बिना अपॉइंटमेंट मायावती से मिलने पहुंचे थे कांग्रेसी नेता, गेट से हुए वापस
दिया संदेशः सपा के खिलाफ तनकर खड़ा हो सकती है बसपा सुप्रीमो
माया के पूर्व प्रमुख सचिव पीएल पुनिया के सुपुत्र तनुज पुनिया भी गए थे मिलने
“निकलना ख़ल्द से आदम का सुनते आए हैं लेकिन
बहुत बे-आबरू हो कर तिरे कूचे से हम निकले”
BSP Politics : गालिब ने जब यह शेर लिखा था तो उन्होंने केवल उस खास मौके को ध्यान में रखा होगा, जो उनके सामने हुआ होगा। लेकिन यह शेर कांग्रेसी नेताओं पर उस समय सटीक बैठा, जब वो बिना अपाइंटमेंट लिए बसपा सुप्रीमो मायावती से मिलने उनके मॉल एवेंयू स्थित बंगले की ओर लपक पड़े। पूर्व मुख्यमंत्री मायावती ने अपनी सिक्योरिटी का बहाना बनाया और कांग्रेसी नेताओं से बिना मिले उन्हें बैरंग लौटा दिया। इसी चर्चा राजनीति गलियारे में तेजी से चल रही है।
जानकारी के अनुसार कांग्रेस नेताओं की एक टीम कांग्रेस के सर्वेसर्वा और रायबरेली सांसद राहुल गांधी का संदेश लेकर बसपा प्रमुख मायावती से मिलने पहुंची थी। इस प्रतिनिधिमंडल में दलित कांग्रेस अध्यक्ष राजेंद्र गौतम और सांसद तनुज पुनिया भी शामिल थे। सूत्रों के मुताबिक, सुरक्षा कर्मियों ने स्पष्ट कहा कि बिना पूर्व समय लिए किसी भी तरह की मुलाकात संभव नहीं है।
इसके बाद कांग्रेस नेताओं को बिना मुलाकात किए ही लौटना पड़ा। यह घटना राजनीतिक गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है, खासकर ऐसे समय में जब विपक्षी दलों के बीच रणनीतिक संवाद की संभावनाओं पर नजर रखी जा रही है। गौरतलब है कि तनुज पुनिया के पिता पीएल पुनिया मायावती सरकार में उनके प्रमुख सचिव की भूमिका निभा चुके हैं।
बात बसपा की करें तो उत्तर प्रदेश में आगामी 2027 के विधानसभा चुनाव के लिए मायावती साल 2007 वाली ‘सोशल इंजीनियरिंग यानी अपने पुराने फॉर्मूले पर लौटती दिखाई दे रही है। उन्होंने बहुजन समाज पार्टी (BSP) को दोबारा मजबूत करने के लिए ब्राह्मण-मुस्लिम-दलित (BMD) समीकरण को साधने का बड़ा दांव खेला है। जानकारों का कहना है कि समाजवादी पार्टी (सपा) के PDA (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) वोट बैंक की काट के लिए वे अपनी पुरानी रणनीति को पुनर्जीवित कर रही हैं।
इसी को ध्यान में रखते हुए BSP ने ब्राह्मण वोट बैंक को अपनी तरफ खींचने के लिए कई वरिष्ठ नेताओं को प्रभारी बनाया है और लगभग 80 सीटों पर ब्राह्मण उम्मीदवार उतारने की योजना बनाई है। साथ ही मुस्लिमों को जोड़ने के लिए मंडलों में ‘मुस्लिम भाईचारा कमेटियों’ का गठन किया गया है। मायावती ने स्पष्ट कर दिया है कि BSP किसी भी गठबंधन का हिस्सा नहीं बनेगी और वर्ष 2027 का चुनाव अपने दम पर अकेले ही लड़ेगी। पार्टी अपनी पकड़ मजबूत करने के लिए नए और युवा चेहरों को आगे ला रही है, ताकि दलित वोटों के साथ-साथ सर्वसमाज का समर्थन हासिल किया जा सके।
स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद किसी ने नहीं मिलती मायावती
बसपा सुप्रीमो अपने जीवन में काली साया की तरह घटे स्टेट गेस्ट हाउस कांड के बाद किसी से भी मिलना पसंद नहीं करतीं। अगर वह किसी से मिलती भी हैं तो हर तरह की पहले जांच-पड़ताल कराके अपने एक प्रतिनिधिमंडल की उपस्थिति में ही मिलती हैं। बताया जाता है कि सपा समर्थकों ने वर्ष 1995 के गेस्टहाउस कांड में BSP सुप्रीमो मायावती को कमरे में बंद करके उनकी पिटाई की और उनके कपड़े तक फाड़ दिए। किसी तरह मायावती ने अपने को कमरे में बंद कर खुद को बचाया था। यूपी की राजनीति में इस कांड को गेस्टहाउस कांड कहा जाता है।
सूत्रों के मुताबिक साल 1993 में तत्कालीन सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव और बहुजन समाज पार्टी के मुखिया कांशीराम के नेतृत्व में सपा-बसपा के बीच गठबंधन हुआ था। उस समय उत्तराखंड भी यूपी का हिस्सा था और कुल 422 सीटें थीं और इस गठबंधन ने चुनाव जीतकर सरकार बनाई। हालांकि, दो जून 1995 को बसपा ने समर्थन वापस ले लिया, जिससे मुलायम सिंह सरकार अल्पमत में आ गई। इसी राजनीतिक तनाव के बीच लखनऊ के मीराबाई मार्ग स्थित स्टेट गेस्ट हाउस में बड़ी घटना घटी। खबरों के मुताबिक दो जून 1995 को मायावती अपने विधायकों के साथ गेस्ट हाउस के कमरा नंबर-1 में बैठक कर रही थीं। तभी कथित तौर पर सपा से जुड़े कार्यकर्ताओं और समर्थकों की भीड़ वहां पहुंची और हमला कर दिया। स्थिति इतनी गंभीर हो गई कि बसपा विधायकों के साथ मारपीट हुई, कई को जबरन बाहर ले जाया गया और माहौल पूरी तरह अराजक हो गया।
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