BJP को नहीं रही सवर्ण वोटरों की परवाह

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  • क्या इतिहास में मोदी का नाम सवर्ण विरोधी के रूप में  होगा दर्ज

विजय श्रीवास्तव

लखनऊ। देश की राजनीति में सामाजिक समीकरणों का महत्व हमेशा से निर्णायक रहा है। चुनावी गणित, जातीय संतुलन और वोट बैंक की रणनीति ने कई बार राजनीतिक दलों की प्राथमिकताओं को बदल दिया है। इसी संदर्भ में अब यह सवाल उठने लगा है कि क्या भारतीय जनता पार्टी (BJP) अपने पारंपरिक कोर वोटर माने जाने वाले सवर्ण समाज की अनदेखी कर रही है?राजनीतिक विश्लेषकों और विभिन्न वर्गों के बुद्धिजीवियों से की गई बातचीत में यह भावना सामने आई कि BJP ने पिछड़े और अनुसूचित वर्गों के बीच अपनी पकड़ मजबूत करने में उल्लेखनीय सफलता हासिल की है। लेकिन इसी प्रक्रिया में सवर्ण समाज के एक वर्ग को यह आभास होने लगा है कि उनकी अपेक्षाओं और मुद्दों पर अपेक्षित ध्यान नहीं दिया जा रहा।

आर्थिक आधार पर आरक्षण की मांग क्यों नहीं?

लेख में उठाया गया एक प्रमुख प्रश्न यह है कि जब सरकार ने जम्मू-कश्मीर से धारा 370 हटाने जैसे बड़े और ऐतिहासिक निर्णय लिए, तब शिक्षा और नौकरी में आर्थिक आधार पर व्यापक आरक्षण व्यवस्था लागू करने की दिशा में ठोस पहल क्यों नहीं की गई? हालांकि केंद्र सरकार ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग (EWS) के लिए 10 प्रतिशत आरक्षण लागू किया है, फिर भी कुछ वर्गों का मानना है कि आरक्षण नीति की समग्र समीक्षा और सामाजिक-आर्थिक स्थिति के आधार पर पुनर्संतुलन की आवश्यकता है। कुछ लोगों का तर्क है कि समाज के संपन्न वर्गों को आरक्षण का लाभ मिलना जारी है, जबकि वास्तविक रूप से जरूरतमंद तबका इससे वंचित रह जाता है। इस विषय पर निष्पक्ष सर्वे और संवाद की मांग भी उठ रही है।

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क्या “सबका साथ, सबका विकास” में सब शामिल हैं,

BJP का नारा “सबका साथ, सबका विकास” समावेशी राजनीति का प्रतीक माना गया। लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या इस नीति के लाभों का अनुभव सभी सामाजिक वर्ग समान रूप से कर पा रहे हैं? राजनीतिक पर्यवेक्षकों का कहना है कि सवर्ण समाज का एक हिस्सा स्वयं को उपेक्षित महसूस कर रहा है। उनका मानना है कि पार्टी के भीतर भी इस विषय पर खुलकर चर्चा नहीं हो रही। हालांकि पार्टी नेतृत्व और सरकार बार-बार यह दावा करते रहे हैं कि उनकी नीतियां सभी वर्गों के हित में हैं।

2024 के बाद  बदलते संकेत

कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि 2024 के चुनावों के बाद सामाजिक समीकरणों में सूक्ष्म बदलाव दिखाई दे रहे हैं। उनका कहना है कि धार्मिक और भावनात्मक मुद्दों से आगे बढ़कर अब मतदाता रोजगार, शिक्षा, महंगाई और सामाजिक न्याय जैसे ठोस मुद्दों पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। उत्तर प्रदेश  राज्यों में कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक सख्ती को सरकार की बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है, लेकिन सामाजिक संतुलन और प्रतिनिधित्व के सवाल भविष्य की राजनीति में अहम भूमिका निभा सकते हैं।

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इतिहास क्या लिखेगा?

लेख में यह भी प्रश्न उठाया गया है कि क्या भविष्य में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम किसी विशेष वर्ग के विरोधी के रूप में दर्ज होगा, जैसा अतीत में कुछ नेताओं के संदर्भ में कहा गया? राजनीतिक इतिहास गवाह है कि किसी भी सरकार की स्थायी पहचान उसकी समावेशी नीतियों और संतुलित निर्णयों से बनती है। केवल विरोध या समर्थन की राजनीति से दीर्घकालिक सामाजिक संतुलन संभव नहीं होता। देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था में हर वर्ग की अपेक्षाएं और आकांक्षाएं महत्वपूर्ण हैं। यदि किसी भी सामाजिक समूह में असंतोष की भावना है, तो उसका समाधान संवाद, समीक्षा और नीति सुधार के माध्यम से ही संभव है। राजनीति का मूल उद्देश्य समाज के सभी वर्गों के साथ न्याय करना है। आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि BJP अपने पारंपरिक और नए सामाजिक समीकरणों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित करती है।

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