प्रशासन को गुमराह कर दिनदहाड़े बुलडोजर चलाया 

  • नेत्रहीन विकलांग गरीब राही की दीवाल सबल विरोधियों ने बुलडोजर से गिरवाया
  •  नेत्रहीन और शारीरिक रूप से विकलांग गरीब किसान
  • पीड़ित न्याय के लिए दर दर भटकने को मजबूर

रामपाल यादव/विजय श्रीवास्तव

बलरामपुर /लखनऊ ।  उत्तर प्रदेश के बलरामपुर जिले में एक नेत्रहीन और शारीरिक रूप से विकलांग गरीब किसान राही पुत्र लखन के साथ हुए अन्याय की यह घटना सामाजिक न्याय की दृष्टि से गंभीर चिंता का विषय है। ग्राम पंचायत भोजपुर संतरी (थाना कोतवाली गैसड़ी) के अंतर्गत कृषि भूमि गाटा संख्या 150 पर राही का कानूनी कब्जा था। वर्ष 2017 में धारा 41 एलआर एक्ट के तहत उप जिलाधिकारी तुलसीपुर द्वारा सीमांकन कराया गया और कब्जा परिवर्तन भी दर्ज किया गया। इस दौरान राही ने भूमि पर लगभग तीन फीट ऊंची दीवार खड़ी की, जिसमें वे कृषि कार्य करते रहे।

विरोधी पक्ष, मूल भूस्वामी गाटा संख्या 151 के मुस्तफा ने भी वाद दायर किया, लेकिन 17 मई 2018 को न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया, क्योंकि मामला पहले ही निस्तारित हो चुका था और मौके पर पत्थर निशान लगाकर कब्जा परिवर्तन हो गया था। मुस्तफा असफल रहने के बाद अपनी भूमि मैनुद्दीन पुत्र सलाहुद्दीन को बेच दी। मैनुद्दीन ने कथित तौर पर कूट रचित दस्तावेजों के आधार पर प्रशासन को गुमराह कर राही की भूमि पर अवैध कब्जे की कोशिश की। इससे पहले भी पैमाइश के बहाने परिवार को डराया-धमकाया गया और मुकदमे दर्ज कराकर तहसील न्यायालय में प्रताड़ित किया गया, जिससे परिवार की सेहत बिगड़ गई।

घटना की चरम पर पहुंच 11 दिसंबर 2025 को हुई, जब एसडीएम तुलसीपुर बिना लिखित आदेश के मौके पर पहुंचे और मैनुद्दीन के सहयोगियों को दीवार गिराने का मौखिक संकेत दिया। जब पीड़ितों ने आदेश की प्रति मांगी, तो एसडीएम चले गए और पुलिस तैनात कर दी गई। पुलिस ने भी मौखिक आदेश बताकर दीवार का कुछ हिस्सा गिरवा दिया। शेष दीवार 12 जनवरी 2026 को नायब तहसीलदार और पुलिस की मौजूदगी में बुलडोजर से पूरी तरह ध्वस्त कर दी गई। पीड़ितों का दावा है कि इस कार्रवाई के लिए कोई लिखित आदेश नहीं था; केवल जांच और निस्तारण का सामान्य निर्देश था।

यह कार्रवाई प्रशासन की कथित पक्षपातपूर्ण भूमिका को उजागर करती है, जहां नेत्रहीन गरीब किसान को न्याय मिलने के बजाय उसकी मेहनत से बनी संपत्ति नष्ट कर दी गई। राही जैसे कमजोर वर्ग के व्यक्ति दर-दर भटकने को मजबूर हैं। उन्होंने जिलाधिकारी को फोन से सूचना दी, लेकिन कोई राहत नहीं मिली। अंततः मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को शिकायती पत्र भेजा गया है, जिसमें जांच, दोषियों पर कार्यवाही, जान-माल की सुरक्षा और न्याय की मांग की गई है। पीड़ित परिवार ने पत्र की प्रति पत्रकारों को सौंपते हुए अपनी व्यथा रोते हुए बयां की। ऐसी घटनाएं संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता) का उल्लंघन दर्शाती हैं। प्रशासन को बिना उचित प्रक्रिया, नोटिस और सुनवाई के कार्रवाई नहीं करनी चाहिए। उम्मीद है कि मुख्यमंत्री स्तर पर हस्तक्षेप से पीड़ित को न्याय मिलेगा और दोषी अधिकारियों पर सख्त कार्रवाई होगी। यह मामला भूमि विवादों में कमजोर वर्गों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की आवश्यकता को रेखांकित करता है।

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