भारतीय राजनीति: सेना के साथ खड़ा भारत:सत्ता के लिए लड़ता पाकिस्तान

सेना के साथ खड़ा भारत

सेना के साथ खड़ा भारत

सेना के साथ खड़ा भारत: हाल के वर्षाे में भारतीय राजनीति में जिस तरह से सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच हर मुद्दे पर तलवारें खींची नजर आती थी,उसके बाद ऑपरेशन सिंदूर के दौरान जिस तरह से दोनों धड़ों में एकजुटता देखने को मिल रही है,उससे देश की आम जनता काफी खुश है,वहीं पाकिस्तान में इसके उलट नजारा नजर आ रहा है।

पड़ोसी मुल्क में विपक्ष लगातार प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को कोसने और उन्हें नाकाबिल नेता साबित करने में लगा है। मोदी और शरीफ की तुलना शेर और सियार के रूप में की जा रही है।

बहरहाल,भारत के लिये यह सुखद है कि आतंकवाद के खिलाफ मोदी सरकार के हर कदम पर विपक्ष बिना किसी शर्त के पूरी मजबूती से खड़ा है।

जम्मू-कश्मीर के पहलगाम में हुए आतंकी हमले और उसके जवाब में भारतीय सेना द्वारा चलाए गए ऑपरेशन सिंदूर के बाद पूरे राजनीतिक परिदृश्य में एक अद्भुत परिवर्तन देखा गया है।

विपक्षी दलों ने इस बार न केवल सरकार का समर्थन किया बल्कि सेना के साहस और कार्रवाई की खुलकर सराहना की।

इससे पहले उरी और पुलवामा हमलों के बाद जिस तरह से कांग्रेस और अन्य विपक्षी दलों ने सवाल उठाए थे, और बीजेपी ने उन्हें राष्ट्र विरोधी खांचे में रखकर सियासी नुकसान पहुंचाया था, उस पृष्ठभूमि में यह बदलाव बेहद अहम है।

यह न केवल राजनीति की परिपक्वता को दर्शाता है, बल्कि यह भी बताता है कि देश की सुरक्षा के मुद्दे पर भारत अब एक स्वर में बोल रहा है।

गौरतलब हो, 22 अप्रैल को पहलगाम में हुए आतंकी हमले में 26 निर्दाेष पर्यटकों की निर्मम हत्या ने पूरे देश को झकझोर दिया था। इस हमले ने न केवल आम जनता की भावनाओं को आहत किया, बल्कि विपक्षी दलों के लिए भी एक चुनौती खड़ी कर दी थी कि वे इस मुद्दे को किस रूप में लें।

कांग्रेस और अन्य प्रमुख दलों ने बिना देर किए केंद्र सरकार को बिना शर्त समर्थन देने की घोषणा की।

इससे भी बड़ी बात यह थी कि उन्होंने सुरक्षा और खुफिया तंत्र की संभावित चूक का मुद्दा उठाने के बावजूद, इसे राजनीति का विषय नहीं बनने दिया। यह देश की एकता और संप्रभुता की रक्षा के लिए विपक्ष का एक परिपक्व और जिम्मेदार रवैया था।

भारतीय सेना ने इस हमले के जवाब में पाकिस्तान में स्थित आतंकी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर के तहत सटीक और प्रभावशाली कार्रवाई की। सेना की इस जवाबी कार्रवाई को विपक्ष की ओर से न केवल समर्थन मिला बल्कि सराहना भी हुई।

कोई सवाल नहीं, कोई प्रमाण की मांग नहीं, कोई राजनीतिक बयानबाजी नहीं बस एक सुर में सरकार और सेना के साथ खड़े रहने की भावना। ‘भारत माता की जय’ और ‘जय हिंद’ के नारों के साथ विपक्षी नेता भारतीय सेना के साथ नजर आए।

यह एक ऐसी तस्वीर थी जो 2016 के उरी हमले या 2019 के पुलवामा हमले के बाद नजर नहीं आई थी।

उरी हमले के बाद जब भारतीय सेना ने सर्जिकल स्ट्राइक की थी, तो कांग्रेस समेत कई विपक्षी दलों ने उस पर सवाल उठाए थे। बीजेपी ने इस मुद्दे को राष्ट्रवाद बनाम राष्ट्र विरोधी के तौर पर पेश करके राजनीतिक लाभ उठाया था।

ठीक ऐसा ही पुलवामा के बाद बालाकोट एयर स्ट्राइक के दौरान हुआ था। कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने सबूत मांगे थे, जिसके चलते पार्टी को व्यापक आलोचना का सामना करना पड़ा था।

राहुल गांधी ने भी सेना के शौर्य पर विश्वास जताने के साथ-साथ पीएम मोदी पर जवानों के बलिदान की राजनीति करने का आरोप लगाया था।

इन बयानों से कांग्रेस को चुनावी मैदान में भारी नुकसान उठाना पड़ा था, लेकिन इस बार कहानी बदली हुई है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद कांग्रेस ने अपने राजनीतिक कार्यक्रमों को रोक दिया, पार्टी की सर्वाेच्च नीति-निर्धारण संस्था कांग्रेस वर्किंग कमिटी की बैठक बुलाई गई और राहुल गांधी ने स्वयं सेना को समर्थन देने का ऐलान किया।

प्रियंका गांधी वाड्रा के सुझाव पर कांग्रेस ने अपनी ष्संविधान बचाओष् रैली स्थगित कर दी, ताकि सेना के प्रति एकजुटता और राष्ट्र के प्रति प्रतिबद्धता का संदेश स्पष्ट रूप से जाए।

यहां तक कि कर्नाटक कांग्रेस ने भी अपनी उस सोशल मीडिया पोस्ट को हटा दिया, जिसमें शांति को सबसे बड़ा हथियार बताया गया था जो शायद मौजूदा माहौल में सेना के ऑपरेशन के संदर्भ में गलत संदेश दे सकती थी।

कांग्रेस के इस नए रुख के साथ ही अन्य विपक्षी दल भी उसी दिशा में नजर आए। एनसीपी (एसपी) प्रमुख शरद पवार ने प्रधानमंत्री और रक्षा मंत्री से बात करके अपनी पार्टी का पूरा समर्थन देने की घोषणा की।

यूपीए सरकार में रक्षा मंत्री रहे ए के एंटनी, जो अक्सर मोदी सरकार के आलोचक रहे हैं, उन्होंने भी ऑपरेशन सिंदूर को ‘एक मजबूत शुरुआत’ बताया और सेना की निर्णायक कार्रवाई का समर्थन किया। आम आदमी पार्टी के प्रमुख अरविंद केजरीवाल, जो पहले सर्जिकल स्ट्राइक के बाद राहुल गांधी के शब्दों की आलोचना कर चुके थे, उन्होंने भी इस बार सेना के साहस की प्रशंसा करते हुए कहा कि पूरा देश एकजुट है।

सेना के साथ खड़ा भारत:  राष्ट्रीय जनता दल के नेता लालू प्रसाद यादव और तेजस्वी यादव ने भी ऑपरेशन सिंदूर की खुलकर सराहना की और जवानों को सलाम किया। समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, जो अक्सर मोदी सरकार के आलोचक रहते हैं, उन्होंने भी इस बार सरकार के सुर में सुर मिलाया और पाकिस्तान पर की गई कार्रवाई की प्रशंसा की।

यहां तक कि वामपंथी दलों ने, जो आमतौर पर सैन्य कार्रवाई पर संयम बरतने की बात करते हैं, उन्होंने भी पहलगाम हमले के बाद सरकार और सेना के साथ खड़े होने की बात कही। कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (सीपीआई) ने भी माना कि इस बार भारत के पास जवाब देने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

यह पूरा घटनाक्रम भारतीय राजनीति के लिए एक नई दिशा का संकेत है। यह दर्शाता है कि देश की सुरक्षा और संप्रभुता के मुद्दे पर अब राजनीतिक दल न केवल एकजुट हैं, बल्कि अपने पुराने सियासी रवैये की भी समीक्षा कर रहे हैं।

कांग्रेस का यह नया रुख जहां उसे राष्ट्रवादी विमर्श में खुद को फिट करने में मदद करेगा, वहीं अन्य विपक्षी दलों के लिए भी यह संदेश है कि जनता अब केवल आरोप-प्रत्यारोप नहीं, बल्कि एकजुटता और जिम्मेदारी की राजनीति देखना चाहती है।

ऑपरेशन सिंदूर के बाद भारत ने एक बार फिर यह संदेश दिया है कि आतंकवाद के खिलाफ उसकी नीति न तो नरम है, न ही विभाजित।

यह केवल केंद्र सरकार की दृढ़ इच्छाशक्ति का परिणाम नहीं, बल्कि विपक्ष की परिपक्व भागीदारी का भी प्रतिबिंब है। अगर इस रुख को भविष्य में भी कायम रखा गया, तो यह न केवल देश की आंतरिक राजनीति को परिपक्व बनाएगा, बल्कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर भी भारत की छवि को और सुदृढ़ करेगा।

बात पाकिस्तान की कि जाये तो वहां सेना,सरकार और विपक्ष के बीच तलवारें खींची हुई हैं। भारत के ऑपरेशन सिंदूर से पाकिस्तान की सैन्य और रणनीतिक स्थिति डगमगाई हुई है, वहीं दूसरी ओर पाकिस्तान की सियासत भी बुरी तरह बिखर गई है।

जब देश को एकजुट होकर संकट का सामना करना चाहिए, तब पाकिस्तानी नेता एक-दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप में व्यस्त हैं। प्रधानमंत्री और विपक्ष के बीच बढ़ती खींचतान ने पूरे मुल्क को असमंजस में डाल दिया है।

पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी ने मौजूदा सरकार पर सेना के साथ मिलीभगत और गलत फैसलों का आरोप लगाया है, वहीं सरकार का कहना है कि इमरान खान जैसे नेता युद्ध के समय भी राष्ट्रविरोधी बयानबाजी से बाज नहीं आ रहे।

संसद में तीखी बहस के दौरान विपक्षी नेताओं ने सेना की विफलताओं पर सवाल खड़े किए, जिससे देश की अंतरराष्ट्रीय छवि और कमजोर हुई।

 

इस बीच, पाकिस्तानी सेना और सरकार के बीच भी समन्वय की कमी साफ नजर आ रही है। मीडिया में लीक हो रही जानकारियों के मुताबिक, कई रक्षा फैसलों पर सेना और सरकार की राय अलग-अलग रही है, जिससे फ्रंट पर रणनीतिक भ्रम की स्थिति बनी हुई है।

इससे देश के आम नागरिकों में असुरक्षा और निराशा का माहौल है। जानकार मानते हैं कि इस समय पाकिस्तान को सबसे बड़ा खतरा भारत से नहीं, बल्कि अपनी बिखरी हुई राजनीतिक नेतृत्व और कमजोर रणनीतिक सोच से है।

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