गांधी आश्रम की करोड़ों की जमीन पर बढ़ता विवाद

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  • प्रशासनिक चुप्पी और संभावित टकराव के बीच उलझा मामला
  • गांधी आश्रम के कर्मचारियों ने जिलाधिकारी से की शिकायत

आशुतोष मिश्रा

संतकबीरनगर। संत कबीर नगर जिले के नाथनगर तिराहे पर स्थित ऐतिहासिक गांधी आश्रम एक बार फिर विवादों के केंद्र में आ गया है। वर्षों से सामाजिक सेवा और स्वदेशी उत्पादों के निर्माण से जुड़ा यह आश्रम अब अपनी ही जमीन को लेकर गंभीर संकट का सामना कर रहा है। करोड़ों रुपये की कीमत वाली इस भूमि पर स्वामित्व को लेकर स्थानीय लोगों और गांधी आश्रम प्रबंधन के बीच टकराव बढ़ता जा रहा है। हालात ऐसे बनते दिख रहे हैं कि यदि समय रहते प्रशासन ने ठोस हस्तक्षेप नहीं किया, तो यह विवाद कभी भी बड़ा सामाजिक और कानून व्यवस्था का मुद्दा बन सकता है। गांधी आश्रम की स्थापना वर्ष 1966 में एक आयोग के माध्यम से की गई थी।

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उस समय नाथनगर तिराहे पर आश्रम को पर्याप्त भूमि आवंटित की गई थी, जिस पर खादी उत्पादन, हस्तशिल्प निर्माण और स्थानीय लोगों को रोजगार देने से जुड़े कई कार्य संचालित होते थे। लंबे समय तक यह आश्रम क्षेत्र की आर्थिक और सामाजिक गतिविधियों का केंद्र रहा। लेकिन बीते कुछ वर्षों में बदलते बाजार हालात, सरकारी सहयोग में कमी और आर्थिक संकट के चलते गांधी आश्रम का व्यवसाय लगभग ठप हो गया। स्थिति यहां तक पहुंच गई कि कर्मचारियों को नियमित वेतन देना भी कठिन हो गया। आश्रम प्रबंधन के सामने अस्तित्व बचाने की चुनौती खड़ी हो गई। इसी कारण आश्रम की खाली पड़ी भूमि पर कुछ दुकानें बनवाकर उन्हें किराए पर देने की योजना बनाई गई ताकि उससे मिलने वाली आय से कर्मचारियों का वेतन और आश्रम के संचालन खर्च पूरे किए जा सकें। लेकिन जैसे ही निर्माण कार्य शुरू हुआ, विवाद ने जन्म ले लिया।

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स्थानीय लोगों का दावा: निजी जमीन पर वर्षों से कब्जा

नाथनगर के कुछ स्थानीय लोगों का आरोप है कि गांधी आश्रम जिस जमीन पर निर्माण करा रहा है, वह उनकी निजी भूमि है। उनका कहना है कि वर्षों पहले प्रशासनिक गड़बड़ी या प्रभावशाली लोगों के दबाव में इस जमीन पर गांधी आश्रम ने कब्जा कर लिया था और अब जब जमीन की कीमत बढ़ गई है तो आश्रम दोबारा उस पर स्थायी निर्माण कर अपने कब्जे को मजबूत करना चाहता है। स्थानीय निवासियों का यह भी दावा है कि उनके पास इस जमीन से जुड़े कुछ पुराने दस्तावेज और पारिवारिक रिकॉर्ड मौजूद हैं, जिनके आधार पर वे इसे अपनी पैतृक संपत्ति मानते हैं। हालांकि अब तक किसी भी पक्ष ने सार्वजनिक रूप से पूरे दस्तावेज मीडिया के सामने प्रस्तुत नहीं किए हैं।

गांधी आश्रम प्रबंधन का पलटवार

गांधी आश्रम के पूर्व मंत्री राम आशीष शर्मा और वर्तमान मंत्री इंद्रेश जी ने इन आरोपों को पूरी तरह निराधार बताया है। उनके अनुसार, यह जमीन विधिवत रूप से वर्ष 1966 में गांधी आश्रम को आवंटित की गई थी और तभी से आश्रम का इस पर शांतिपूर्ण कब्जा चला आ रहा है। उन्होंने बताया कि आश्रम की पूरी भूमि की सीमांकन और बाउंड्री कई दशक पहले ही कर दी गई थी। इसी वर्ष लगातार जल जमाव के कारण करीब पांच फीट ऊंची पुरानी बाउंड्री दीवार गिर गई थी। मलबा हटाकर जब दोबारा निर्माण शुरू कराया गया, तभी कुछ लोग अचानक इस जमीन को अपनी बताकर बाधा उत्पन्न करने लगे।

आश्रम प्रबंधन का सवाल है कि

“अगर यह जमीन सच में किसी और की थी तो पिछले लगभग 60 वर्षों तक किसी ने आपत्ति क्यों नहीं की? अब अचानक विवाद क्यों खड़ा किया जा रहा है?”

उनका आरोप है कि कुछ अराजक तत्व स्थानीय स्तर पर प्रशासनिक मिलीभगत के सहारे इस बहुमूल्य जमीन पर कब्जा करने का प्रयास कर रहे हैं।

लेखपाल की भूमिका पर उठे सवाल

इस पूरे विवाद में स्थानीय लेखपाल की भूमिका को लेकर भी गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। गांधी आश्रम प्रबंधन का कहना है कि लेखपाल द्वारा एकतरफा रिपोर्टिंग की जा रही है, जिससे भ्रम की स्थिति पैदा हो रही है। उनका दावा है कि बिना ऐतिहासिक रिकॉर्ड की पूरी जांच किए कुछ लोगों के पक्ष में माहौल बनाया जा रहा है। जबकि राजस्व अभिलेखों में यह भूमि लंबे समय से गांधी आश्रम के नाम दर्ज है। प्रबंधन ने इसे “भूमि माफिया मॉडल” करार देते हुए आशंका जताई है कि धीरे-धीरे फर्जी दावों के जरिए आश्रम की जमीन हड़पने की साजिश रची जा रही है।

जिलाधिकारी तक पहुंचा मामला

स्थिति बिगड़ती देख गांधी आश्रम के कर्मचारियों और पदाधिकारियों ने जिलाधिकारी को औपचारिक शिकायत पत्र सौंपा। शिकायत में जमीन के ऐतिहासिक आवंटन, पुराने रिकॉर्ड और हालिया अतिक्रमण प्रयासों का पूरा विवरण दिया गया। मामले को गंभीरता से लेते हुए जिलाधिकारी ने महुली पुलिस को जांच के निर्देश दिए हैं और राजस्व विभाग से भी रिपोर्ट तलब की गई है। फिलहाल महुली थाना पुलिस दोनों पक्षों के बयान दर्ज कर रही है और जमीन से जुड़े अभिलेखों की जांच प्रक्रिया शुरू कर दी गई है।

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बढ़ सकता है सामाजिक तनाव

स्थानीय स्तर पर इस विवाद को लेकर माहौल लगातार गर्म होता जा रहा है। एक ओर गांधी आश्रम से जुड़े कर्मचारी और समर्थक इसे ऐतिहासिक संस्था पर हमला मान रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कुछ ग्रामीण इसे अपनी जमीन के अधिकार की लड़ाई बता रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रशासन समय रहते निष्पक्ष जांच और स्पष्ट फैसला नहीं करता, तो यह विवाद बड़े आंदोलन, धरना-प्रदर्शन और यहां तक कि हिंसक टकराव का रूप भी ले सकता है। नाथनगर तिराहे जैसे व्यस्त इलाके में जमीन विवाद का बढ़ना पूरे कस्बे की शांति व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।

कई अहम सवाल खड़े करता मामला

  • यह विवाद कई गंभीर प्रश्नों को जन्म देता है:
  • यदि जमीन गांधी आश्रम की नहीं थी तो दशकों तक कोई दावा क्यों नहीं किया गया?
  • क्या हालिया भूमि मूल्य वृद्धि के चलते कब्जे की कोशिश तेज हुई है?
  • कहीं फर्जी पट्टों के जरिए जमीन हड़पने की योजना तो नहीं बन रही?
  • स्थानीय राजस्व कर्मियों की भूमिका कितनी निष्पक्ष है?
  • इन सवालों के जवाब प्रशासनिक जांच के बाद ही सामने आ सकेंगे।

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गांधी आश्रम का ऐतिहासिक महत्व

गांधी आश्रम केवल एक जमीन का टुकड़ा नहीं है, बल्कि यह संत कबीर नगर की सामाजिक चेतना का प्रतीक रहा है। वर्षों तक यहां से जुड़े उत्पादों ने ग्रामीणों को रोजगार दिया और आत्मनिर्भरता की सोच को मजबूत किया। यदि आर्थिक संकट के इस दौर में आश्रम की संपत्ति भी विवादों में फंसती गई, तो यह संस्था पूरी तरह समाप्त होने की कगार पर पहुंच सकती है।

अब सबकी नजर प्रशासन पर

फिलहाल पूरा मामला जिलाधिकारी के निर्देश पर चल रही जांच पर टिका हुआ है। पुलिस और राजस्व विभाग की रिपोर्ट तय करेगी कि जमीन का असली मालिक कौन है और विवाद की जड़ कहां है। स्थानीय लोग उम्मीद कर रहे हैं कि प्रशासन निष्पक्ष फैसला करेगा और किसी भी तरह की अवैध कब्जे की कोशिश को रोकेगा। यदि समय रहते ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो गांधी आश्रम की जमीन का यह विवाद आने वाले दिनों में जिले का सबसे बड़ा भूमि संघर्ष बन सकता है।

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