राज्य स्थापना की रजत जयंती पर विशेष : ‘उम्मीदों का दरकता पहाड़’…पलायन…बेरोजगारी…और तबाह होती खेती…

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  • एक अदद ‘ स्थायी ’ राजधानी तक नहीं, स्कूल जाना भी तकलीफ भरा
  • राज्य स्थापना की रजत जयंती पर विशेष

अनिल उपाध्याय

दो दिनों बाद यानि 9 नवंबर को उत्तराखंड राज्य अपनी स्थापना के 25वें वर्ष का सरकारी जश्न मना रहा होगा। आंदोलनकारियों के बलिदान से बने इस पहाड़ी राज्य ने इन 25 सालों में क्या खोया और क्या पाया ? सवाल ढेर सारे हैं … मसलन नया राज्य बनने का उसका मकसद कहां तक पूरा हो सका ? इस सवाल के जवाब को सरकारी नजरिए से देखें तो इसका जवाब सूचना विभाग के बड़े बड़े विज्ञापन और होर्डिंग देखकर मिल जाता है पर सबसे बड़ा सवाल ये है कि पहाड़ का आम आदमी आज क्या महसूस कर रहा है। 25 साल का समय कम नहीं होता है, एक नयी पौंध दूसरी पीढ़ी के रुप में जवान हो चुकी है। सरकार इन 25 सालों के आत्मचिंतन के लिए तीन दिवसीय विशेष सत्र आयोजित कर रही है। सरकारी आत्मचिंतन के आयोजन में विपक्ष के लोग भी बुलाए जाएंगे बड़ी-बड़ी बातें होगी पर शायद इस मामूली से सवाल का जवाब इसमें नहीं मिल पाएगा कि आखिर 25 सालों के लंबे सफर के बाद भी इस राज्य को एक अदद राजधानी तक क्यों नहीं मिल सकी?

अब सत्ता में काबिज भारतीय जनता पार्टी और विपक्षी कांग्रेस अपनी-अपनी पीठ थपथपाते हुए बताएंगे कि हमारी कोशिशों की वजह से उत्तराखंड को नयी विधानसभा मिली, अपना सचिवालय मिला, लोक सेवा आयोग सहित सभी विभागों के निदेशालय मिले। वैसे अगर कुछ देर के लिए राजनीति का चश्मा उतार लिया जाए तो सब कुछ साफ नजर आने लगता है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता नारायण दत्त तिवारी ने इस राज्य के विकास और इंफ्रास्ट्रकचर के लिए काफी कुछ किया। इतना ही नयी उत्तराखंड राज्य बनने से पहले ही उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहते हुए नारायण दत्त तिवारी ने इस 1988-89 में राजधानी चयन आयोग की बात कही थी और गैण-सैंण का सुझाव भी दिया गया था। उत्तराखंड राज्य बनने के बाद इसके पहले मुख्यमंत्री नित्यानंद स्वामी ने दीक्षित आयोग का गठन किया था। गैण सैंण को स्थाई राजधानी बनाने की बात भी की गई थी। वैसे नारायण दत्त तिवारी ने उत्तराखंड राज्य बनने से पहले ही इस पहाड़ी राज्य के विकास और पलायन के लिए गंभीर कोशिशें की। नैनीताल के रानीबाग में HMT घड़ी का कारखाना खुलवाया। काशीपुर को इंडस्ट्रियल दर्जे के रुप में विकसित किया। भीमताल में भी टेलीविजन फैक्ट्री खुलवाई। इतना ही नहीं उत्तराखंड राज्य के मुख्यमंत्री बनने के बाद उधमसिंह नगर और हरिद्वार में सिडकुल की स्थापना की। अब इस पर भी सवाल उठाने वालों की संख्या कम नहीं है, तमाम लोग कहते हैं कि इससे उत्तराखंड के लोगों को क्या फायदा हुआ सारी बड़ी नौकरियां तो राज्य के बाहर रहने वालों को ही मिली?

पलायन आज भी पहाड़ का सबसे बड़ा ‘दर्द’ बना हुआ है। चाहे बीजेपी हो या कांग्रेस दोनों ने ही पहाड़ का पानी और जवानी रोकने के लिए बड़ी-बड़ी बातें की थी पर असल हालात आज क्या हैं? इसे उत्तराखंड की त्रासदी ही कहेंगे कि बीते 25 सालों में ऐसे तमाम इलाके हैं, जहां गांव के गांव खाली हो चुके हैं। उत्तराखंड के आरटीआई कार्यकर्ता हेमंत गौनिया को मिली सूचना पलायन का स्याह चेहरा दिखा जाती है। राज्य में पिछले दस वर्षों में पांच लाख से अधिक लोग उत्तराखंड से पलायन करने के लिए मजबूर हुए हैं। पहाड़ के 3 हजार से ज्यादा गांव वीरान हो चुके हैं जिसे ‘घोस्ट विलेज’ कहने में किसी को आपत्ति नहीं होनी चाहिए। लायक हैं। आरटीआई से पता चलता है कि इन लोगों में से, लगभग 1 लाख 18 हजार 961 लोग वापस लौटने के इरादे के बिना, स्थायी रूप से राज्य से बाहर चले गए हैं। इसके अलावा, 3 लाख 83 हाजर 726 से ज्यादा रोजगार के कारण पलायन कर चुके हैं। कुल मिलाकर बेरोजगारी 25 सालों के बाद भी यहां एक बड़ा मुद्दा है। उत्तराखंड में पलायन का कारण कहीं ना कहीं सरकार से ही जुड़ा हुआ मुद्दा है। यहां पर कई वर्षों से भाजपा सरकार है। वह कहीं ना कहीं हमेशा अपने वादों से चुकी है। राज्य में बहुत से ऐसे ग्रामीण क्षेत्र है जहां अभी भी स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सुविधाओं का अभाव है। इसकी वजह से भी लोगों को काफी परेशानियों का सामना करना पड़ता है। इस वजह से लोग गांव छोड़कर पलायन करने पर मजबूर हैं।

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शिक्षा की बात करें तो यह आज भी बेहद पिछड़ा हुआ ही है। ये पहाड़ के बच्चों की त्रासदी ही है कि उन्हें पढ़ने के लिए स्कूल जाने के लिए घर से 8 किलोमीटर पैदल जाना पड़ता है। बरसात के मौसम में तो स्कूल जाना बेहद कष्टकारीर हो जाता है। तमाम क्षेत्रों में बच्चे जंगल के रास्ते से भी पैदल स्कूल जाते हैं। बात करें खेती की तो बीते 25 सालों में यहां बहुत कुछ उजाड़ हो चुका है। एक मोटे अनुमान के कमुताबिक उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों में 32.22 फीसद लोग मजदूरी और 45.59 फीसद लोग खेती करते हैं। जलवायु में परिवतर्न ने खेती और किसानों को तबाह कर दिया है। उत्तराखंड के बागेश्वर जिले के खोलीगांव में फसल के नाम पर कुछ नहीं बचा है। कुछ खेतों से खड़िया निकल रही है। ऐसे में वह फसल के लायक नहीं बचे। ग्रामीण थोड़ी बहुत सब्जी वगैरह बोते हैं पर उन्हे जंगली सुअर उजाड़ देते हैं ऐसे में खेती न के बराबर हो चुकी है। खेत में काम करने वाले दिन-भर किसी तरह से बेरोजगाही का समय काट रहे हैं। घटती खेती वहां रह रहे लोगों को अर्थव्यवस्था पर दवाब डाल रही है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति व्यक्ति की आय में कमी उनके लिए एक चुनौती बन गई है। इसके अलावा पहाड़ी इलाकों के खेतों में किसानों को इतना ज्यादा अनाज प्राप्त नहीं होता कि जिसे बेचकर वो कमा सकें। वे वही खाते हैं, जो वो उगाते हैं। पेट भरने की मजबूरी में आजीविका के लिए मैदानी इलाकों में पलायन करना पड़ रहा है। अब इसे बिडम्बना ही कहा जाएगा कि राजनैतिक रुप से उत्तराखंड मुख्यमंत्री का उत्पादन करने वाला राज्य जरुर बन चुका है। 25 साल का उत्तराखंड अब तक 11 मुख्यमंत्री देख चुका है। पूर्व सीएम दिवंगत एनडी तिवारी के अलावा अभी तक कोई भी मुख्यमंत्री अपना पांच साल का कार्यकाल पूरा नहीं कर पाया है। हालांकि वर्तमान मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी चार साल पूरे कर चुके हैं।

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खैर अब बात स्थायी राजधानी की करते हैं। पिछले दिनों विधानसभा सत्र के दौरान गैरसैण को स्थाई राजधानी बनाने का मुद्दा सदन में फिर गर्माया। दरअसल प्रदेश को स्थाई राजधानी नहीं मिल पाना पहाड़ का बड़ा दर्द बना हुआ है। सदन में सत्ता पक्ष के विधायकों ने अपना पक्ष रखते हुए कहा कि गैरसैंण को ग्रीष्मकालीन राजधानी बनाए जाने का फैसला पूर्व सरकारों के घोषणा पत्र और जनता की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। सरकारी दावा है कि भराड़ीसैंण-गैरसैंण में तेजी से इंफ्रास्ट्रक्चर का भरपूर विकास हो रहा है। दरअसल ये मसला गैरसैंण कुमाऊं और गढ़वाल की भावनाओं से जुड़ा हुआ है। सदन में विपक्ष के विधायकों ने सरकार को इस मुद्दे पर चेताते हुए कहा कि आज 25 सालों के सफर पर चर्चा की जा रही है, लेकिन इस चर्चा में सबसे बड़ा केंद्र बिंदु स्थायी राजधानी का है। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि उन्हें स्थायी राजधानी कहां बनानी है? यदि देहरादून में बनानी है तो तय किया जाए और यदि गैरसैंण में बनानी है तो वह भी तय किया जाए। 25 सालों में उत्तराखंड राज्य को अपनी स्थायी राजधानी नहीं मिली है और यह सरकार की सबसे बड़ी नाकामी है। यह दुखद है कि इन 25 सालों में उत्तराखंड में राजधानी अपना अस्तित्व दर्ज नहीं करा पाई। कहने को तो इस प्रदेश में एक नहीं दो-दो राजधानियां हैं एक अस्तित्व में आने के साथ ही देहरादून में और दूसरी गैण-सैंण में। 25 साल पहले देहरादून अस्थाई राजधानी थी और 25 साल बाद भी अस्थाई राजधानी है कब तक रहेगी यह कोई नहीं जानता। पहले चुनी हुई सरकार के मुखिया नारायण दत्त तिवारी ने राजधानी का चयन करने के लिए कुछ कदम उठाए थे जो उनके पद से हटने के बाद पूरे नहीं हो सके। गठन तो अतंरिम सरकार के मुखिया नित्यानंद स्वामी ने भी किया था और उसके बाद के मुख्यमंत्रियों ने भी। लेकिन किसी ने भी धरातल पर उतारा नहीं बस दो-चार दिन के लिए ग्रीष्म कालीन सत्र सम्पन्न करा दिया।

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बावजूद इसके यहां की जनता और दूसरे संगठन आए-दिन स्थाई राजधानी के लिए धरना-प्रदर्शन करती रहीं।  आंदोलनकारियों के बलिदान से पहाड़ी क्षेत्र की जनता को अपना अलग राज्य मिला पर भाजपा और कांग्रेस पार्टियों की सरकारों ने आंदोलनकारियों को हमेशा हांसिए पर डालतीं रहीं। इन 25 वर्षों में कांग्रेस से ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं रहा भाजपा के पास सत्ता और लंबे समय तक प्रदेश के साथ-साथ केंद्र में भी दोनों दलों की सरकार रही लेकिन सबने स्थाई राजधानी को लेकर जनता को छला है। खैर आने वाला 9 नवंबर को उत्तराखंड का स्थापना दिवस है और इस मौके पर राज्य में एक बड़ा ‘इवेंट’ किया जा रहा है। अखबारों में बड़े-बड़े विज्ञापन दिये जा रहे हैं। स्थापना दिवस पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी आ रहे हैं। फिर बड़ी बड़ी बातें होंगी मानों इस राज्य में विकास की गंगा बहाने के लिए कोई भागीरथ मिल गया हो।

(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और Associate Editor हैं)

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