- फरारी होने के करीब डेढ़ माह बाद हुई अधीक्षक पर कार्रवाई
- अयोध्या जेल में फरारी के चंद घंटे बाद ही हो गई थी कार्रवाई
राकेश यादव
लखनऊ। अयोध्या जेल में दो बंदियों की फरारी होने के चंद घंटे बाद ही वरिष्ठ अधीक्षक समेत अन्य सुरक्षाकर्मियों के खिलाफ निलंबन की कार्यवाही कर दी गई जबकि इससे पूर्व कन्नौज जेल में हुई दो बंदियों की फरारी के मामले अधीक्षक के निलंबन की कार्यवाही घटना होने के डेढ़ माह बाद की गई है। यह सवाल विभागीय अधिकारियों और कर्मियों में चर्चा का विषय बना हुआ है। इसको लेकर तमाम तरह की अटकलें लगाई जा रही है। चर्चा है कि कन्नौज जेल अधीक्षक पर निलंबन की कार्यवाही अधिकारियों के एक गुट के दबाव में की गई। यही वजह है कि शासन को इस कार्यवाही को करने में करीब डेढ़ माह का समय लग गया। उधर विभाग के आला अफसर इस मामले पर कुछ भी बोलने से बचते नजर आ रहे है।
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उल्लेखनीय है कि बीती पांच जनवरी 2026 को कन्नौज जेल में निरुद्ध विचाराधीन बंदी अंकित और डिंपी उर्फ शिवा सुरक्षाकर्मियों को चकमा देकर फरार हो गए थे। फरारी की घटना के बाद हरकत में आए शासन और कारागार मुख्यालय में घटना के लिए दोषी पाए गए जेलर विनय प्रताप सिंह, डिप्टी जेलर बद्री प्रसाद, हेड वार्डर शिवचरण समेत तीन वार्डर को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। इसके साथ ही अधीक्षक भीमसेन मुकुंद को स्पष्टीकरण देकर कन्नौज जेल से हटाकर जेल मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया। इस घटना के 24 दिन बाद ही अयोध्या जेल से दो बंदियों को फरारी हो गई। इस घटना को हुए अभी चंद घंटे भी नहीं बीते थे कि अयोध्या जेल के वरिष्ठ अधीक्षक यूपी मिश्रा, जेलर विजय विक्रम यादव, डिप्टी जेलर मयंक त्रिपाठी, हेड वार्डर समेत चार कर्मियों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया।
सूत्रों का कहना है कि 24 दिन के अंदर चार बंदियों के फरारी के मामले में अयोध्या जेल में त्वरित कार्यवाही करते हुए अधीक्षक समेत 11 लोगों को निलंबित कर दिया गया किंतु कन्नौज जेल अधीक्षक को निलंबित करने में शासन को करीब डेढ़ माह का समय लग गया। चर्चा है कि शासन ने यह कार्यवाही विभाग के अधिकारियों के एक गुट के दबाव में की गई है। लंबे अंतराल के बाद हुई इस कार्यवाही ने शासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए है। सूत्र बताते है कि अयोध्या जेल अधीक्षक के निलंबन को लेकर विभाग के अधिकारियों का एक गुट प्रमुख सचिव कारागार से मिला और उन्हें दोनों घटनाएं समानांतर होने की बात कहते हुए दोनों अधीक्षकों पर एक तरह की कार्रवाई होने का दबाव बनाया। इन अधिकारियों का तर्क था कि एक का निलंबन और दूसरे को स्पष्टीकरण देकर मुख्यालय से अटैच करना न्यायसंगत नहीं है। अधिकारियों का कहना था घटना एक तरह की होने पर अलग अलग कार्यवाही करना अन्याय है। या तो दोनों को निलंबित किया जाए या फिर दोनों पर सामान कार्रवाई की जाए। इस पर दबाव में आए प्रमुख सचिव कारागार ने आनन फानन में कन्नौज जेल अधीक्षक को निलंबित किए जाने का निर्देश दिया। इस निर्देश के बाद संयुक्त सचिव कारागार ने कन्नौज जेल अधीक्षक के निलंबन का आदेश जारी कर विभाग में खलबली मचा दी। घटना के करीब डेढ़ माह बाद हुए निलंबन को लेकर विभाग में तमाम तरह के कयास लगाए जा रहे। उधर इस संबंध में जब प्रमुख सचिव कारागार अनिल गर्ग से उनका पक्ष जानने का प्रयास किया गया तो उनका फोन ही नहीं उठा।
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शासन की कार्यवाहियों पर पहले भी उठ चुके सवाल
कार्रवाई को लेकर शासन में बैठे आला अफसरों की कार्यप्रणाली पर पहले भी कई बार सवाल उठ चुके हैं। बीते दिनों मऊ जेल एक बंदी ने फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली। इस मामले में अधीक्षक आनंद शुक्ला को निलंबित कर मुख्यालय से संबद्ध कर दिया गया जबकि शुक्रवार को फतेहगढ़ सेंट्रल जेल में बंदी प्रभात कुमार ने फांसी लगाकर आत्महत्या की। इस पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं की गई। इससे पूर्व समयपूर्व रिहाई के एक गलती पर कानपुर देहात जेल के अधीक्षक राजेंद्र कुमार को निलंबित कर दिया जबकि समयपूर्व रिहाई के इसी प्रकार के मामले में दो गलतियां करने वाले सेंट्रल जेल फतेहगढ़ के वरिष्ठ अधीक्षक पी एन पांडेय के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं की गई। गलती करने वाले वरिष्ठ अधीक्षक को प्रोन्नति देकर डीआईजी जरूर बना दिया गया। यही नहीं फरारी के लिए दोषी ठहराए गए एक जेलर को निलंबित किया गया। बहाल करने के बाद इस जेलर को फिर उसी जेल पर तैनात कर दिया गया। यह तो बानगी है, इस प्रकार शासन की दर्जनों कार्यवाहियों पर पहले भी सवाल उठ चुके है।
