अनुपयोगी होने के बाद भी रैयतों को ज़मीन नहीं लौटा रहा बोकारो स्टील प्लांट

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  • सैंकड़ों गांवों के ग्रामीण सरकारी योजनाओं से वंचित
  • सरकारी रिकॉर्ड्स से गायब हैं सैकड़ों गांव
  • ग्रामीणों का कब्जा नहीं और उनकी जमीन पर मॉल बना रहा BSP

रंजन कुमार सिंह

बोकारो स्टील प्लांट के लिए करीब 34,000 एकड़ जमीन का अधिग्रहण 1960 के दशक में हुआ था, जिसमें मात्र आधी जमीन पर प्लांट बना, अन्य निर्माण हुए और हजारों एकड़ जमीन आज भी खाली है। भूमि अधिग्रहण कानून 2013 की धारा 24(2) के अनुसार पुराने अधिग्रहण के मामलों में यदि सरकार के पास भौतिक कब्जा (बाउंड्री) नहीं है, या फिर मुआवजा का भुगतान नहीं हुआ है, तो अधिग्रहण प्रक्रिया स्वतः समाप्त मानी जाएगी। जब राज्य सरकार/ कंपनी ने भूमि अधिग्रहण के समय जो वादे किए थे, उन्हें पूरा नहीं किया गया, विस्थापितों को उनके हाल पर छोड़ दिया गया, हजारों विस्थापित परिवारों को मुआवजा नहीं मिला, और हजारों एकड़ जमीन के सैकड़ों गांवों में आज भी लाखों लोग बसे हुए हैं, तो यह अधिग्रहण प्रक्रिया पूरी कैसे हुई? सवाल यह है कि जब आप 60 वर्षों तक भूमि का इस्तेमाल नहीं कर पाए, और उसके कई हिस्सों पर आपका कब्जा भी नहीं है, तो उस जमीन को रैयतों को क्यों नहीं लौटाया जा रहा है? कम से कम वे लोग उस पर खेती-बाड़ी कर के, अपने परिवार का पालन-पोषण तो कर सकेंगे।

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बोकारो में विकास के नाम पर 64 मौजों की भूमि अधिग्रहित हुई थी, लेकिन इनमें से सैकड़ों गांवों में पुनर्वास, मुआवजा और स्वामित्व को लेकर दशकों से विवाद चल रहा है। इस जमीन पर लाखों लोग रहते हैं, जो पंचायत से बाहर होने के कारण सरकारी योजनाओं (पानी, बिजली, सड़क, स्वास्थ्य आदि) से वंचित हैं। इन लोगों का नाम वोटर लिस्ट में तो है, लेकिन एक जन्म व  मृत्यु प्रमाण पत्र तक बनवाना इनके लिए मुश्किल है, क्योंकि इनके गांवों व टोलों को सरकारी रिकॉर्ड्स में गायब कर दिया गया है। उनके अस्तित्व को मिटाने की कोशिश हो रही है, लेकिन दूसरी ओर अवैध तरीके से उनकी पुस्तैनी जमीन पर शॉपिंग मॉल बन रहे हैं। कैसे? किस की अनुमति से?

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झारखंड में औद्योगिक जोन व लैंड को कमर्शियल (मॉल, शॉपिंग सेंटर) में बदलने के लिए लैंड यूज कन्वर्जन (भूमि उपयोग परिवर्तन) की अनुमति लेनी पड़ती है। भूमि राजस्व विभाग और संबंधित शहरी स्थानीय निकाय (नगर निगम आदि) के तहत यह प्रक्रिया होती है। जब बोकारो का यह क्षेत्र किसी नगर निकाय के अंतर्गत नहीं आता, तो यहां मॉल बनाने की अनुमति कौन दे रहा है? कैसे? सन 1973 में बोकारो स्टील प्लांट के प्रशासन ने घोषणा की थी कि 20 मौजा की भूमि अब प्लांट के लिए जरूरी नहीं है, क्योंकि प्लांट के पास पहले से ही अतिरिक्त (surplus) भूमि उपलब्ध थी।

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लेकिन इसके बावजूद मूल रैयतों को उनकी भूमि का कानूनी स्वामित्व वापस नहीं दिया गया। वे लोग अपने मूल गांवों में ही रहते रहे, लेकिन उनकी जमीन पर आधिकारिक रूप से कब्जा प्लांट/ सरकार के नाम बना रहा। जिसके फलस्वरूप वे न तो पूर्ण मुआवजा पा सके, न नौकरी, और न ही जमीन का कानूनी अधिकार। इसके लिए कौन जिम्मेदार है? इन विस्थापितों की कई पीढ़ियां इसमें तबाह हो गईं। उसकी क्षतिपूर्ति कौन करेगा? जिस क्षेत्र से झारखंड आंदोलन शुरू हुआ, जहां से अलग राज्य के लिए संघर्ष का नेतृत्व होता था, वहां के विस्थापितों की इस हालत का जिम्मेदार कौन है? चांडिल, मसानजोर, पंचेत, मैथन, घाटो, कोयलांचल, बोकारो समेत राज्य की अन्य परियोजनाओं में भी यही हाल है।

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