लखनऊ। दलित, शोषित और निर्बल वर्गों की राजनीति का दावा करने वाली निषाद पार्टी में परिवारवाद खुलकर सामने आता दिख रहा है। पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष डॉ. संजय निषाद खुद को “पोलिटिकल गॉड फादर ऑफ फिशरमैन” के रूप में प्रस्तुत करते हैं, लेकिन पार्टी की कमान पूरी तरह परिवार के इर्द-गिर्द घूमती नजर आ रही है। पार्टी में पहले नंबर पर जहां संजय निषाद हैं, वहीं दूसरे नंबर के नेता उनके पुत्र और पूर्व सांसद प्रवीण निषाद हैं। इसके बाद तीसरे प्रमुख चेहरे के तौर पर छोटे पुत्र श्रवण निषाद को आगे बढ़ाया गया है। यानी पार्टी के शीर्ष तीनों पदों पर परिवार के सदस्य ही काबिज हैं। राजनीतिक गलियारों में इसे लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं कि निषाद पार्टी अब जन आंदोलन नहीं, बल्कि एक “घर की पार्टी” बनती जा रही है।
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भाजपा के साथ गठबंधन के चलते निषाद पार्टी को चुनावों में सीटें भी मिल जाती हैं और उनकी राजनीतिक गाड़ी लखनऊ से दिल्ली तक सरपट दौड़ रही है। स्थानीय लोगों का कहना है कि निषाद पार्टी में वही देसी कहावत सच साबित होती दिख रही है
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लखनऊ में लगा होर्डिंग बना चर्चा का विषय राजधानी लखनऊ के श्रीराम टावर के सामने लगा एक होर्डिंग इन दिनों राजनीतिक चर्चा का केंद्र बना हुआ है, जिसमें पार्टी के प्रमुख चेहरों के रूप में सिर्फ पिता और पुत्रों को ही प्रमुखता दी गई है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इस तरह का परिवारवाद पार्टी के मूल उद्देश्य और सामाजिक न्याय के दावे पर सवाल खड़े करता है।
