी शक्ति’ केवल एक चुनावी जुमला ही दिखती है…

राजेश श्रीवास्तव

प  कल जब सदन में महिला आरक्षण संशोधन बिल पास नहीं हो सका तभी से यह उम्मीद लग रही थी कि भारतीय जनता पार्टी (BJP) जिस मकसद से इसे लाई थी उसका खुलासा और शुभारंभ कब होगा। उम्मीद के मुताबिक प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पहले की तरह रात्रि साढ़े आठ बजे अचानक प्रकट हुए। लेकिन इस बार देश की जनता की धड़कने धक-धक नहीं कर रहीं थीं क्योंकि सभी को अंदाजा था कि PM मोदी टीवी पर आयेंगे और विपक्षी दलों को कोसेंगे और उन्हें महिलाओं की दुर्दशा के लिए जिम्मेदार ठहरायेंगे। अब यहीं से BJP की महिला आरक्षण बिल पर सियासत शुरू हो गई। अरे प्रधानमंत्री जी आप ने तब देश की जनता से बात करना उचित नहीं समझा जब आपकी जनता दुनिया के बीच मचे युद्ध को लेकर सशंकित थी, तब भी नहीं समझा जब जनता गैस की लाइनों में लगी थी। आपने तब भी उचित नहीं समझा जब पाकिस्तान ने युद्ध में समझौता कर लिया और आपने तो उस पर भी बात नहीं की कि कैसे ईरान में होर्मुज पार कर रहे दो भारतीय टैंकरों पर गोलीबारी हुई। आपका राष्ट्र प्रेम तब भी नहीं जागा। और जागा तो इस बात के लिए कि महिलाओं को साल 2011 की जनगणना के मुताबिक आरक्षण नहीं दे सके। आपने वही सब बोला जो आप और आपके नेता सदन में दो दिन बोल चुके हैं।

प्रधानमंत्री जी, आपको बिल लाने की क्या जरूरत है महिलाओं के आरक्षण के लिए आप सबसे बड़ी पार्टी के नेता हैं बढ़-चढ़कर दीजिए महिलाओं को टिकट, महिलाओं को हिस्सेदारी, कैबिनेट समितियों में योगदान, सीबीआई में बढ़ाइए संख्या। इसके लिए बिल की क्या जरूरत? प्रधानमंत्री जी आपके कार्यकाल में पहली बार कोई बिल गिरा है इसलिए आप भावुक हो गए। लेकिन जब मणिपुर में महिलाओं की इज्जत तार-तार हो रही थी तब आपका महिला प्रेम नहीं जागा, जब महिलाओं को निर्वस्त्र घुमाया जा रहा था। आपने कहा कि कहा, ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम में संशोधन नहीं हो पाया। मैं इसके लिए सभी माताओं-बहनों का क्षमा प्रार्थी हूं। हमारे लिए देश हित सर्वोपरि है, लेकिन कुछ लोगों के लिए जब दल हित देश हित से बड़ा हो जाता है तो नारी शक्ति और देश को इसका खामियाजा उठाना पड़ता है।’ आपने चार दलों- कांग्रेस, DMK, तृणमूल कांग्रेस(TMC) और समाजवादी पार्टी (सपा) पर विशेषकर निशाना साधा। इसी के साथ द्रमुक को आड़े हाथ लेते हुए तृणमूल कांग्रेस पर निशाना साधते हुए पश्चिम बंगाल का जिक्र किया। क्योंकि आपको पता है कि तमिलनाडु में 23 अप्रैल को और बंगाल में 23 और 29 अप्रैल को मतदान होना है।

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प्रधानमंत्री जी कब तक सियासत होगी, जनता सब जानती है। आपका हर कदम राजनीतिक होता है। माना आप राजनीतिज्ञ हैं तो आपका हर कदम भी सियासत का होगा। लेकिन आप प्रधानमंत्री हैं जनता के प्रति भी आपकी संवेदना होनी चाहिए। जब देश में बड़े मुद्दे आते हैं तब आप खामोश हो जाते हैं और जब सियासत की बारी आती है तो आप मुखर। आपने यह संदेश देने की कोशिश बखूबी की है कि भाजपा तो महिलाओं को जल्द आरक्षण देना चाहती थी, लेकिन विपक्ष की वजह से ऐसा नहीं हो सका। आपको अगर वाकई में सशक्त करना है तो जो मौजूदा 543 सीटें है उसमें से 33 फीसदी सीटें महिलाओं को दे दीजिए। शायद ये तीन दिन का सत्र केवल नैरेटिव बिल्डिंग के लिए ही था। सच में ये बहुत ही दुखद है।

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बिल साल 2023 में पास हो चुका था। दोनों सदनों ने इसकी मंजूरी दे दी थी। अगर सरकार वाकई में चाहती थी 2०24 में इस पर काम शुरू कर देती। ये बिल बैक डोर से परिसीमन को लागू करने के लिए लाया गया था।

डिलिमिटेशन पर अगर आप बिल पास करना चाहते तो पहले आप विपक्ष से चर्चा करते। आपने ऐसा कुछ नहीं किया। मुझे नहीं लगता कि विपक्ष पर महिला विरोधी होने का तमगा चिपकाना सही है, अब जनता जाग गयी है और वह आपके सियासी तीर समझती है।

इतिहास गवाह है कि कांग्रेस ने ‘नारी शक्ति’ की जो लकीर खींची है, उसे BJP आज तक नहीं छू पाई है। इंदिरा गांधी वह नेतृत्व थीं, जिन्होंने 1971 में बिना किसी इवेंट मैनेजमेंट के पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए।

आज जब मोदी सरकार अमेरिकी दबाव (ट्रम्प शासन) के आगे रणनीतिक स्वायत्तता खोती दिखती है, तो इंदिरा की वह ‘शक्ति’ याद आती है जिसने दुनिया के नक्शे को बदल दिया था। जबकि प्रतिभा पाटिल को देश को पहली महिला राष्ट्रपति देने का श्रेय भी कांग्रेस को जाता है। उत्तर प्रदेश में पहली महिला मुख्यमंत्री सुचेता कृपलानी को कांग्रेस ने ही बनाया था।

कांग्रेस की शीला दीक्षित ने 15 साल शासन किया और दिल्ली को विकास की नयी ऊंचाई दी। 1993 में राजीव गांधी द्बारा लाया गया 73वां और 74वां संविधान संशोधन ही वह आधार था जिसने आज 21 राज्यों में महिलाओं को 5०% आरक्षण दिया है। इसीलिए जब राहुल गांधी ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ की खामियों पर उंगली उठाते हैं, तो उनका डर वास्तविक लगता है।

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वह पूछते हैं कि अगर नीयत साफ है, तो आज क्यों नहीं? अगर नीयत साफ है, तो ओबीसी कोटा क्यों नहीं? नारी सुरक्षा की बात करने वाली पार्टियों का चरित्र वर्ष 2024 के चुनाव में खुलकर सामने आया। ADR के आंकड़ों के अनुसार 18वीं लोकसभा में 46प्रतिशत सांसदों पर आपराधिक मामले हैं।

31 परसेंट पर गम्भीर आपराधिक मामले हैं, जिनमें महिलाओं के खिलाफ हिंसा और बलात्कार के आरोपी भी शामिल हैं। BJP में महिला विरोधी अपराधों के आरोपी सांसदों और विधायकों की संख्या (54) सबसे अधिक है। जब कानून बनाने वाले ही कानून तोड़ने वाले हों, तो ‘नारी शक्ति’ केवल एक चुनावी जुमला बनकर रह जाती है। एक तरफ ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ और परिसीमन के नाम पर महिलाओं को 33फीसदी आरक्षण का वादा किया जा रहा है।

दूसरी तरफ, उसी सरकार के हाथों वही महिला नेता अपमानित हो रही हैं, जिन्हें कभी मंच से ‘बेटी-बहन’ कहकर संबोधित किया जाता था।

लेकिन क्या यह सब सिर्फ एक नाटक है? क्या ‘महिला वंदन’ के इस मीठे लिफाफ़े में कोई जहर भी छिपा है? तीन विधेयक एक साथ लाना, विपक्ष को भ्रमित करना, और फिर संविधान के 13०वें संशोधन जैसे अज्ञात हथियार को तैनात करने की तैयारी—यह सब एक बड़ी राजनीतिक सर्जरी की तरह लगता है।

संसद में विपक्षी दलों की गोलबंदी और एक संवेदनशील विधेयक का गिर जाना यह साफ संकेत देता है कि आनेवाले दिनों में सरकार की मुश्किलें बढ़ेंगी। क्या यह वास्तव में नारी का वंदन है, या तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनाव और 29 और 34 के चुनावों के लिए किया गया एक चतुर ‘चुनाव प्रबंधन’? विपक्ष को नारी विरोधी बताने से पहले सच्चाई भी देखना होगा।

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