राजेन्द्र गुप्ता
लखनऊ। हर साल 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस मनाया जाता है। इस दिवस को संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2018 में दालों के महत्व और उनके पोषण संबंधी लाभों को वैश्विक स्तर पर पहचान देने के उद्देश्य से घोषित किया था। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, दालें केवल पौष्टिक भोजन नहीं हैं, बल्कि वे भूख, गरीबी और कुपोषण जैसी वैश्विक समस्याओं से निपटने में भी अहम भूमिका निभाती हैं। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि दालों को बढ़ावा देना सतत खाद्य प्रणालियों के विकास की दिशा में एक प्रभावी कदम है। यह पहल 2030 सतत विकास एजेंडा को हासिल करने, वैश्विक शांति को मजबूत करने और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने में भी सहायक है।
विश्व दलहन दिवस का इतिहास
दालें, जिन्हें फलियां भी कहा जाता है, फलीदार पौधों के खाद्य बीज होते हैं। इनमें सूखे मटर, सूखे सेम, चना, मसूर, ल्यूपिन जैसी फसलें शामिल हैं। दुनिया भर में भूख, गरीबी भूख, गरीबी और किस्मों में उपलब्ध दालें हर देश के खान-पान का अहम हिस्सा हैं। सबसे अधिक खपत की जाने वाली दालों में सूखे सेम, मटर और मसूर प्रमुख हैं। दालों में फलीदार पौधों के सूखे बीज शामिल होते हैं, जबकि हरी सब्जियों की फसलें इसमें शामिल नहीं की जातीं। ये बीज प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और खनिजों से भरपूर होते हैं, जिसके कारण दालों को एक स्वस्थ और पौष्टिक सुपरफूड माना जाता है। इन पोषक तत्वों से भरपूर फसलों के महत्व को रेखांकित करने के लिए संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 20 दिसंबर 2013 को एक विशेष प्रस्ताव (A/RES/68/231) पारित किया और 2016 को दलहन का अंतरराष्ट्रीय वर्ष (IYP) घोषित किया। इस अभियान का नेतृत्व संयुक्त राष्ट्र के खाद्य और कृषि संगठन (FAO) ने किया, जिससे दालों के पोषण और पर्यावरणीय लाभों को लेकर वैश्विक जागरूकता में उल्लेखनीय वृद्धि हुई।
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बुर्किना फासो की पहल से बना वैश्विक दिवस
अंतरराष्ट्रीय दलहन वर्ष की सफलता के बाद, पश्चिम अफ्रीकी देश बुर्किना फासो ने विश्व दलहन दिवस को हर साल मनाने का प्रस्ताव रखा। इसका उद्देश्य गरीबी, खाद्य सुरक्षा, पोषण, मानव स्वास्थ्य और मिट्टी की गुणवत्ता से जुड़ी वैश्विक चुनौतियों से निपटने में दालों की भूमिका को और मजबूत करना था। इसके बाद से हर साल 10 फरवरी को विश्व दलहन दिवस मनाया जाने लगा।
खाद्य सुरक्षा में दालों की भूमिका
किसानों के लिए दालें एक बेहद महत्वपूर्ण फसल हैं। वे इन्हें उगा भी सकते हैं और बेच भी सकते हैं, जिससे घरेलू खाद्य सुरक्षा बनी रहती है और आर्थिक स्थिरता को बल मिलता है। दालें छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय का भरोसेमंद स्रोत भी हैं।
पर्यावरण संरक्षण में भी कारगर
दालों में मौजूद नाइट्रोजन स्थिरीकरण गुण मिट्टी की उर्वरता को बढ़ाते हैं, जिससे खेतों की उत्पादकता में सुधार होता है। इंटरक्रॉपिंग और कवर फसलों के रूप में दालों का उपयोग करने से कीट और बीमारियों का खतरा कम होता है और मिट्टी की जैव विविधता भी बढ़ती है। इसके अलावा, दालें सिंथेटिक उर्वरकों पर निर्भरता कम करके जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को घटाने में मदद करती हैं। रासायनिक उर्वरकों के उत्पादन और उपयोग से ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, जो पर्यावरण के लिए हानिकारक है।
पानी की बचत में दालें सबसे आगे
दालें पानी के उपयोग के मामले में भी बेहद किफायती हैं। एक किलो दाल के उत्पादन में जहां लगभग 1250 लीटर पानी की आवश्यकता होती है, वहीं एक किलो बीफ के उत्पादन के लिए 13,000 लीटर पानी खर्च होता है। यह अंतर दालों को पर्यावरण के अनुकूल और टिकाऊ खाद्य विकल्प बनाता है।
