- हर साल टूटता है तटबंध, फिर भी नहीं थम रहा भ्रष्टाचार
उमेश चन्द्र त्रिपाठी
महराजगंज। जनपद के लोगों के लिए महाव तटबंध अभिशाप बन चुका है। आजादी के 79 वें साल भी महाव तटबंध का मामला जश का तश है। इसे राजनीतिक उदासीनता कहें या प्रशासनिक भ्रष्टाचार? आखिर महाव तटबंध का मामला कैसे सुलझेगा यह एक बड़ा यक्ष प्रश्न है। बता दें कि बीते वर्षों में यह तटबंध हर साल औसतन चार से पांच बार टूटता रहा है, जिससे हजारों किसानों की धान फसल पूरी तरह से बर्बाद होती रही। इसके बावजूद हर साल तटबंध की मरम्मत पर करोड़ों रुपये खर्च किए जाते हैं।
लेकिन नतीजा वही ढाक के तीन पात। वर्ष 2013 से 2017 तक तटबंध टूटने की घटनाएं रिकॉर्ड में दर्ज हैं। 22 जुलाई 2013 को कनरी, बरवा और खैरहवा दुबे के पास तीन स्थानों पर तटबंध टूटा। 2014 में 21 जून को खैरहवा दुबे, बरगदवा, 19 जुलाई को बरगदवा सिवान और 14 अगस्त को बिशनपुरा क्षेत्र में तटबंध दरक गया। 2015 में 25 जून को दोगहरा और बिशनपुरा, 16 जुलाई को कोहरगड्डी और नारायनपुर, 31 जुलाई को पुनः नारायनपुर, जबकि 21 अगस्त को खैरहवा गांव के पास भारी क्षति हुई। 2016 में 15 जून और एक जुलाई को दोगहरा, कोहरगड्डी और कनरी चकरार प्रभावित हुए। 4 और 18 सितंबर को कोहरगड्डी, 4 अक्टूबर को देवघट्टी के पास तटबंध टूटा।
वहीं, 2017 में 21 जून, 2 जुलाई और 10 जुलाई को छितवनिया और कनरी चकरार के पास दरारें पड़ीं। बरगदवा क्षेत्र के देवघट्टी, हरखपुरा, शिकारगढ़, नरायनपुर, हरपुर, अमहवा, बेलहिया, खजहिया, गनेशपुर आदि गांव नाले के पानी से प्रभावित होते हैं। वहीं पश्चिमी तटबंध टूटने पर खैरहवा दूबे, कोहरगड्डी, असुरैना, दोगहरा, विशुनपुरा, जहरी, सगरहवा, महरी, घोड़हवा, लुठहवा और गंगवलिया गांवों में तबाही मचती है। वर्ष 2025 में अब तक सिर्फ एक बार तटबंध टूटने की घटना सामने आई है, लेकिन इससे यह मान लेना कि तटबंध की हालत सुधर गई है, शायद जल्दबाजी होगी। मरम्मत के नाम पर हर साल करोड़ों की बंदरबांट होती है, लेकिन स्थायी समाधान की दिशा में कोई ठोस प्रयास नहीं दिखता। जनता अब जवाब मांग रही है-क्या हर साल यही खेल चलता रहेगा या कोई ईमानदार और टिकाऊ समाधान सामने आएगा?
