गौरी तृतीया व्रत आज है, गौरी तृतीया पूजा पौराणिक महत्व

राजेन्द्र गुप्ता

माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का समय गौरी तृतीया के नाम से पूजा जाता है। सुखी वैवाहिक जीवन के साथ पूर्ण होता है मनोकूल जीवन साथी का आशीर्वाद। गौरी तृतीया का व्रत बहुत ही शुभ एवं पवित्र उत्सव है जो सौभाग्यवती स्त्रियों के लिए एक विशेष समय है। मान्यताओं के अनुसार इस दिन देवी गौरी को भगवान शिव का साथ प्राप्त हुआ था और जो भी कुंवारी कन्याएं या विवाहित स्त्रियां इस व्रत को करती हैं उनका जीवन सुख एवं सौभाग्य से भर जाता है।

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गौरी तृतीया व्रत पूजा 2026

इस साल माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि के दिन गौरी तृतीया का व्रत रखा जाता है इस दिन को गौंतरी व्रत के नाम से भी जाना जाता है। इस साल गौरी तृतीया का व्रत 21 जनवरी 2026 को रखा जाएगा। माघ माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि का आरंभ 20 जनवरी 2026 को मध्य रात्रि 01:43 से होगा और माघ शुक्ल तृतीया तिथि का समापन अगले दिन 21 जनवरी 2026 को रात्रि 01:48 पर होगा। उदया तिथि के अनुसार 21 जनवरी को बुधवार के दिन इस व्रत को रखा जाएगा। इस साल गौरी तृतीया व्रत पर कई विशेष योग भी बन रहे होंगे। रवि योग की शुभता का प्रभाव मिलेगा इसके अलावा इस दिन पंचक का प्रभाव भी बना रहने वाला है। कुछ अन्य मुहूर्त इस प्रकार रहेंगे।

  • ब्रह्म मुहूर्त का समय: 05:27 से 06:20 तक
  • विजय मुहूर्त दोपहर 02:19 से 03:01 तक
  • गोधूलि मुहूर्त का समय संध्या 05:49 से 06:15 तक
  • रवि योग का समय दोपहर 01:58 से अगले दिन सुबह 07:14 तक

गौरी तृतीया पूजा विधि

सौभाग्य का प्रतीक गौरी तृतीया का व्रत स्त्रियों के मध्य बहुत ही लोकप्रिय रहा है। प्राचीन काल से ही इस व्रत को किया जा रहा है। माघ माह का समय अत्यंत ही शुभ एवं पुत्र समय माना गया है और इस माह के शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि बहुत ही खास माना गया है। इस दिन देवी गौरी के साथ भगवान शिव का पूजन किया जाता है जिसके प्रभाव से भक्तों को विशेष सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है। गौरी तृतीया की पूजा का आरंभ प्रात:काल से होता है। स्नान इत्यादि कार्यों से निवृत्त होकर पूजा स्थल पर देवी गोरी एवं भगवान शिव की प्रतिमाओं को स्थापित किया जाता है। पुष्प, धूप, दीप, अक्षत एवं अन्य पूजा सामग्री को भगवान को अर्पित करते हुए पूजा आरंभ की जाती है। देवी को श्रृंगार की वस्तुएं अर्पित करते हैं एवं विभिन्न प्रकार के मिष्ठान एवं भोग पदार्थों को अर्पित किया जाता है। इस दिन गौरी तृतीया व्रत की कथा को करते हैं एवं भगवान शिव एवं देवी पार्वती का एक साथ पूजन एवं आरती करते हुए पूजा संपन्न की जाती है।

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गौरी तृतीया पूजा पौराणिक महत्व

गोरी तृतीया की पूजा को सौभाग्यवती स्त्रियां अपने सुहाग की लंबी उम्र की कामना हेतु करती हैं। अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद पाने की कामना से हर महिलाएं इस दिन व्रत रखती हैं और भक्ति भाव के साथ इस दिन को मनाती हैं। कुछ स्थानों पर इस दिन को निर्जला व्रत के रूप में भी रखा जाता है। कुंवारी कन्याएं भी अपने जीवन में सुख दांपत्य जीवन की कामना के लिए इस व्रत को करती हैं। मान्यताओं के अनुसार इस दिन को प्रेम जीवन की शुभता के लिए बहुत ही खास समय भी माना गया है। पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी पार्वती ने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी और भगवान ने उनकी तपस्या से प्रसन्न होकर उन्हें अपनी जीवनसंगिनी होने का आशीर्वाद प्रदान किया था अत: देवी को जिस प्रकार अपने प्रेम का सुख प्राप्त हुआ उसी प्रकार हर भक्त को अपने जीवन का सुख प्राप्त होता है। सच्चे मन एवं भक्ति भाव से रखा गया गौरी तृतीया आ व्रत कभी निष्फल नहीं जाता है।

गौरी तृतीया पूजा का ज्योतिष अनुसार प्रभाव

गोरी तृतीया का व्रत सुख समृद्धि को देने वाला एवं मनोकामनाओं को पूर्ण करने का वाला होता है। धार्मिक कथाओं एवं ज्योतिष शास्त्र में भी इस व्रत की महिमा बहुत ही उल्लेखनीय मानी गई है। इस व्रत के प्रभाव से विवाह विलंब के योग समाप्त हो जाते हैं। वैवाहिक जीवन में चल रही उथल – पुथल भी दूर होती है। किसी भी तरह का अलगाव यदि जीवन साथी से बन गया है तो वह भी इस दिन किए जाने वाले व्रत एवं पूजन के प्रभाव से शांत हो जाता है।

ज्योतिष शास्त्र में विवाह भाव की पीड़ा की शांति के लिए गौरी तृतीया का पूजन बहुत शुभ माना जाता है। जन्म कुंडली में बनने वाला मांगलिक दोष या मंगल के दुष्प्रभाव की शांति भी गौरी तृतीया पूजन से संभव हो पाती है। विवाह में आ रही किसी भी तरह की बाधा दूर होती है।

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गौरी तृतीया व्रत का पूजन सुख दांपत्य जीवन को देने के साथ साथ व्यक्ति को संतान सुख एवं वंश वृद्धि का सुख भी प्रदान करता हे। जीवन में आनंद एवं भौतिक सुखों की कोई कमी नहीं रहती है। भक्तों को यह व्रत अनेकों तरह के शुभ फल देने में अत्यंत ही फलदायी माना गया है।

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