योगी के बजट से 2027 की बिसात, आंकड़ों के सहारे सियासी दांव

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अजय कुमार

उत्तर प्रदेश सरकार का 2026-27 का बजट केवल अगले वित्त वर्ष की आय-व्यय योजना नहीं है, बल्कि इसे 2027 के विधानसभा चुनाव की सबसे ठोस राजनीतिक पटकथा के रूप में देखा जा रहा है। 9 लाख 12 हजार 696 करोड़ रुपये के इस बजट के जरिए सरकार ने यह साफ संकेत दिया है कि वह चुनाव से पहले विकास, सुरक्षा और कल्याण तीनों मोर्चों पर अपने दावों को आंकड़ों के साथ जमीन पर उतारकर पेश करना चाहती है। पिछले बजट के मुकाबले करीब 12.9 प्रतिशत बढ़े इस आकार को सत्ता पक्ष “विश्वास का बजट” बता रहा है, जबकि इसके भीतर छिपा राजनीतिक संदेश यह है कि सरकार न तो संसाधनों की कमी से जूझ रही है और न ही चुनाव से पहले खर्च बढ़ाने से पीछे हट रही है।  सरकार ने सबसे पहले प्रदेश की अर्थव्यवस्था को अपने मजबूत पक्ष के रूप में सामने रखा है। 2024-25 के त्वरित अनुमान के अनुसार 30.25 लाख करोड़ रुपये की जीएसडीपी और 13.4 प्रतिशत की वृद्धि दर यह दिखाने की कोशिश है कि उत्तर प्रदेश अब केवल जनसंख्या वाला राज्य नहीं, बल्कि तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला प्रदेश बन चुका है। 2016-17 में जहां जीएसडीपी करीब 12.75 लाख करोड़ रुपये थी, वहीं आठ-नौ वर्षों में इसके ढाई गुना से अधिक होने को सरकार स्थिर शासन और निवेश के अनुकूल माहौल का नतीजा बता रही है। 2027 के चुनाव में यह आंकड़ा खासतौर पर शहरी मतदाताओं, कारोबारियों और निवेश से जुड़े वर्गों के सामने रखा जाएगा, ताकि यह संदेश जाए कि सत्ता में बदलाव विकास की रफ्तार को रोक सकता है।

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प्रति व्यक्ति आय को लेकर दिए गए आंकड़े भी इसी राजनीतिक रणनीति का हिस्सा हैं। 2016-17 में 54,564 रुपये रही प्रति व्यक्ति आय के 2024-25 में बढ़कर 1,09,844 रुपये होने और 2025-26 में इसके 1,20,000 रुपये तक पहुंचने के अनुमान को सरकार आम आदमी की जिंदगी से जोड़कर पेश कर रही है। यह संदेश खास तौर पर मध्यम वर्ग और निम्न मध्यम वर्ग के लिए है, जो महंगाई, बच्चों की पढ़ाई और स्वास्थ्य खर्च को लेकर सबसे ज्यादा चिंतित रहता है। सरकार का दावा है कि आय बढ़ने का मतलब सिर्फ आंकड़ों में सुधार नहीं, बल्कि उपभोग और जीवन स्तर में बदलाव है। गरीबी के मोर्चे पर 6 करोड़ लोगों को बहुआयामी गरीबी से बाहर निकालने का दावा 2027 के लिहाज से सबसे बड़ा सामाजिक कार्ड माना जा रहा है। मुफ्त राशन, प्रधानमंत्री आवास योजना, उज्ज्वला गैस कनेक्शन, आयुष्मान भारत कार्ड, शौचालय और बिजली कनेक्शन जैसी योजनाओं से जुड़े करोड़ों लाभार्थियों को एक साथ रखकर सरकार यह दिखाना चाहती है कि गरीब सिर्फ योजनाओं का नाम नहीं, बल्कि सत्ता की राजनीति का केंद्र है। चुनावी रणनीति में यह वर्ग इसलिए अहम है क्योंकि यह सीधे सरकार से जुड़ाव महसूस करता है और उसके फैसले अक्सर स्थिर रहते हैं।

रोजगार को लेकर बजट में पेश किए गए आंकड़े विपक्ष के सबसे मजबूत मुद्दे का जवाब माने जा रहे हैं। बेरोजगारी दर 2.24 प्रतिशत बताकर सरकार यह दावा कर रही है कि प्रदेश में रोजगार की स्थिति राष्ट्रीय औसत से बेहतर है। पुलिस विभाग में 2017 से अब तक 2 लाख 19 हजार से अधिक भर्तियां, 1 लाख 58 हजार पदोन्नतियां, 60 हजार से ज्यादा प्रशिक्षणाधीन जवान और 83 हजार से अधिक पदों पर चल रही भर्ती प्रक्रिया को एक साथ जोड़कर सरकार यह दिखाना चाहती है कि सरकारी नौकरियां सिर्फ घोषणाओं तक सीमित नहीं रहीं। शिक्षा क्षेत्र में 34 हजार से अधिक शिक्षकों की नियुक्ति भी इसी दिशा में रखा गया कदम है, क्योंकि शिक्षक समुदाय ग्रामीण और कस्बाई राजनीति में राय बनाने की अहम भूमिका निभाता है। युवाओं के लिए स्वरोजगार को बढ़ावा देने की रणनीति भी बजट में साफ दिखती है। मुख्यमंत्री युवा उद्यमी विकास अभियान के तहत बिना गारंटी और बिना ब्याज ऋण देकर हर साल 1 लाख सूक्ष्म उद्यम स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका राजनीतिक मतलब यह है कि सरकार उन युवाओं को भी साधना चाहती है, जिन्हें सरकारी नौकरी की सीमित सीटों से निराशा हुई है। अगर यह योजना आंशिक रूप से भी सफल होती है, तो 2027 तक लाखों परिवार सीधे इससे जुड़ सकते हैं।

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कृषि क्षेत्र के आंकड़े ग्रामीण राजनीति को ध्यान में रखकर चुने गए हैं। 3 लाख 4 हजार करोड़ रुपये से अधिक का रिकॉर्ड गन्ना मूल्य भुगतान पश्चिमी उत्तर प्रदेश और तराई क्षेत्र में सरकार का सबसे मजबूत चुनावी हथियार माना जा रहा है। गन्ना मूल्य में 30 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी से करीब 3000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त लाभ का दावा किसानों को यह याद दिलाने के लिए है कि भुगतान सीधे खाते में पहुंचा है। गेहूं, धान और मोटे अनाज की लाखों मीट्रिक टन खरीद और हजारों करोड़ रुपये के भुगतान के आंकड़े न्यूनतम समर्थन मूल्य को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता दिखाने की कोशिश हैं। नलकूपों के लिए मुफ्त बिजली की व्यवस्था ग्रामीण मतदाताओं के लिए सीधा संदेश है कि सिंचाई लागत सरकार उठाने को तैयार है। महिलाओं को लेकर बजट में दिए गए आंकड़े 2022 के चुनावी अनुभव से निकले हुए माने जा रहे हैं, जहां महिला मतदाताओं का झुकाव निर्णायक साबित हुआ था। मुख्यमंत्री सुमंगला योजना के तहत 26.81 लाख बालिकाओं को लाभ, सेफ सिटी परियोजना, महिला पुलिस बीट, सीसीटीवी नेटवर्क और वर्किंग वूमेन हॉस्टल जैसे प्रावधान यह दिखाते हैं कि सरकार महिला सुरक्षा और सम्मान को केवल कानून-व्यवस्था नहीं, बल्कि सामाजिक मुद्दा मानती है। महिला मतदाता भावनात्मक और व्यावहारिक दोनों आधारों पर निर्णय करती हैं, और बजट में यह संदेश उसी दिशा में जाता है।

कानून-व्यवस्था से जुड़े आंकड़े भी 2027 की चुनावी कहानी का अहम हिस्सा हैं। डकैती, लूट, हत्या और अपहरण जैसे अपराधों में 40 से 80 प्रतिशत तक कमी के दावे के जरिए सरकार यह स्थापित करना चाहती है कि उत्तर प्रदेश अब पहले जैसा असुरक्षित नहीं है। पुलिस भवनों, आवास और संसाधनों पर हजारों करोड़ रुपये के प्रावधान यह संकेत देते हैं कि सुरक्षा ढांचे को और मजबूत किया जाएगा। यह संदेश शहरी मतदाताओं, व्यापारियों और महिलाओं के लिए खास तौर पर अहम है। कुल मिलाकर 2026-27 का बजट एक ऐसा दस्तावेज बनकर सामने आया है, जिसमें हर बड़ा आंकड़ा 2027 के मतदाता को ध्यान में रखकर चुना गया है। विकास, कल्याण, सुरक्षा और पहचान चारों को जोड़कर सरकार ने यह दिखाने की कोशिश की है कि सत्ता की निरंतरता ही स्थिरता की गारंटी है। आने वाले महीनों में यही बजट गांव-गांव, शहर-शहर होने वाली राजनीतिक बहसों का आधार बनेगा, जहां सरकार इन आंकड़ों के सहारे भरोसा मांगेगी और विपक्ष इन्हीं आंकड़ों को चुनौती देने की कोशिश करेगा।

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