तिल द्वादशी आज पर  विशेष : रोग और कष्टों से मिलती है मुक्ति

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तिल माघ मास के कृष्ण पक्ष की द्वादशी तिथि को तिल द्वादशी कहा जाता है। इसे कूर्म द्वादशी के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा और तिल के दान का विशेष महत्व है। वर्ष 2026 में यह व्रत मकर संक्रांति के अगले दिन मनाया जाएगा। तिल द्वादशी न केवल आध्यात्मिक शुद्धि का मार्ग है, बल्कि यह दरिद्रता दूर करने और जीवन में सुख-समृद्धि लाने वाला एक अमोघ अवसर भी है।

तिल द्वादशी 2026: तिथि और मुहूर्त

  • वर्ष 2026 में तिल या कूर्म द्वादशी 15 जनवरी, गुरुवार को मनाई जाएगी।
  • माघ कृष्ण द्वादशी तिथि आरंभ: 14 जनवरी 2026 को शाम 05:52 बजे से।
  • द्वादशी तिथि समाप्त: 15 जनवरी 2026 को रात 08:16 बजे तक।
  • उदयातिथि के अनुसार तिल द्वादशी और कूर्म द्वादशी व्रत 15 जनवरी को रखा जाएगा।

क्यों किया जाता है यह व्रत? जानें महत्व

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, तिल की उत्पत्ति भगवान विष्णु के पसीने से हुई है, इसलिए यह उन्हें अत्यंत प्रिय है। महाभारत में उल्लेख है कि इस दिन तिल दान करने वाला व्यक्ति कभी नरक के दर्शन नहीं करता। पद्म पुराण के अनुसार, इस दिन तिल के प्रयोग और दान से जाने-अनजाने में हुए सभी पापों का नाश होता है। तिल द्वादशी पर तिल दान करने से व्यक्ति को अश्वमेध यज्ञ के समान पुण्य फल प्राप्त होता है। माना जाता है कि जो व्यक्ति इस व्रत को करता है, वह जन्म-जन्मांतर तक रोगों, जैसे कुष्ठ, अंधापन आदि से मुक्त रहता है।

रोग और कष्टों से मिलती है मुक्ति

धर्म शास्त्रों में उल्लेखित है कि तिल द्वादशी का व्रत करने से व्यक्ति को कई जन्मों तक भयानक रोगों जैसे अंधापन, बहरापन, कोढ़ आदि से मुक्ति मिलती है। यह व्रत स्वास्थ्य, लंबी आयु और सदा निरोगी रहने का वरदान देता है। इस दिन भगवान विष्णु की पूजा की जाती है। व्रत रखने वाले लोग तिल से बने व्यंजन जैसे तिल के लड्डू, तिल की चिक्की आदि बनाते और दान करते हैं। तिल दान करने से अश्वमेध यज्ञ के बराबर का फल मिलता है।

 

पूजा विधि : इस दिन तिल का छह तरीकों यानी षटतिला से उपयोग करना श्रेष्ठ माना जाता है: स्नान, उबटन, तर्पण, आहुति/हवन, भोजन और दान।

स्नान: सुबह जल्दी उठकर पानी में गंगाजल और तिल मिलाकर स्नान करें।

संकल्प: स्वच्छ पीले वस्त्र धारण करें और भगवान विष्णु के समक्ष व्रत का संकल्प लें।

पूजन: भगवान विष्णु के माधव रूप की मूर्ति को पंचामृत से अभिषेक कराएं। उन्हें पीले फूल, तुलसी दल, धूप और दीप अर्पित करें।

मंत्र जाप: पूजा के दौरान ‘ॐ नमो भगवते वासुदेवाय’ मंत्र का निरंतर जाप करें।

भोग: भगवान को तिल से बने पकवान या तिल और गुड़ के लड्डू का भोग लगाएं।

दान: पूजा के बाद किसी ब्राह्मण या जरूरतमंद को तिल, कंबल, अनाज या स्वर्ण का दान करना बहुत फलदायी होता है।

तिल द्वादशी की कथा

एक पौराणिक कथा के अनुसार, एक ब्राह्मणी भगवान विष्णु की परम भक्त थी और बहुत कठिन व्रत करती थी। उसने दान तो बहुत किया लेकिन कभी अन्न का दान नहीं किया। जब वह वैकुंठ गई, तो उसे वहां रहने के लिए कुटिया तो मिली लेकिन वह खाली थी। तब भगवान ने उसे बताया कि अन्न दान न करने के कारण ऐसा हुआ। तब उस ब्राह्मणी ने देव कन्याओं के कहने पर तिल द्वादशी का व्रत किया और तिल का दान किया, जिससे उसकी कुटिया धन-धान्य से भर गई।

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