एकांत वास… वनों मे नहीं घरों में… ऑनलाइन कथा के बन रहे हम आदी

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  •  भजन इलेक्ट्रानिक उपकरणों से नहीं मन से करें
  • शास्त्रों के अध्ययन से विमुख न हों
  •  गुरु सेवा, स़ंत दर्शन व सम्मुख बैठ कर कथा सुनें
बलराम कुमार मणि त्रिपाठी

यह क्या बात हुई? पहले लोग एकांत वास करने जंगलों मे जाते थे। अब हम घरों मे कैद होते जारहे हैं.. मैं स्वयं अपनी हालत पर गौर कर कह रहा हूं। इस भीड़ मे मै भी खोता जा रहा हूं। बच्चे तो इस तरह मोबाईल के गिरफ्त मे हो गए है, छीन लेने पर छटपटाने लगते हैं, मां बाप हताश होकर थमा देते हैं, जिससे उनके मानसिक संतुलन‌ पर असर पड़ रहा है। यह हाल गांव शहर दोनों मे तेजी से हो रहा है। इसलिए मैंने कुछ सख्त नियम अपनाने का दृढ़ निर्णय ले लिया है। दूसरों की हालत तो यह हो रही है कि टॉयलेट में भी मोबाईल और लैपटाप ले जाने लगे हैं।

स्वास्थ्य के लिए यह कितना घातक है अभी इस पर किसी का ध्यान नहीं ? यद्यपि कोरोना काल ने एक बानगी दिखाया था.. जब बाहर से सब्जियां लानी हो तो धुल कर घरो में रखे जाते थे। नोट भी धुलने शुरु हो गए थे और मोबाईल मे भी पोंछा लगाना पड़ रहा था.. दम दम पर हाथ सैनिटाईजर से साफ करना पड़ रहा था। इक्कीसवीं सदी में हम मोबाईल और ऑनलाईन के इतने आदी हो रहे हैं कि घरों मै भी उदासीन होकर जी रहे हैं। न तो किसी समस्या पर विचार विमर्श होरहा है और न घरों में आचार संहिता कायम हो पा रही है। बच्चे भी टीवी का रिमोट और मोबाईल के नशे का शिकार होकर पार्क भूल रहे हैं। पिज्जा बर्गर,चाकलेट, मैगी,पाश्ता खाकर वे मोटापे के शिकार हो रहे हैं।

क्या करें? : त्योहारों पर कदम बढ़ायें, गले मिलें अपनों के घर जायें.. सिर्फ अपने घर के कमरे मे कैद होकर संदेश ही भेजते न रह जायें। सोशल साईट के प्रयोग की बढ़त ने हमे एकांतवास दे दिया। किसी मेहमान के आने पर भी हमारी उंगलियां चलती रहती हैं। इसे मेहमान अपनी उपेक्षा समझता है,कम से कम उतने देर तो मोबाईल छोड़ दें।

संवेदन…शून्य…होना…उचित…नही़

पत्रकारिता ने मुझे भी मोबाईल,कम्प्यूटर का हैबिचुअल बना दिया। लेखन मे संशोधन की सुविधा और त्वरित समाचार प्रेषण की मजबूरी। सबकी खबरे चेक करके पास करना और इंटरनेट से हर रिजल्ट वैरी फाई करके समाचार छपने भेजना …पत्रकारिता की मजबूरी थी। इक्कीसवी सदी की यह सौगात मुझे शुरुआती दौर मे ही मिल गई,जिसमे मे डूबता चला गया। गासन,जिम्नास्टिक और सायंकाल दो किमी चलने वाले मेरे कदम कुर्सी से चिपक गए और मै़ गैस्ट्रो का शिकार हुआ। नतीजतन पचीस सालों मे मैं तेजी से #अंतर्मुखी_बहिर्मुखता की बीमारी का शिकार हुआ।

सन 2013 की चैत्र रामनवमी को मैने पत्रकारिता से त्याग पत्र का ईमेल किया और निजी जिंदगी की ओर मुड़ा। शिक्षण कार्य से 2012जून मे रिटायर हुआ। चारो धाम की तीर्थ यात्रा ,बीमार पत्नी का इलाज,बेटे बेटियो की शादी और अन्य जिम्मेदारियां मुंह बाये खड़ी थी। जिसे तेजी सै पूरी करने मे लग गया। आज यह अनुभव हो रहा है.. हम कहीं चेतन होकर भी जड़ता के शिकार तो नहीं होते जारहे? हमें जीवन का संतुलित व्यवहार और आचार विचार कायम रखना होगा.. अन्यथा जड़ता के शिकार हो जाएंगे।

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