बदली पहनावे की संस्कृति

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पंजाब। अब जिधर नजर डालिए–दफ्तरों में, बसों में, सड़क पर, बाजार में, एयरपोर्ट पर, चैनल्स पर लड़कियों, स्त्रियों की प्राथमिक पसंद वे कपड़े नजर आते हैं, जिन्हें सामान्य भाषा में वैस्टर्न कहते हैं। कपड़े तो कपड़े, बाल बनाने के तौर-तरीके भी लगभग एक जैसे हैं। हाल ही में इटली के मशहूर फैशन डिजाइनर अरमानी का इक्यानवें वर्ष की उम्र में निधन हो गया। वह उम्र के इस पड़ाव पर भी बहुत काम करते थे। उनके बारे में कहा जाता है कि उन्होंने फैशन की दुनिया को बदल दिया। विश्व के मशहूर लोग जिनमें अभिनेता, अभिनेत्रियां, उद्योगपति आदि शामिल हैं, उनके लिए अरमानी के ब्रांड्स जरूरी माने जाते थे। अरमानी के बारे में कहा जाता है कि उन्होंने पुरुषों के कपड़े बनाने में जिन कपड़ों का इस्तेमाल किया वे महिलाओं में पसंद किए जाते थे, और महिलाओं के लिए पुरुषों द्वारा पसंद किए जाने वाले कपड़ों का उपयोग किया। उनका मशहूर उद्धरण है कि मैंने स्त्रियों को पुरुषों के कपड़े पहनना सिखा दिया। वे यह भी कहते थे कि उन्होंने पुरुषों के लिए ऐसे कपड़े तैयार किए, जिनसे उनकी छवि कुछ मासूम दिखे और स्त्रियों के लिए ऐसे कपड़े बनाए जिन्हें पहनकर वे कठोर दिखें। यानी कि उन्होंने सारी पारंपरिक छवियों को तोड़ दिया। स्त्रियों के लिए बनाए कपड़ों को वे पावर सूट कहते थे। कुल मिलाकर यह कि शक्तिशाली या एम पावर्ड वुमैन जिन्हें कहते हैं, वे खास कपड़े पहनकर ही हो सकती हैं। यह अपने उत्पाद को बेचने की एक रणनीति ही थी, जो बहुत सफल रही। आपने देखा होगा कि स्त्रियों की छवि तमाम धारावाहिकों, फिल्मों, टीवी कार्यक्रमों ने कपड़ों के आधार पर ही तय कर रखी है। इसमें वैस्टर्न पहनने और अंगरेजी बोलने वाली लड़की ताकतवर दिखाई जाती है, दूसरे कपड़े पहनने वाली कमजोर।

अंग्रेज इतने लम्बे शासनकाल में चाहकर भी स्त्रियों की वेशभूषा में इतना परिवर्तन नहीं कर सके थे, जो भूमंडलीकरण ने कर दिया। धार जैसे छोटे कस्बे में दो लड़कियां मुझसे जींस पहनकर मिलने आई थीं। उनसे असहमत होने वाले कह सकते हैं कि आखिर जींस पहनने में क्या बुराई है। सचमुच कोई नहीं है। लेकिन यह भी सच है कि वस्त्रों से किसी स्त्री की ताकत को नहीं आंका जा सकता। अन्यथा अमेरिका या यूरोप में स्त्रियों के प्रति इतनी बड़ी संख्या में अपराध न होते। वहां की आबादी को देखते हुए इतने अपराध वाकई चकित करते हैं। वर्ना वे तो पश्चिमी देश ही हैं। वहां तो स्त्रियां अरसे से ऐसे कपड़े पहनती हैं, जिन्हें शक्ति का प्रतीक बताया जाता है। दुनिया में हर सत्ता चाहे वह पैसे की हो, राजनीति की हो, धन की हो, छवि के खेल से चलती है। इन छवियों को बहुत चालाकी से बनाया जाता है और किसी न किसी विमर्श से जोड़ दिया जाता है। वैस्टर्न कपड़ों को भी स्त्री विमर्श के तमाम नारों से जोड़ दिया गया। और सिर्फ कपड़ों को ही क्यों, जितने भी उत्पाद हैं, वे कहीं न कही ये पाठ पढ़ाते रहते हैं कि इस उत्पाद के उपयोग से ही तुम ताकतवर और आजाद स्त्री कहला सकती हो। आपको एक कपड़े धोने की मशीन का वह विज्ञापन शायद याद हो, जिसमें कहा जाता था कि तुम आजाद स्त्री हो, इस मशीन का इस्तेमाल करके अपनी आजादी का जश्न मनाओ। कारों के भी ऐसे ही विज्ञापन आते रहे हैं। अनेक उत्पादों के भी।

दरअसल, पिछले पचास सालों का दौर, पूरी दुनिया में ऐसा रहा है जहां स्त्रियों की शिक्षा बढ़ी है। वे बड़ी संख्या में नौकरीपेशा बनी हैं। उनकी वेशभूषा एकदम बदल गई है। रहन-सहन बदल गया है। इस बदले हुए रहन-सहन, जीवनशैली ने स्त्रियों के सोच को भी खूब बदला है। एक समय में स्त्री के पढ़ने-लिखने को उसके वैवाहिक जीवन से जोड़ा जाता था। अब यह सीधा उसकी आत्मनिर्भरता से जुड़ा है। यह एक अच्छी बात भी है। लेकिन मात्र वेशभूषा के आधार पर किसी को ताकतवर कहना और किसी को कमजोर दिखाना ठीक नहीं है। पहले उत्तर भारत में आम तौर पर स्त्रियां साड़ी पहनती थीं। लेकिन अब साड़ी कभी-कभार पहनने की चीज रह गई है। काम-काजी स्त्री की वह आखिरी पसंद है। कुछ साल पहले साड़ी की एक बड़ी दुकान के मालिक ने इस लेखिका से कहा था कि अब उनका व्यवसाय खत्म होने के कगार पर है, क्योंकि अब कोई साड़ी नहीं पहनना चाहता। अपने यहां अनेक प्रदेशों में एक से एक सुंदर साड़ियां बनती रही हैं। ये दुनियाभर में मशहूर भी रही हैं। इन्हें बनाने वाले अद्भुत कलाकार होते हैं। लेकिन जब साड़ियां पहनने वालियां ही नहीं बचेंगी तो उनका बनना बंद हो जाएगा। मिलना भी।

वैसे भी अपने यहां हर प्रदेश की स्त्री अलग-अलग तरह के कपड़े पहनती रही है। कहीं सलवार, कुर्ता, कहीं लम्बे घाघरे। कहीं लहंगे। साड़ियां पहनने के भी तरह-तरह के तरीके रहे हैं और तरह-तरह की लम्बाई की साड़ियां भी। लेकिन अब जिधर नजर डालिए–दफ्तरों में, बसों में, सड़क पर, बाजार में, एयरपोर्ट पर, चैनल्स पर लड़कियों, स्त्रियों की प्राथमिक पसंद वे कपड़े नजर आते हैं, जिन्हें सामान्य भाषा में वैस्टर्न कहते हैं। कपड़े तो कपड़े बाल बनाने के तौर-तरीके भी लगभग एक जैसे हैं। जबकि भारत में वेणी गूंथने की कला के तरीके मौजूद रहे हैं। इस एकरसता को देखकर कई बार बोरियत भी होती है। नब्बे के दशक में जब टीवी चैनल्स का बोलबाला भारत में बढ़ा, टीवी लगभग गांव के हर घर तक जा पहुंचा, तो वेशभूषा में भी एकरूपता दिखाई देने लगी। यों विविधता को हम अक्सर सेलिब्रेट करते रहते हैं, उसे किसी भी देश की शक्ति बताते हैं, लेकिन वेशभूषा में यह खत्म होती जा रही है। पुरुषों के कपड़ों की विविधता तो पहले ही खत्म हो गई। अब अधिकांश पुरुष चाहे वे कहीं के भी हों, पैंट, शर्ट या पैंट टीशर्ट पहने दिखाई देते हैं। लेकिन स्त्रियों की वेशभूषा में भी अब एकरूपता आ गई है। किसी भी प्रदेश की स्त्री या लड़की को देखें, अधिकांश पैंट और शर्ट पहने ही दिखेंगी। इस तरह अरमानी अपने प्रयास में कामयाब भी हुए। ये बात अलग है कि उनके ब्रांड्स इतने महंगे होते हैं कि वे आम आदमी की पहुंच से बहुत दूर हैं। लेकिन हम उन्हीं जैसे तो बनना चाहते हैं, जो हम जैसे न हों। जो हमसे अधिक ताकतवर और साधन-सम्पन्न हों। और अरमानी वैसे भी सिर्फ कपड़े नहीं बनाते थे, तमाम तरह के परफ्यूम्स, चमड़े का सामान, प्रसाधन सामग्री के लिए मशहूर थे। यहां तक कि उनके होटल्स भी हैं।

अरमानी तक उन्हीं लोगों की पहुंच रही, जिनकी जेब में बहुत पैसे हैं। ये पैसे वाले ही इन दिनों हर देश के युवाओं के आदर्श हैं। इन बड़े आदमियों की जीवन शैली को अक्सर अखबार-पत्रिकाएं छापते हैं। चैनल्स दिखाते हैं। युवा इन्हें देखकर ही इनकी जीवनशैली की नकल करते हैं। दिलचस्प ये है कि दुनिया के अमीर इन दिनों हर बात के विशेषज्ञ बन बैठे हैं। वे लेखक हैं। स्तम्भकार हैं। राजनीति में हैं। अभिनय में हैं। पर्यावरण विशेषज्ञ हैं। कवि हैं। चित्रकार हैं। इनके बारे में छापने वाले गौरव महसूस करते हैं। इनसे एक बार अपाइंटमेंट मिलने के लिए लोग लाइन लगाकर खड़े रहते हैं। तो आखिर युवा भी क्या करें। वे वही तो सीखते हैं, जो उन्हें सिखाया जाता है।(BNE)

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